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शिखर

नामवर सिंह

हिन्दी साहित्य के प्राख्यात आलोचक नामवर सिंह से प्रसिद्द रचनाकार गंगा प्रसाद विमल की बातचीत

गंगा प्रसाद विमल : ये तो निर्विवाद है कि आप आलोचना के शिखर पुरुष हैं. विगत वर्षों अर्थात स्वाधीनता के बाद की आलोचना किस अर्थ में महत्वपूर्ण हैं, इस पर आप जरूर कुछ सोच रहे होंगे?

नामवर सिंह: बड़ा ही मुश्किल सवाल आपने पूछ लिया है। क्योंकि ये बात अगर रचनाकारों से पूछें तो ज्यादा अच्छा है। आमतौर पर आलोचना से शिकायतें लोगों को बहुत ज्यादा है और तरह-तरह की शिकायतें हैं। अपनी ओर से यह कहते हुए बहुत संकोच होता है. यद्यपि आलोचना के नाम पर बहुत सारी किताबें छपी हैं। विश्वविद्यालय में जब से एम.ए. की पढ़ाई होने लगी। एम.फिल. और पीएच.डी का लोगों को शोध-प्रबंध लिखना पड़ा। आप देखें कि आलोचना के नाम पर यही शोध की पुस्तकें बहुत ज्यादा हो गयी हैं। इसकी तुलना में आरम्भिक काल में जब से आलोचना लिखी जा रही है। खासकर 19वीं सदी के उतरार्ध से बहुत कम मिलेंगी। सच पूछिए तो आलोचना का उदय ही पत्रिकाओं के माध्यम से शुरू होता है। सरस्वती नाम की पत्रिका द्विवेदी जी ने निकाली। भाषा संबंधी विवाद भी थे बाकी पुस्तकों से संबंधित परिचय और जब से विश्वविद्यालयों की स्थापना हो गई इलाहाबाद विश्वविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय। इसे मोटे तौर से रामचन्द्र शुक्ल विवरण मानते हैं। आलोचना का क्षेत्र, उपयोग और प्रयोजन यही रहा है कि कुछ विश्वविद्यालय में पढ़ने पढ़ाने के सिलसिले में आलोचना की किताबें लिखी गईं। और पत्रिकाओं में पुस्तक समीक्षा मुख्य रूप से, पुस्तकों का परिचय देना कुछ पुरानी, कुछ नई। तो प्रयोजन मुख्य रूप से यही रहा है।
इस दिशा में सच पूछिए, तो मुझे लगता है कि कुछ अपनी समझ के लिए, कुछ छात्रों की समझ के लिए मैंने आलोचना लिखने का काम शुरू किया. विश्वविद्यालयों में जबसे पढ़ाना शुरू किया। वरना मैं तो शुरू में कविता लिखता था। हर आदमी की तरह, हर युवा जिस तरह से कविता लिखता है अपने आरम्भिक दौर में। बाद में कविता छूट गई और आलोचना रह गई या कहिए कि अध्यापक के नाते। ‘आलोचना’ नाम की पत्रिका निकलती थी, जो शिवदान सिंह चैहान निकालते थे। इसके लिए उन्होंने कुछ लेख लिखने को कहा तो उसके लिए पुस्तक सभीक्षा शुरू की। इतिहास लेखन संबंधी विशेषांक निकाला तो उसमें इतिहास से संबंधित कुछ लेख लिखे और उसके बाद साहित्यकारों में उस मुद्दे पर बहस हुई. कुछ उस सिलसिले में क्षेत्र से उभरते हुए संवाद की प्रक्रिया शुरू हुई. कुल मिलाकर यह आलोचना की प्रक्रिया थी।

गंगा प्रसाद विमल: कुछ संक्षेप में बीच-बीच में आपने जो लिखा। जिन्हें बराबर मुद्दों के रूप में सामने रखा है। उससे नई किस्म की व्यवहारिक आलोचना की शुरूआत हुई?

