इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
'स्वर्ग जाना चाहते हो?
'नहीं देव! केवल उस पाप से छुटकारा. 'कांपते हुए शेट्टी ने कहा जो महापुजारी के सामने हाथ जोड़े खड़ा था.
महापुजारी का त्रिपुण्डयुक्त चौड़ा मस्तक सिलवटों से भर गया, वे किसी गहरी चिंता में डूब गए और पाप-मुक्ति का विधान खोलते हुए बोले, 'ठीक है, तुम्हें देवार्चना के लिए एक मधुर स्वर इस मंदिर को देना होगा.'
'मैं समझा नहीं देव'
'देवालय को देवदासी भेंट करके तुम पाप-मुक्त हो सकते हो, अन्यथा....' कहते-कहते महापुजारी की दृष्टि बकिम हो चली.
काँपता हुआ शेट्टी महापुजारी के चरणों में गिर पड़ा 'नहीं-नहीं नाथ और कुछ न कहिए, भले मुझ में इतनी शक्ति कहाँ जो आपकी प्रथम आज्ञा को टाल सकूँ. मैं ऐसा ही करूँगा, मैं मंदिर को अर्चना का स्वर दूँगा.' महापुजारी के मुख पर हल्की मुस्कान सँवर गई, वे वरदहस्त उठाकर अपने कक्ष की ओर चले गए.
संध्या होते ही जगतेश्वर विष्णु के मंदिर का विशाल प्रांगण दीप-मालाओं से उज्वलित हो उठा. ढेर सारे दीपों, धूपबत्तियों से वातावरण जाग्रह हो उठा मानो विष्णु का क्षीर सागर धरती पर उतर आया था. मंदिर को एक पक्ष पहले जो अर्चना का स्वर मिला था, आज पहली बार आराधना करेगा. सब तरफ उमंग भरी उत्सुकता थी. विष्णु की भव्य मूर्ति के सामने बैठी देवदासी ने आँखें बंद कर सरल अलाप लिया, मंदिर की गंभीर शांति में मादकता भर गई, अर्चना का आरंभ हुआ ऐसा लगा जैसे क्षीर-सागर की कोमल लहरें विरह-वेदना से भरकर उद्ववेति हो उठी हों. आँखें बंद कर सभी उस कोमल स्वर का अनुसरण करने लगे. गीत समाप्त कर देवदासी ने अपना मस्तक विष्णु के चरणों पर रख दिया और कुछ देर यूँ ही निश्चल पड़ी रही.
'सुप्रिया!' महापुजारी का गंभीर स्वर था.
'महन्ते' देवदासी खड़ी हो गई, उसकी आँखें भीगी हुई थीं.
'आज से सब तुम्हें सुप्रिया कहेंगे.'
'जो आज्ञा देव!.'
'तुम्हारा स्वर, तुम्हारी आस्था, सब कुछ बहुत आकर्षक है.'
'इस महत्व के लिए कृतार्थ हुई महन्त!'
महापुजारी गंभीर गति से अपने कक्ष की ओर बढ़ गए और देवदासी सुप्रिया अपने कक्ष में. रात्रि के गहन अंधकार ने सब कुछ ढक लिया, लेकिन सुप्रिया का अतीत उसकी आँखों में जाग्रत-प्रकाश बन कर उतर आया. वह अपने बीते दिनों को काट-छाँट कर देखने लगी-पसीने से भीगा हुआ एक युवक उसकी कुटिया में आया था - गौर वर्ण, बलिष्ठ बाँहें, चौड़ा मस्तक, मुख पर अनवरत आभा, बाल-रवि-सा वह युवक कौन था? कोई होगा, अब क्या? यह पाप है, महापाप. मैं देवदासी होकर किसी युवक के विषय में सोच रही हूँ.' सुप्रिया ने करवट बदली उसका मन अनंत पीड़ा से कराह उठा.
'अब कहाँ होगा वह?'
चाह कर भी वह उस अतीत को टाल नहीं सकी. मानव मन का चिंतन एक नियम हीन प्रवाह है जिस पर कगारों का बंधन नहीं होता, यह प्रवाह अबाध है, अनंत है, अशेष है. सुप्रिया उद्विग्न होकर शैया से उठ खड़ी हुई, गवाक्ष के समीप जाकर उसके पट एक झटके से खोल दिये. बाहर भी उसके मन की तरह अथाह अंधकार फैला था. अंदर-बाहर का सूनापन उसे घेर्ने लगा - बापू... रुग्ण, कमजोर, उस युवक ने सहारा देकर उठाया था बापू को. फिर उस कुटिया को एक रहस्य बनाकर कहाँ चला गया वह युवक? वह रात देर तक स्वयं को अपनी कहानी सुनाती रही, प्रश्नों से भरी एक छोटी-सी कहानी, कभी ना समाप्त होने वाली कहानी.
