अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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अनुसृजन

अनिल पु. कवीन्द्र

चिट्ठियाँ बाँटने वाले

चिट्ठियाँ बाँटने वाले, चिट्ठियाँ बाँटने वाले
सात समन्दर पार गया वो, कर के करार गया वो
दिल भी देख-देखकर हार गया वो
माही मेरे दिल की काली कँवली, थैले में डाल ले आ.
चिट्ठियाँ बाँटने वाले..

सावन के बादल बरस जाएँ, याद प्रीतम की दिल तड़पाए
खत प्रीतम का कोई न आए
अगर उसका खत लेकर नहीं आ सकता, पता ही ला दे
चिट्ठियाँ बाँटने वाले ..

तू प्रीतम का लेकर आ संदेश, कौन है दर्दी तेरे जैसा
तेरे बगैर है मेरा सूना आँगन, सखते से प्यार बाँटकर.
रोग हड्डियों को लगा लिया.
चिट्ठियाँ बाँटने वाले..

रखवाले

ओ खेतों वालों, ओ देश वालों
सुअर तुम्हारी खेती चर गए, खेतों के रखवालों
मैंने चखा है साग बेदर का, नमक से भी फीका है
भूखी माँ हुंकार लगाती दर-दर भटकी
कौन जीवन की कीमत आँके, आज कीमत वालों
ओ खेतों वालों, ओ देश वालों

आज फ़िरकेदारी मानष खाए, काटे भाई- भाई
कौन सा लक्ष्मण मारे आके, सूपनखा के तीर
धर्म और शर्माया एक, सुन लो! श्रद्धा वालों!
ओ खेतों वालों, ओ देश वालों

आ मेहनत के सरोवर के ऊपर मुड़ जाते हंस प्यासे
कोई दो पल का मान न रखता खाली दिल के कटोरे हैं
मेहनत का फल वेल्ले खाते, सुनो मेहनत करने वालों
ओ खेतों वालों, ओ देश वालों

सुअर तुम्हारी.

वतन या क़ैदखाना

कागजों में जाम हुआ, मेहनतकशों का मेहनताना
इस तरह से जंग लाया है, दफ्तरों का कारखाना
किसी को मज़हबों की मस्ती, किसी को कुर्सी का नशा
किसी को धन का नशा,
ये देश है या शराबखाना

आओ बैठो छाँव में बनो जिन्दगी के तर्जमान
बरछे पर टँगा हुआ दिल
बन गया है शामियाना

तेरी शलाखों से भी सख्त है ज़िद हमारी
बेशक तेरे जाल अन्दर,
घिर गया है आशियाना

जुबान खोलो तो गले में है फाँसी का फंदा
हाथ उठाओ हथकड़ी है
ये वतन मेरा है या
ये है कोई क़ैदखाना!!

बुर्जुआ तानाबाना

इक तू कसाई मेरे गाँव का राजे
दूसरा तेरा साहूकार से जोड़
तेरी नींद पर पहरा तेरे मुक़दमों का
कुत्ते रखने की नहीं जरुरत

तेरे दरवाजे (समाजवाद) पर चूर्णों का लगा हुआ अंबार
जिसका ग्राहक लोहे ईंट चीनी और सीमेंट हैं
किसी के हक जैसे गया डकार
जिन्दगी की बलि बगैर, तेरे पैगम्बरों का मोड़ सके न कोई उधार
तेरी नींद पर पहरा!

तुम्हें रखूँ तब तक, जब तक मेरा भाई न सके पहचान
उसी सिपाही के सरों के नाम वसीयत हमारी, जिसकी रंडी हीर है जवान
तेरी बन्दूकों के पीछे हाथ हैं मेरे भाईयों के
खुद लेंगे वो हाथ तेरे तोड़
तेरी नींद पर पहरा है तुझे उजाड़ देंगे और

बरसा है सावन उन बच्चों के नाम पर
जिन्होंने चखा नहीं कभी खीर का स्वाद
कमियों के "जीतो" के नाम लगे जिसका रस पिएंगे गाढ़ा कमाद**
करे छेड़खानियाँ तू रूप के साथ
तेरे ऊपर दाँत पिहे वाला बोहड़
तेरी नींद पर पहरा..

कल,"जेल्लू" चौकीदार दिए होगा
वो बोले खेतों में भेजो हथियार
इकट्ठे होकर विलायती संगलों की तोड़ देनी है वाड़
बूथ*** रही ग्वालों को मार
तू राजे शीशे की पहन कर रखो पोशाक
देंगे उठे हुए हथौड़े तोड़
एक तू कसाई मेरे गाँव का राजे
दूसरा है तेरा साहूकारों से जोड़
तेरी नींद पर पहरा तेरे मुकदमों का
कुत्ते रखने की जरूरत नहीं तुझे.

* गन्ने के खेत को पंजाबी में कमाद कहते हैं.
** मेहतर की बेटी का नाम.
*** जानवरों की मुँह की बीमारी.

भारत की आजादी

सुनो सुनाऊँ हाल तुम्हे भारत की बरबादी का
घूँघट उठा कैसे देखा हमने चेहरा आजादी का
जब जुल्म की हवा चली सारी बहार लुट गई
लाखों ही मंसूरों की वो वजूद ललकार गई
संग्रामों का सूरज चढ़ा देश आजाद कराने को
कृति और किस्मत जागा है वापस मोड़ बहार लाने को
देश-विदेश में जागे भारत माता ने जिन्हें जना
बजबज थाठ जगाकर गहरी वीर जगाए थे
कण-कण अन्दर आजादी की गूँज पड़ा एक नारा था
ये देख कर गोरा बमक उठा जो बड़ा हत्यारा था
फिर भी बेझिझक हुए खोले उसने मुँह बंदूकों के
हर तरफ से आवाजें आईं दिल दहलाऊँ कूक हुई
पर भारतीयों ने मन्नत माँगी बन्द खुलासा हो?
लाशों के अंबार लगे पिण्ड..?
हवा चली फिर हर कोने से गहरे वतन प्यार की
फिर किसी ने परवाह न की कोड़े न बौछारों की
जब जुल्म की हद हो गयी जालिम जुल्म से ऊब गया
फिरकेदारी पहना के जालिम वहाँ से भाग गया
भारतमाता के दिल के टुकड़े भारत-पाकिस्तान बने
लो आजादी सात सिरों के ऐसे हाथ न आई
इसके नाम की राखी बाँधो इसकी हो बड़ाई!

मूल लेखक: संत राम उदासी

© 2009 Anil P. Kaveendra; Licensee Argalaa Magazine.

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