नामवर सिंह: कुल मिलाकर देखिए! रचना न हो सामने तो आलोचना हो ही नहीं सकती। चाहे कोई प्राचीन पुस्तक जो उपेक्षित रह गई हो. जिसे संग्रह योग्य समझा गया तो उसकी व्याख्या आप करें। या फिर आपके समय में जो लिखा जा रहा है उसके बारे में आप कुछ चर्चा करें। जो आप को पसंद नापसंद हो, उसके बारे में आप लिखें. यही तो आलोचना में होता है। आजकल ये काम भी लगातार हो ही रहा है. चाहे जो लोग लिखें या लिख रहे हैं। लेकिन विपक्ष-प्रतिपक्ष जिसको मैं विवाद, वाद, और संवाद कहता हूँ। जैसा मैंने कहा कि इतने बड़े पैमाने पर न विद्यालय थे न महाविद्यालय थे। अध्यापकों की नौकरी जिन्होंने चाही तो इसलिए कि उनकी भी कुछ किताबें छपी हैं। इसके बिना नौकरी मिल नहीं सकती है। आलोचना के नाम पर बहुत सारा लेखन ऐसा रहा जिसे अकादेमिक आलोचना कहा गया। इस तरह की किताबें आपको बहुत मिलेंगी। ऐसी किताबें जिसमें एक भी बात नई आपको ढूढें न मिलेगी। उसको आप शास्त्रीय न कहकर अकादेमिक कहिए। इसलिए की अकादेमिक जरूरतों के लिए तमाम विद्वानों की राय, उद्धरण आप देते चले जाएं. ऐसी किताबें खूब लिखी गई। मनमानी टिप्पणियाँ, और नीचे फुटनोट दे दें. यही आलोचना हो गई. ये प्रवृत्ति इस बीच बड़ी तेजी से बढ़ी है।

गंगा प्रसाद विमल : इसमें एक चीज और जुड़ी हुई है जब आप पद्धति की बात कर रहे हैं जहां सर्जनात्मक लेखन सघन और महत्वपूर्ण हो, तो आलोचना उसी के अनुरूप आगे बढ़ती है. पर हमारे यहाँ खासतौर से हिन्दी में जो अकादेमिक आलोचना है. उसने कभी स्वतंत्र होकर जीने की इच्छा कभी जाहिर नहीं की?

नामवर सिंह: स्वतंत्र क्या, उसमें एक भी मौलिक पात्र आपको नहीं मिलेगा। आप कुल मिलाकर के देखें. पुराने लेखकों के मूल्याँकन को लेकर यह देखा गया कि दुलर्भ कबीर के बारे में आप ऐसी कोई बात कह दें. मुझे खुशी है कि इस पर बहुत दिनों बाद पुरूषोत्तम अग्रवाल ने ‘अकथ कहानी प्रेम की’ चार सौ पचास पेज की किताब लिखी. और उस पर वो करीब पच्चीस से तीस साल से लगे हुए थे। हमारे साथ उन्होंने इसी पर शोध किया था. लेकिन उस समय भी मैंने कहा कि अभी इसे मत प्रकाशित कीजिए. अभी और काम कीजिए। अब ये किताब देखें। यद्यपि कबीर पर लिखा तो बहुत से लोगों ने। दर्जनों किताबें मिलेंगी। तुलसीदास पर बहुत किताबें मिलेंगी। सूरदास पर भी बहुत लिखा हुआ मिलेगा। लेकिन आप देखें कि ऐसा बहुत कम है, जो कुछ नया कहता हो। जायसी पर कुछ समय पहले नए ढंग से विजय देव नराराण साही ने एक किताब लिखी थी। और तो कोई किताब उस पर है भी नहीं।

गंगा प्रसाद विमल: वो बहुत जरूरी किताब है।

नामवर सिंह: हाँ, तो मैं कह रहा हूँ कि आलोचना में अच्छा काम हो रहा है. लेकिन आप देखें कि दस प्रतिशत मिल जाए तो आप समझिए कि बहुत है। जबकि इसकी तुलना में हम देखें कविता, कहानी, उपन्यास में ज्यादा पुनरावृत्ति नहीं मिलेगी।
गंगा प्रसाद विमल: वहाँ एक अच्छी बात यह होती है कि दस साल में ही वो नई प्रवृत्ति बताने लगते हैं।

नामवर सिंह: हाँ.

गंगा प्रसाद विमल: आलोचना में यह नहीं हुआ?

