अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

नितिका जैन

समंदर

समंदर की जैसे चादर सी बिछी हो इस ज़मीं पे
हज़ारों राज़ छिपाये अपनी गहरायी में,
मानो कह रहा हो कुछ आसमाँ से,
कि ऐ नीले आसमाँ, मुझे भी अपनी तरह ख़ुदा का आशियाँ बना,
दिल जलता है उस अब्र को देखकर,
जिससे तेरा ता-उम्र का दोस्ताना है!

मैं भी उन बेफ़िक्र परिन्दों की तरह तुझमें उड़ना चाहता हूँ,
इस ज़मीं के पिंजरे को तोड़ना चाहता हूँ
अपने अन्दर के तूफ़ानों से जूझते-जूझते थक गया हूँ मैं,
अब ज़रा सुकून से तो मुलाक़ात करा!

लोगों को मेरी ख़ामोशी देखकर कई गुमान होते हैं,
पर कैसे सुनाऊँ मैं उन्हें अपनी आहों की गूँज!
कैसे दिखाऊँ उन्हें अपनी बेकसी का आलम!
इक नन्ही कश्ती का सहारा तो मैं हूँ,
पर मेरा सहारा कौन है?
मुझे भी तो साहिल का दीदार करा

ख़ुदा ने आफ़ताब के नूर से नवाज़ा है तुझे,
दो बूँद रौशनी की मुझमें भी तो छलका!
लोग कहते हैं कि किसी छोर पे तू मुझमें समाता है,
और तेरा अक्स मुझ पे उभर आता है,
पर ये तो इक हसीन धोख़ा है,
जो हक़ीक़त से मात खा जाता है

हमारी आश्नाई की ग़ज़ल तो ये लहरें भी गुनगुनाती हैं,
अपने अरमानों के सुरों को सजाये,
ख़ौफ़नाक चट्टानों से बेख़बर,
तेरे दीदार के लिये मचल जाती हैं
अब कौन समझाये इन्हें,
कि इनके अरमानों का अंजाम तो सिर्फ़ टूट कर बिखर जाना है
मगर ये फिर से हौसलों की मुस्कान अपने होठों पे सजाये,
ख़्वाबों के टुकड़े बटोरने उठती हैं, फिर गिरती हैं, फिर उठती हैं
बस थोड़ा सा आसमान अपने दामन में छुपाने.

उम्मीद

रुके-रुके से क़दम फिर से चलने लगे
थमी-थमी सी ज़िंदगी फिर से बहने लगी
दिल में जवान हौसले फिर से मुस्कुराने लगे
और उम्मीदों की ग़ज़ल गाने लगे

हम तो अन्धेरों में खो रहे थे
और ख़ुद की हस्ती डुबो रहे थे मग़र
इस दिल की बियावान गलियों में
रौशनी फिर से छाने लगी और
मंज़िलें फिर से साफ़ नज़र आने लगी

अब तो उम्मीद के इस बाग में
वर्दह खिल रहे हैं
अपनी खुशबू भी फ़िज़ाओं में बिखेर रहे हैं
हम वक़्त को हथेली पे लिये चल रहे हैं
गिर-गिर के फिर सम्भल रहे हैं
मगर फिर भी चल रहे हैं!
न मुश्किलों से हारे, न ज़िन्दगी से
सीने में शोले दबाये हौसलों के
आफ़ताब को पाने निकल पड़े हैं
हाँ, हम ख़ुद का एक मुक़ाम बनने निकल पड़े हैं.

© 2009 Nitika Jain; Licensee Argalaa Magazine.

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