कदाचित आपको याद होगा किसी की पाप-मुक्ति का विधान खोलते हुए एक शेट्टी को आज्ञा हुई थी एक देवदासी अर्पित करने की. यही सुप्रिया है जिसे उस शेट्टी ने उत्तराखंड से सोलह सहस्र पण में खरीदकर इस मंदिर को दिया था. तब से सुप्रिया प्रति संध्या किसी की पाप-मुक्ति का विधान बनी देव प्रतिमा के चरणों पर अर्चना का दीप बनकर जल रही है. इस मंदिर में अनेक देवदासियाँ हैं सभी ईश्वर की पूजा का अंग हैं, इन्हें सब सुविधाएँ प्राप्त हैं पर यहाँ के बंधन और नियम अत्यंत कठोर हैं. यह मंदिर इनके लिए एक कारागार की तरह है. यहाँ रहने वाली देवदासी के लिए बाहर के विषय में सोचना भी घोर पाप है. सुप्रिया को महापुजारी की कुछ अधिक ही कृपा प्राप्त है, पर पता नहीं क्यूँ वह मंदिर की इन कठोर प्राचीरों को लांघकर भाग जाना चाहती है, वह जानती है कि देवता के चरणों पर अर्पित एक पुष्प की तरह उसका जीवन अब उसका नहीं है.
एक संध्या, अर्चना की आरती के पश्चात सुप्रिया त्रिदीप-नैवेद्य हाथ में लिए खड़ी थी. दीप के आलोक ने उसके सौंदर्य को द्विगुणित कर दिया था - उसकी कजरारी विशाल आँखें, तेजमय मस्तकण घनी लम्बी घुंघराली केश-राशि, रक्तिमवर्ण और पँखुणी के से कोमल होंठ - यौवन की दोहरी पर खड़ा उसका कैशोर्य अद्वितीय था. सुप्रिया को ईश्वर से कांतिमय-स्वर्णिम सौंदर्य मिला था. उसने देखा पूज्यपद महापुजारी खड़े हैं, उसे देख रहे हैं. वह आग्रह और अनुग्रह से झुक गई.
'शत-शत आशीर्वाद सुप्रिये!' महापुजारी ने कहा, 'तुम्हारे गुरु ने सूचित किया कि तुम नृत्य में अद्वितीय हो.'
'आप की अनुकम्पा है देव.'!
महापुजारी सुप्रिया को देख रहे थे उनके मुख पर एक रहस्यमय मुस्कान थी.
सुप्रिया का रक्ताभ मुख दीपलोक में दिनकर सा दहक रहा था. एक पल सन्नाटा छाया रहा. महापुजारी ने सरस स्वर में कहा, 'वसंत का महापर्व आने वाला है, सुप्रिया! उस दिन तुम्हारी प्रतिभा की कठिन परीक्षा होगी. अपार जन-समूह और राज-पुरुषों के समक्ष तुम्हें अर्चना का वसंत-पर्व संपन्न करना होगा, इसके लिए लगन और परिश्रम की आवश्यकता है, तुम्हारा नृत्य-अर्चन इस वसंत-पर्व पर तुम्हें मुख्य-देवदासी बना सकता है, मुझे तुम पर पूरा विश्वास है, मेरी शुभकामनाएँ.' कहकर महापुजारी चले गये.
सुप्रिय नैवेद्य को प्रभु-चरणों में धर कर चली गयी. अपने कक्ष में पहुंच कर वह अपनी शैया पर गिर पड़ी, उसे असहाय जान कर फिर वह चिंतन ने घेर लिया - अंतिम सांस भरते रुग्ण बापू से उस युवक ने कहा था, 'मैं वचन देता हूँ.....'