नामवर सिंह: नहीं हुआ। बहुत कम लोग हैं, जो लेखक को पहली कृति से ही पहचान लेते हैं कि एक महत्वपूर्ण आलोचक आ गया है।

गंगा प्रसाद विमल: जैसे ‘कविता के नए प्रतिमान’ से शुरू करें. कविता की बात चल रही है. ‘कविता के नए प्रतिमान’ में जो नई विकासात्मक चीजें खोजी गई थी। उस तरह की दूसरी धाराएं कुछ विकसित हुई?

नामवर सिंह: देखिए! ‘कविता के नए प्रतिमान’ की सीमाएं भी कुछ हैं। और मैंने इलाहाबाद में व्याख्यान देते हुए यह कहा जो प्रकाशित भी हुआ था। मैंने स्वीकार किया था। यह पुस्तक मुक्तिबोध की मृत्यु के बाद 1967 में लिखी थी। ओर 1965 में उनकी मृत्यु हुई थी। तो मुझे लगा कि तारसप्तक, दूसरा सप्तक और तीसरा सप्तक ने उसे छापा था. और किन्हीं कारणों से कई लोगों को कवि के रूप में ठीक दर्जा मिला। अज्ञेय को मिला. ठीक ही था. कोई गलत नहीं मिला. और कई लोगों को मिला। तारसप्तक के हिसाब से पहले कवि मुक्तिबोध ही हैं। जीवित रहते उनकी कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई। मरने के बाद ही हुई। तो मुझे लगा कि इस पूरे दौर में चालीस-इक्तालीस से जिन कवियों ने लिखना शुरू किया। उसमें भी मुक्तिबोध ज्यादातर लंबी कविता लिखा करते थे। कठिन भी होती थी। और कुछ उनका शिल्प, उनकी भाषा, उनका थीम, कुल मिलाकर सबसे अलग था। तब मुझे लगा कि कविता संबंधी पसंद-नापसंद जो रूचि बनी हुई है। प्रयोगशील कविता और नई कविता के नाम पर यह रूचि दिखाई देती है। ये न तो प्रयोगशील में गिने जा रहे हैं और अपनी प्रगतिशील विचारधारा में थोड़ा अलग होने के कारण प्रगतिशील भी इन्हें पूछ नहीं रहे हैं। रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल को तो मानते हैं। नागार्जुन को भी कभी-कभी मान लेते हैं। लेकिन मुक्तिबोध कहीं उनके खाते में नहीं आते। जबकि रामविलास शर्मा की तरह वो भी तारसप्तक के ही कवि हैं।

गंगा प्रसाद विमल: जबकि उस अर्थ में राम विलास शर्मा के ज्यादा नजदीक थे मुक्तिबोध। एक कवि के रूप में?

नामवर सिंह: चाहे जो कह लीजिए। मार्क्सवादी ये भी थे और माक्सवादी मुक्तिबोध भी थे. जबकि तारसप्तक में कवि के रूप में प्रकाशित होने तक रामविलास शर्मा मार्क्सवादी नहीं थे। मार्क्सवाद पर रामविलास जी बहुत समय बाद गए. मुक्तिबोध जब बनारस में थे. लोगों के साथ काम करते थे. विचारधारा के साथ, तभी से वो मार्क्सवादी थे। और तारसप्तक की कविताओं को पढ़ने से ये मालूम हो जाता है। लेकिन तारसप्तक की कविताओं को पढ़ने से जहाँ तक रामविलास जी का सवाल है. प्रगतिशील विचारधारा उनमें कहीं थी ही नहीं। एक दृष्टि भले ही उनमें थी. निराला को वे पसंद करते थे. लेकिन प्रगतिशील आंदोलन में तो बहुत देर से आए थे। पहले आने वालों में तो श्री रामचन्द्र वर्मा थे। उन्होंने प्रगतिवाद पर किताब लिखी थी। और रामविलास जी प्रगतिवाद का उस वक्त मज़ाक उड़ाते थे। ये तो लिखा हुआ है। मुझे लगा यह एक ऐसा कवि हैं जो छोटी छोटी गीत कविताओं को पसंद करते थे. प्रकाशित होने पर भी और कविता लेखनों में भी उनकी प्रशंसा होती थी. ‘दूसरा सप्तक’ के कवि भी आ गए, लोकप्रिय हुए। लंबी कविता को ध्यान में रखते हुए मुक्तिबोध ने जो कुछ लिखा और खासकर ’अंधेरे में‘ का जो ढाँचा है. उसमें जो यथार्थवादी फैंटसी चली। तो वो पुस्तक एक तरह से लिखी गई थी. कि एक नई काव्य दृष्टि जो कि लोकप्रियता उसको जल्दी नहीं मिल रही है. उसकी चुनौती को लेकर मैंने ‘कविता के नए प्रतिमान’ पुस्तक लिखी थी। उसकी सीमा भी है। उसमें कुछ और कवियों को यह लिखा कि लम्बी कविता और लम्बी कविता में एक फर्क होता है। अज्ञेय की एक लंबी कविता है ‘असाध्य वीणा‘। उस पर भी मैंने व्याख्या की और कहा कि यह भी एक लंबी कविता है। लेकिन कुल मिलाकर उसका काव्यगत ढाँचा, साँचा बिल्कुल दूसरा है। मुक्तिबोध और अज्ञेय की ये दोनों कविताएं लंबी कविता है।

