इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
रात के गहरे अंधकार को चीरकर
समुद्र की लहरों से निकल रहा है एक घोड़ा
घोड़े के इंतज़ार में
समुद्र के किनारे खड़ा है एक सिरफ़िरा सवार
हाथों में थामे लगाम और रक़ाब
घोड़े की ज़बान पर चिपका है
आने वाले दिनों की अज़नबी यात्राओं का स्वाद
शहर में हिनहिनाता घूम रहा एक घोड़ा
अपने सवार के दस्तानों और जूतों की तलाश में
तितर-बितर हो रही है भीड़
भीड़ में अदृश्य हो गया एक घोड़ा
छोड़कर अपनी लगाम और रक़ाब
एक घोड़े के नायाब क़रतबों की तारीफ़ में
बाँधे जा रहे हैं कुछ ख़ूबसूरत पुल
पुलों पर चढ़े कुछ टेलिस्कोप
नीचे बह रही है एक अनदेखी नदी का
अविस्मरणीय गीत गा रहे हैं नदी की तलाश में
वीरान मरुस्थलों से लौटा एक घोड़ा
प्यासा ही लौट रहा है
उसकी आँखों में झूल रही है
पुल के नीचे चमक और शोर के अनंत में डूबी
कंकरीट की एक सड़क.
जैसे ही धूप में रखी
मैंने अपनी सीली हुई माचिस
रास्ते में आ गये बादल
बादलों में डूब गया बादल
अंधकार से सज-धजकर निकली
लाईटरों की एक दुकान
एक लाईटर इतना आकर्षक था
कि मैंने उसे खरीद लिया
फ़िर बरस बीते
घर की चाभियों की तरह
लाईटर भी पुराना पड़ गया
लेकिन सिगरेट के धुएँ में अब भी ताज़ा है
सीली हुयी माचिस और डूबते सूरज की याद
हालाँकि यह धुआँ भी अब पुराना पड़ गया है
इतना पुराना कि
अक्सर सोचता रहता हूँ
इससे छूटने की आसान तरक़ीबें.
© 2009 Dileep Shakya; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: दिलीप शाक्य
जन्म स्थान: जोउरा (ग्वालियर)
शिक्षा: पी. एच. डी., जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
संप्रति: सीनियर लेक्चरर, हिन्दी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
संपर्क: हिन्दी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली