इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
चौबीस जनवरी एक अत्यंत शीतली भोर. घड़ी में अभी नौ भी नहीं बजे थे कि नीलिमा के पति किसी वार्ता से इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने उसे घर छोड़ने क.'अल्टीमेटम' दे दिया. नीलिमा सोच में पड़ गयी कि जीवन के लगभग तीस वर्ष जिस व्यक्ति के साथ एक छत के नीचे रहकर व्यतीत करके मैंने अपने उस घर संसार की आधार शिला रखी, यह एक ही झटके में कैसे बिखर सकता है. परंतु होनी को जो मंजूर होता है वही होता है. अब उसके पास केवल एक ही विकल्प शेष था, कि वह अपने बेटों के पास चली जाये जो दूसरे शहर में रहते हैं. उसने अपने बेटों को फोन से सूचित किया, और अपना आवश्यक सामान एक बैग में रखकर उनके पास चल दी. रास्ते भर अपनी करुण स्थिति पर आँसू बहाने के अतिरिक्त उसके पास शेष ही क्या था. उम्र के इस पड़ाव पर यह दिन देखना उसके भाग्य में लिखा था. मन अत्यंत द्रवित था न भूख थी, न प्यास थी. कई बार मन में यह विचार आया कि किसी तेज गति के वाहन के नीचे अपनी इहलीला ही समाप्त कर ले, परंतु बेटों का ध्यान आते ही उसने इस विचार को अपने मन मस्तिष्क से निकाल दिया.
सायं लगभग पाँच बजे दिल्ली बेटों के पास पहुँच कर नीलिमा का हृदय कुछ शांत हुआ. परंतु रात तो बिना एक पल को नींद आये आँखों में ही कट गयी. सुबह उठकर उसका मन अत्यंत अशांत था. इसी कारण उसने सोचा, चलो शाहदरा अपनी बुआ के पास ही हो आऊँ. माँ की मृत्यु के उपरांत एक वही तो उसके परिवार व सम्बंधियों में वृद्ध एवं सम्मानित महिला शेष हैं. नीलिमा ने कुछ आवश्यक सामान बैग में रखा. और बस से बुआ के अघर पहुँच गयी. द्वार की साँकल पर हाथ रखने के कारा.'खट' की आवाज सुनते ही उनका कुत्ता शेरू दरवाज़े की अंदर की ओर आ गया और जोर जोर से भौंकने लगा. परंतु जैसे ही नीलिमा ने कहा कि शेरू क्यों भौंक रहे हो, तुम्हारी दीदी नीलिमा है. शेरू ने भौंकना छोड़ उछलना आरंभ कर दिया. बुआ स्वयं ही बुदबुदाती हुई गेट खोलने को आई कि अवश्य ही यह नीलिमा होगी. तभी शेरू जी उछल रहे है. गेट खोल कर बुआ ने नीलिमा को गले से लगा लिया. इस स्नेहमयी आलिंगन से दुख से टूटी हुई नीलिमा के धैर्य का बाँध टूट गया वह अपने आँसू न रोक पायी और बुआ ने लिपट कर बहुत रोयी. बुआ को भी यह अनुभव होने लगा कि अवश्य ही कोई घटना घटित हुई है जिससे नीलिमा बहुत निराश है. उन्होंने उससे कुछ नहीं कहा, परंतु चुप करा के कमरे में ले गयीं, और आया तुरंत पानी लेकर आने के बाद चाय बनाने का आदेश दिया.
यद्यपि नीलिमा को कुछ शांति अवश्य मिली, परंतु हृदय व्यथित था, जिसके कारण पलके बार-बार आँसुओं से भीग जाती हैं. जीवन की इस अवस्था में कोई भी मार्ग नहीं सूझ रहा था. बुआ ने उसे बहुत समझाया सांत्वना दी, हर दुख से हिम्मत से सामना करने का हौसला रखने की सलाह दी. कुछ हितैशी सम्बंधियों ने 'वार्ड' की नौकरी दिलवाने का आश्वासन भी दिया.
शेरू लगातार नीलिमा के निकट ही बैठा रहता कभी रात को यदि वह उठ कर बैठ जाती, तो वह भी उठ जाता. उसकी ओर मुँह उठा कर देखता रहता, मानो यह रहा हो 'दीदी तुम क्यों घबराती हो, मैं तो तुम्हारा भाई तुम्हारे पास हूँ.' कहीं भी नीलिमा जाती, उसके पीछे पीछे चलकर वहीं पहुँच जाता. चौथे दिन नीलिमा की बहन का टेलीफोन आया, उसने नीलिमा से कहा, 'दीदी मैं तुम्हारे पास अपने आटे रिक्शा चालक को भेज रहा हूँ, तुम शीघ्र ही मेरे पास आ जाओ.
नीलिमा ने जैसे ही अपना सामान बाँधना आरंभ किया शेरू को लगने लगा कि दीदी अब जाने वाली है वह लगातार मुँह उठा उठा कर नीलिमा को देख देख कर जोर-जोर से भौंकने लगा. भौंकने के साथ-साथ खिसियाकर (खीजकर) रोने का स्वर भी शामिल था. ऐसा लग रहा था जैसे कह रहा हो, दीदी तुम इतनी बड़ी दुनिया में अकेली कहाँ भटकने जा रही हो, नीलिमा की आँखों से उस बेजुबान जानवर (जीव) के अतुल्य प्रेम के इस व्यवहार को देखकर झरझर आँसू बहने लगे. उसका हृदय चीत्कार कर उठा, कि क्या वह व्यक्ति जिसके साथ उसने जीवन का अधिकतम समय व्यतीत कर दिया, उसने एक ही झटके में सारे रिश्ते समाप्त कर दिये. इससे तो यह बेजुबान जानवर ही भला है जिसे प्रेम का अहसास तो है.
उसने अपना सामान बिना शेरू की ओर देखे गेट खोलकर बाहर आ गयी. उसके कानों में दूर तक शेरू के भौंकने की आवाज आती रही.
© 2009 Asha Usman; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: आशा उसमान
जन्म स्थान: अमरोहा
शिक्षा: एम. ए. (राजनीति शाष्त्र), बी. एड.
संप्रति: व्यवसाय
प्रकाशित रचनायें: कादम्बिनी में तथा अनेकों मासिक पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित
सांस्कृतिक एवं कलात्मक गतिविधियाँ: नवचेतना सहित्यिक मंच, गाज़ियाबाद की सदस्य.
संपर्क: मौ. उसमान, 32/सी, द्वितीय नूर नगर एक्सटेंशन, जोहरी फार्म, ओखला, नई दिल्ली- 25