गंगा प्रसाद विमल: दोनों पारंपरिक भाषा को इस्तेमाल कर फैंटसी में सत्य का उदघाटन करने का जोखिम लेते हैं, वो अज्ञेय में नहीं मिलता।

नामवर सिंह: उस समय लिखने का एक तात्कालिक कारण भी यही था कि 1960 के बाद लगभग रूमानी प्रकृति और प्रेम कविता लिखने वाला लिरिकल जिसको कहते हैं। उस कविता का दौर समाप्त होकर के साठोतरी कविता जिसको कहते हैं. जिसमें आप लोग सामने आए। एक विद्रोही पीढ़ी नया सौन्दर्यशास्त्र, नई दृष्टि लेकर सामने आई। यानि मुक्तिबोध के बहाने साठोतरी कविता में धूमिल जैसा कवि आया हुआ था. जो तमाम पुरानी रूमानियत को, छायावादी किस्म की प्रतिबद्धताओं को नकार करके लिख रहा था। मैंने कहा कि ये साठोत्तरी पीढ़ी जो कविता की है, उसका अर्थ और बिल्कुल अलग रस है। इसलिए आप देखें कि रघुवीर सहाय की उसमें काफी ज्यादा प्रशंसा है। श्रीकांत वर्मा को उसमें लिया है धूमिल का चलते चलाते उसमें नाम आया, क्योंकि तब तक उनका कोई संग्रह नहीं आया था। मेरा काम ‘कविता के नए प्रतिमान’ में लिखने का एक नया जो आरम्भ था, उसमें योगदान करना, उसमें हस्तक्षेप करना कविता के बहाने। और ये काम जब मैंने किया था तो इसके पहले मैं ’कहानी नई कहानी‘ जैसी पुस्तक को धारावाहिक रूप से लिख रहा था। तब कहानियों में जो बदलाव आ रहा था। खासतौर से निर्मल की पहले जो कहानियाँ आई थीं। भीष्म साहनी की कहानी का जिक्र मैंने किया था। कहानी में जो काम किया था उस दौर की। तब तक नई कविता तो आई थी लेकिन नई कहानी लोगों ने नाम दिया नहीं था। तब से देखा जाए कि नई कविता अगर ये है, तो नई कहानी क्या है?

गंगा प्रसाद विमल: ये विचित्र बात है कि नई कहानी लिखी पहले गई है। उसे नाम बाद में मिला है। नई कविता लिखी बाद में गई और नाम पहले मिल गया। क्योंकि आपने भी जब ’कहानी नई कहानी‘ धारावाहिक रूप में लिखना शुरू किया था, वो पहला परिदृश्य था. और ये बड़ा आश्चर्य कि स्वीकृति दोनों को साथ-साथ मिली।

नामवर सिंह: इसीलिए मैंने ‘कविता के नए प्रतिमान’ नाम दिया। न कि ’नई कविता के प्रतिमान‘ नाम दिया था। मेरा उद्देश्य कोई शोध-प्रबंध लिखना नहीं था. केवल साहित्य में हस्तक्षेप करना था. क्योंकि मैं यही मानता हूँ- कि कविता का साथी जो है, उसे हमारे गुरूदेव ने नाम दिया ‘कवि साहचर्य’। तो आलोचना कर्म जो है वो साहचर्य है। कविता के के साथ सहचर के तरह से वो आता है। वही उनकी भूमिका होती है। इस दृष्टि से देखें तो आप जिन आलोचकों और आलोचना की बात कर रहे थे। वह साहचर्य धर्म का निर्वाह किस हद, किस स्तर तक कर रहे हैं? इससे मूल्याँकन होगा कि उसमें क्या सार्थक आ रहा है? और क्या निरर्थक आ रहा है?