'लेकिन सुप्रिया यह सब पाप है.' एक स्वर अनजान दिशा से कठोर आदेश की तरह आया. उसके मन ने उस आदेश की अवहेलना कर डाली, वह निश्चय कर बैठी - आज मैं जी भर सोचूँगी, केवल आज, सब कुछ सोचूँगी - वह भी जो नहीं सोचना चाहिए, आज के पश्चात फिर कभी नहीं. वह यूँ ही पड़ी सोचती रही - अनंत, असीम, अबाध. उसमें अरुण मस्तक पर ठहरी स्वेद की बूँदें आ गईं, सुप्रिया के मन पर ढेर सारे बादल घिर आए, गरजे, सघन हुए और बरस पड़े. उसके जीवन में फिर वैसा ही सवेरा हुआ, वही संध्या आई. वह अपने मन के हाथों हार गई. देवदासी होकर भी वह निर्जन-वन की उस एक रात को न भूल सकी. उसकी स्मृति में कोई परिवर्तन नहीं आया क्षणों और पलों का क्रम चलता रहा.
चारों ओर सरस हरीतिमा फैल चुकी थी, ऐसा लगता था जैसे छोटे-छोटे पौधे, हरा दुशाल ओढ़े हाथों में पुष्प लिए भगवान विष्णु की अगवानी में खड़े थे. हवा के झोंकों से पेड़ों की शाखाएँ ऐसे लिए रही थीं मानों ताक-झाँक कर किसी अजनबी को देखने का प्रयास कर रही हों. विरही निर्झर पर्वतों को विरह का वेदना-गीत सुना रहे थे और एक सर्वोच्च पर्व. शिखर गंभीर खड़ा सबको धैर्य का उपदेश दे रहा था. कई दिन से मंदिर के प्रांगण को बन्दनवारों से पूरा जा रहा था. पुष्पों और कन्दर्पों से तोरण-द्वार बनकर तैयार हो चुके थे.
पूर्व की ओर एक विशाल मण्डप बनाया गया था. विष्णु जगतेश्वर की प्रतिमा को घेर कर बनाए गए इस मंडप में ठीक मूर्ति के समक्ष महापुजारी का सर्वोच्च आसन था जो इस युग में धर्म की सर्वोच्चता का प्रतीक था, इसके दाईं ओर देवालय के अन्य पुजारियों के लिए स्थान था. पण्डाल में आवश्यकतानुसार ज्योति-स्तंभ खड़े थे. इस में राज्य की प्रजा के बैठने के लिए पर्याप्त स्थान था.
समस्त तैयारी के बीच सुप्रिया वैसी ही बैठी थी. अपने प्रकोष्ठ से निकलकर वह वाटिका की ओर चली गई - कल ही तो वसंत-पर्व का वह पल आएगा जब उसे मुख्य देवदासी का गरिमा पद प्राप्त होगा. पर उसे वह सब बेहद सारहीन लग रहा था. अब वह सोने के पिंजरे में बंद एक विवश पक्ष की तरह अनुभव कर रही थी अपने आप को. उस रात वह ठीक से सो नहीं पाई उसकी आँखें इतिहास के तरल सागर में तैरती रहीं, उन्हें कोई किनारा नहीं मिला स्वार्णिम आभा पसारती सी अनुरंजित चुनरी ओढ़े प्रकाश की थाली हाथ में लिए ऊषा ने कोमल चरण धरती पर रखे. आज वसंत का महापर्व है इस मंदिर के जीवन का सबसे उल्लसित दिन. सुप्रिया जानती है कि आज उसकी कठोर परीक्षा का भी महापर्व है, आज की संध्या उसे संपूर्ण जनपद की देवी बन देगी, उसका स्वर आज से सबका स्वर बन जाएगा, उसका जीवन आज से सार्वजनिक हो जाएगा. उसकी अर्चना का स्वर क्षीर-सागर तक विस्तृत हो जाएगा. वह स्वर्ग की देवी बन जाएगी. जिस अवसर के लिए अन्य देवदासियाँ तरसती हैं, कठिन परिश्रम करती हैं वह अवसर अनायास ही उसके द्वार पर आ खड़ा हुआ था, फिर भी उसमें कोई उमंग न थी, कोई उत्साह न था, वह अपने मन के हाथों विवश थी.