गंगा प्रसाद विमल: एक सवाल बार-बार व्यथित करता है, वो ये कि सृजन और आलोचना ये दोनों चीजें हैं, जिन्हें हमारे यहाँ अलग-अलग देखने की परंपरा बनी हुई है। कविताएं, कहानियाँ, उपन्यास यहाँ तक कि नाटक लोग स्कूल में ज्यादातर पढ़ लेंगे। और आलोचना पढ़ने के लिए या तो जो रचनाकार हैं, वो पढ़ते हैं हिन्दी में। इसे हिन्दी की कंजूसी कहेंगे या ये क्या है? यद्यपि आलोचनात्मक चीजें अब बहुत ज्यादा छपती हैं, जो गद्य साहित्य है उसमें आलोचना प्रमुख है। आपको क्या लगता है, ऐसा क्यूँ है ये भेद?

नामवर सिंह: देखिए ऐसा भी हुआ है। कि स्वयं रचनाकार भी कहना चाहिए कि आप धर्म वह आलोचना भी लिखता है। जयशंकर प्रसाद ने आलोचनात्मक लिखा है। प्रेमचन्द्र ने भी उपन्यास और कहानियों पर लेख लिखा है। समीक्षा भी की है। पन्त जी ने भूमिका लिखी। रचनाकार वो है जो विचार भी करता है। अज्ञेय ने आलोचना भी लिखी, कविताएं लिखी, उपन्यास लिखा, रचना आलोचना एक ही आदमी दोनों काम कर सकता है। अंग्रेजी में कालरिज आलोचक भी थे, कवि भी थे। कीट्स ने आलोचना भी लिखी और काव्य में बहुत कुछ लिखा। प्रतिभाएं दो प्रकार की होती हैं लेकिन दोनों में रेखा-विभाजन नहीं है, कि कवि केवल कविता लिखेगा, आलोचना नहीं लिखेगा। आलोचना भी वो लिख सकता है। बहुत से लोग मानते हैं कि रचनाकारों की लिखी हुई आलोचनाएं भी बेहद महत्वपूर्ण रही हैं। इस मामले में दोनों सहचर हैं। पुराने जमाने में कहा गया कि कवि और सदृश्य दोनों के लिए है। मैं तो यही मानकर चलता हूँ।

गंगा प्रसाद विमल: इसमें प्रश्न उठता है कई बार कि आलोचना के इस विकास में कुछ रचनाकार छूट जाते हैं, कुछ कृतियाँ छूटीं, और बाद में वो खूब उभरीं। ऐसा नहीं है कि वो रचना और रचनाकार नहीं उठते। ऐसा क्यूँ होता है?

नामवर सिंह: देखिए ऐसा है मैंने कहा कि आलोचना भी रचनात्मक हो सकती है. छूटने का जहाँ तक सवाल है वो अपने चुनने का है। आप किस रचनाकार को चुनते हैं? और क्यूँ चुनते है? एक तो यह कि पुर्नव्याख्या हो, पुर्नमूल्याँकन हो। हम बार-बार रचनाओं को पढ़ते हैं और लगता है कि कुछ चीजें छूट गई थीं. उसका नया अर्थ नहीं सूझा था। कहते हैं न कि ”ज्यों-ज्यों निहारिए नैन, त्यों-त्यों निखरी नई“ जिस चीज को पुनः देखते हैं तो जैसे नया सौंदर्य मिल जाता है। ये साहित्य के बारे में भी है। और नया सौंदर्य दिखाई पड़े तो उसे दिखाना चाहिए कि भाई! ये नहीं दिखाई पड़ा था पहले। आलोचना का ये भी एक काम है। पुरानी रचनाओं को देखकर जो नया अर्थ दिखाई पड़े। किसी की नजर न पड़ी हो तो वो काम भी आलोचक का है। क्यूँकि अनेक संभावनाएं होती हैं, अनेक अर्थ भरे होते हैं। कई बार रचनाकार को भी नहीं पता रहता कि अन्य ने जो नया अर्थ कह दिया वो नहीं जानता। एक तो ये होना चाहिए। दूसरा ये भी काम होता है, कुछ लोग जीवन में अपने समाज के कारण रचना के कारण, पद के कारण, प्रतिष्ठा के कारण, खुद को प्रतिष्ठित कर लेते हैं और दूसरा अधिक उपेक्षित रह जाता है- उसकी प्रतिष्ठा के नीचे दबकर। तो इसकी जरूरत पड़ती है कि कोई आदमी इसका अति मूल्याँकन होगा और किसी का अवमूल्यन हो गया हो समाज में, उसकी स्थिति के कारण। बहुत से लोग अच्छे अफसर हैं. लोग उनका महत्व स्वीकार कर लेते हैं। और जब मर जाते हैं, तब पता चलता है कि ये तो अपने पद के कारण इतने महत्वपूर्ण थे। साहित्य में ये भी काम है आलोचक का। इसीलिए कुछ अतिरिक्त महत्व पा जाते हैं और कुछ अतिरिक्त रह जाते हैं। उसका पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए। बार-बार देखा, लिखा जाना चाहिए। तो मूल्याँकन नाम की एक चीज भी साहित्य को भूलती रहती है आलोचक नहीं करेगा तो कौन करेगा? एक चीज इसी सिलसिले में कह दूँ कि आलोचना का काम रचना के संदर्भ में तो है ही। पुर्नव्याख्या, पुनर्मूल्यांकन-ये ऐसी प्रक्रिया है जो निरंतर चलती रहती है। नई पीढ़ी आएगी वो नए ढंग से मूल्यांकन करेगी। लेकिन एक और काम है आलोचना का- वह है सिद्धांत पक्ष। अंग्रेजी में आप देखें या विदेशों में दूसरे महायुद्ध के बाद खासतौर से जिसे प्रिंसपल व लिटरेरी थ्योरी कहते हैं। संस्कृत में हमारे यहाँ ऐसे सिद्धांत बने हैं। ध्वनि सिद्धांत, वक्रोति सिद्धांत, रीति सिद्धांत, रस सिद्धांत। यह भी साहित्यशास्त्र है उसमें सिद्धांत भी होता है। यह काम कवि नहीं करेगा, कथाकार नहीं करेगा। उपन्यासकार नहीं करेगा। आलोचना में सिद्धांत पक्ष भी होता है. आई.ई. रिचर्डस ने ‘प्रिंसपल आफ लिटरेरी क्रिटिसिज्म’ लिखा। मुख्यतः आलोचना कर्म उन्होंने बहुत कम किया है सिद्धांत बनाया है। तो कहने का मतलब है नए-नए सिद्धांत बनने चाहिए, नए ढंग से साहित्य भी लिखा जाना चाहिए। क्योंकि साहित्य का, आलोचना का काम व्याख्यापूर्ण मूल्याँकन तो है ही। आलोचना का एक काम साहित्य के इतिहास को बदलना भी है।

साहित्य आप पढ़ते हैं तब तो ठीक है लेकिन जैसे सस्यूर के भाषा-विज्ञान के कारण साहित्य में एक नई दृष्टि आई। उसी तरह से जैसे हिन्दी के सबसे बड़े आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं. रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का इतिहास भी लिखा। उसमें कुछ कमियाँ हैं। मतभेद भी हो सकते हैं. लेकिन कहने के लिए पहला आधारभूत इतिहास तो उन्होंने ही लिखा। उसके बाद जो लोग इतिहास लिख रहे हैं. वो बहुत फेर-बदल नहीं कर सके। काल -विभाजन को लेकर आगे उसका समयकाल सही ढंग से नहीं रख सके। तो आलोचना का एक काम इतिहास लेखन भी है। ’दूसरी परम्परा की खोज‘ नाम की जो पुस्तक मैंने लिखी। इतिहास दृष्टि पर मेरी नजर थी। साहित्य में बहुत पहले ’आलोचना‘ में एक लेख ’इतिहास में नई-दृष्टि‘ नाम से लिखा था। तो मेरे सामने माडल शुक्ल ही थे। इतिहास लेखन में आलोचक हस्तक्षेप करता है तो इतिहासकार के नाते करता है। और साहित्यकार के लेखन का एक नया इतिहास रचता है. ये नहीं कि साहित्य का काल विभाजन बदल दे। काल विभाजन ही नहीं, जिसकी अन्तिम परिणति हुई जिस पुस्तक को लेकर विवाद हुआ कि ‘दूसरी परंपरा की खोज’ का मतलब नम्बर दो नहीं बल्कि ’अन्य‘ अदर है. द्विवेदी जी के माध्यम से मैंने बताना चाहा कि हम परंपरा का नाम बहुत लेते हैं। कोई परंपरा इकहरी या एक परंपरा नहीं होती। अनेक परंपराएं होती हैं, एक ही परंपरा में।

गंगा प्रसाद विमल: इसीलिए आपको बताना चाह रहा हूँ कि अगर आपको राम चन्द्र शुक्ल का इतिहास लिखने के लिए कहा जाता तो आप क्या करते? उन्होंने इसका बड़ा मजेदार जवाब दिया कि रामचन्द्र शुक्ल का इतिहास रामचन्द्र शुक्ल ही लिख सकते थे। और दूसरी पंक्ति में जो उन्होंने कहा उतनी सामग्री जितनी उन्हें मिली। उस पर इतिहास नहीं लिखा जाता। लेकिन वो बड़ी महान परंपरा के थे। पहली परंपरा को ही देख रहे थे तो एक दूसरी परंपरा व्यापक की थी। आदिकाल पर अपना व्याख्यान दे करके उसमें मैं तो कहूँगा कि शायद संसोधन तो छोटा शब्द है. लेकिन उसमें इतिहास उन्होंने जोड़ा और आप ठीक कह रहे हैं, कि आलोचक का काम इतिहास लिखना भी है और ये काम हमारे समय में बहुत कम हुआ है। आपने एक हस्तक्षेप किया ’दूसरी परंपरा‘ की खोज के रूप में। और दूसरी परंपरा की खोज वस्तुतः एक समांनन्तर परंपरा में भी, बल्कि कहें कि एक नई परंपरा इतिहास में दी।

नामवर सिंह: देखिए होता ये है, कि चाहे वो रचनाकार हो. राजनीति में जैसा हम कहते हैं कि कोई रचनाकार जो है, वो इतिहास बनाता है। जवाहरलाल नेहरू ने इतिहास बनाया। गांधी ने इतिहास बनाया। मतलब इतिहास को बदला, इतिहास को मोड़ दिया। साहित्य के क्षेत्र में होता है कि कुछ लोग होते हैं इतिहास लिखकर के इतिहास बदलते हैं। हस्तक्षेप करते हैं। तो आलोचक का एक काम यह भी होता है कि इतिहास में हस्तक्षेप करें। वह इतिहास लिखकर ही या इतिहास में लिख-लिख करके ही कर सकता है। जो हमारे गुरूदेव ने किया था। हिन्दी साहित्य की भूमिका नाम की किताब लिखकर के उन्होंने भी एक दूसरी परंपरा की तरफ इशारा किया। उसमें हुआ ये था कि शुक्ल ने कबीर को तो कवि ही नहीं माना। द्विवेदी जी ने कबीर पर ही लिखा था। और कबीर पर लिखकर के उन्होंने यह बताना चाहा कि शुक्ल के अनुसार कबीर तो कवि थे ही नहीं। द्विवेदी जी ने कहा कि नहीं, कबीर कवि थे। क्योंकि कविता की दृष्टि और भी हो सकती है जिसमें कुछ लोग ही लिख सकते थे। वरना बाकी लोग तो कथा वाचक हैं। तुलसीदास को कवि नहीं माना। रीतिकाल के लोगों ने कहा कि तुलसी तो राम कथा लिख रहे थे. राम कथा बाँछ रहे थे। कवि तो वो हैं जिसमें अलंकार हो. असली कवि तो धनानंद और विधाकर हैं। पदमाकर कवि हैं। तुलसी कहाँ से कवि हो गए? हमें जो रीतिकाल पढ़ाते थे. वे कहा करते थे कि तुलसीदास तो कह गए हैं “कवि न होऊँ चतुर कहाऊँ” चतुर को कवि कहाँ बना रहे हो भाई। इसलिए सिद्धांत इतिहास का मतलब है कि सिद्धांत लिखकर के आप हस्तक्षेप करें और पश्चिम के समान हिन्दी में कुछ लोग रचना भी करते हैं. रचना के साथ लेख भी लिखते हैं। टी.एस. इलियट ने ‘ट्रेडीशन एंड इंडीविजुअल टैलेंट’ लेख लिखकर के अंग्रेजी कविता में नई आलोचना का सिद्धांत रखा। कविता तो उसने लिखी ही थी. एक नया सिद्धांत भी गढ़ दिया। विचित्र बात है कि उसने परंपरा का नाम लेते हुए प्रयोगवाद को जन्म दिया। इसलिए आप परंपरा का नाम लेकर भी परंपरा को बदल सकते हैं। मतलब दूसरा काम था सिद्धांत गठन का। और हिन्दी में ये काम नहीं हुआ है। आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने अन्त में सोचा था ’मानदण्ड‘ नाम की एक पत्रिका निकालते थे। रसमीमांसा नाम की पुस्तक लिखकर वे रस-सिद्धांत की व्याख्या करना चाहते थे। जो वो नहीं कर सके। काव्य में लोकमंगल गीत उन्होंने लिखा। साधारणीकरण का चित्रभाव देखा। कुछ सैद्धांतिक निबंध तो लिखे उन्होंने। लेकिन कुल मिलाकर कविता क्या है? तो ‘कविता क्या है’ नाम का वो सिद्धांत भी लिख रहे थे। उनकी दृष्टि में इतिहास भी उन्होंने लिखा। परंपरा का मूल्यांकन किया। तुलसी, जायसी, सूर तीन बड़े कवियों पर लिखा। व्यवहारिक आलोचना भी की उन्होंने हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा। और रस-मीमांसा नाम की उनकी पुस्तक है। क्रोचे के अभिव्यंजनावाद पर लिखा उन्होंने। काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था लिखी। तो मेरे सामने जो आदर्श था। हिन्दी का सबसे बड़ा आलोचक। क्योंकि प्रस्थान बिन्दु कोई भी हो सकता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी तो बाद में आए। मेरे सामने सबसे पहले तो रामचन्द्र शुक्ल ही थे। उन्हीं के विश्वविद्यालय में अध्ययन करने का, और अध्यापन करने का भी मौका मिला। सुसंगत रूप में यह कहना चाहिए कि इसीलिए सिद्धांत की ओर भी दृष्टि रही है। और लेखन कविता से शुरू किया था लेकिन काशी जाकर कुछ काम अलग-अलग पड़ा हुआ है। वहाँ जाकर देखें तो पता चलेगा। मैं समझता हूँ कि इस उम्र में तो क्या काम होगा। लोग तो कहते हैं कि साठ में तो सठिया गया है। मैं तो साठ भी पार कर गया। लेकिन सिद्धांत के क्षेत्र में मैं थ्योरी का ही पेपर पढ़ाता था। जिसे अप्रोचेस टू लिटरेचर कहते हैं. तो अधिगम साहित्य के प्रति क्या-क्या हुए। चूँकि तब तक हिन्दी में उसका प्रभाव नहीं था, आलोचना के सिद्धांत बहुत सारे थे। नए-नए सिद्धांत आ गए थे. नई -नई थ्योरी आ गई थी। लिटरेरी थ्योरी का पर्चा मैं पढ़ाता था। कभी सोचा था उनकी व्याख्या करते हुए कि उसमें क्या नई चीज आई हुई है? एक सिद्धांत पर तो किताब लिखने का विचार था. ये काम कब होगा? हो जाए तब थोड़ा लगे कि हाँ कुछ किया है।

गंगा प्रसाद विमल: इसके साथ-साथ और कोई चीज जो अनछुई रह गई है?

नामवर सिंहः

© 2011 Namvar Singh; Licensee Argalaa Magazine.

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