प्रात: से ही मंदिर में हलचल थी, सब अपने-अपने कार्यों के लिए दौड़ रहे थे, रंग कर्मी मंदिर के प्राचीरों को रंग दे रहे थे. रचनाकार खण्डित स्थलों को आपूर्त कर रहे थे, शिल्पकार प्रश्तर-प्रतिमाओं को सँवार रहे थे. सबके अंदर एक अनोखा उत्साह था, बीच-बीच में लोग सुप्रिया का नाम ले रहे थे. आलस्य-बोझिल सुप्रिया बुझी-सी एकांत में बैठी थी उसने देखा पुष्पों से लदी डालियों पर मधुकर अटखेलियाँ कर रहे हैं उसे लगा जैसे इस समस्त मुखर परिवेश में कुछ कलियाँ मौन हैं. वह देखती रही, सोचती रही - कितना आश्चर्यजनक है अपना-अपना सच? लाचार-सी संध्या विवश सुप्रिया के द्वार पर आ खड़ी हुई.
वसंती-संध्या के स्पर्श से वायु स्पंदित हो उठी, प्रकृति के काव्यात्मक श्रृंगार से पेड़ पौधे गतिमय हो चले. संपूर्ण प्रदेश सुहावने परिदृश्य में परिणत हो गया. आज जनपद का प्रत्येक व्यक्ति नई देवदासी-सुप्रिया के विषय में ही सोच रहा था. संध्या होते होते मंदिर के समीप भीड़ बढ़ने लगी. नक्षत्रों की झलक के साथ ही मंदिर का मुख्य द्वार खोल दिया गया. उत्सुक जन-समूह बाढ़ के पानी की तरह अंदर भर गया. सभी इस प्रयास में थे कि नृत्य मंच के समीप स्थान ले सकें. प्रबंधक जन-समूह को नियंत्रित करने में जुट गए. थोड़े देर में पूरा प्रांगण भर गया. सभी आसन अभी तक रिक्त थे.
अगरु और केसर की सुगन्ध फैली थी, प्रकाश स्तंभों पर ज्योति-शलाखाएँ प्रज्जवलित थी. परिवेश उतना धार्मिक नहीं था जितना मादक. सभी एक अवर्णनीय क्षण की प्रतीक्षा में मौन बैठे थे कि अचानक पार्श्व से कोलाहल उठा महापुजारी ने मण्डप में प्रवेश किया, सभी अपनी-अपनी जगह खड़े हो गए. उनके साथ अन्य पुजारी भी थे. उन्होंने अपना वरद-हस्त उठाया और अपने आसन पर बैठ गए, अन्य पुजारी भी अपने आसनों पर जा बैठे. प्रजा भी शांत हो बैठ गई. एक कोलाहल फिर हुआ - अबकी बार युवराज कीर्तिभट्ट आए फिर उसी तरह प्रजा शांत हो गई, युवराज ने आते ही महापुजारी से आशीर्वाद लिया और अपने आसन पर चले गए. सभी समझ गए कि अब पर्व प्रारंभ होगा.तूर्य-नाद के साथ जगतेश्वर विष्णु के समक्ष बने मंच का पट खुला-रत्न-खंचित रक्ताम्बर से प्रभु की भव्य-मूर्ति सुसज्जित थी. प्रतिमा का आकर्षक शृंगार सबकी आँखों से मन में उतर गया. भगवान विष्णु की मूर्ति समस्त कलाओं का केंद्र लग रही थी.
मंच के दाएँ छोर से हाथों में दीप लिए देवदासियाँ आयीं और कतार में मूर्ति के समक्ष दीप रखकर बायीं और चली गईं. एक क्षण मंच पर सन्नाटा रहा फिर कई वाद्य यंत्र ध्वनित हुए, एक मधुर धुन के साथ कई सुसज्जित देवदासियों का समूह मंच पर आया, इन्हीं के मध्य सबसे पृथक परिधानों में देवदासी सुप्रिया समूह के ठीक मध्य में थी, इन सभी के मुख मूर्ति की ओर तथा पीठ जन-समूह की ओर थे. उन्होंने अर्चना के विधान का प्रथम चरण-संपन्न किया, इसके पश्चात सभी देवदासियाँ दाएं-बाएँ पार्श्व में चली गईं. सुप्रिया अभी भी विष्णु श्री के चरणों में नत थी.
मृदंग पर थाप पड़ी देवदासी की देह में नृत्य की थिरकन दौड़ गई. नृत्य भाव में ज्यों ही सुप्रिया ने अपना मुख प्रजा की ओर किया, देवी सुप्रिया की जय का नारा गूँज उठा. उस अप्रतिम सौंदर्य को देखकर सब चकित रह गए.
युवराज ने जब देवदासी को देखा तो देखते ही रह गए, एक क्षण के लिए उन्हें लगा जैसे यह एक सपना है. वे अपने आसन पर खड़े हो गए पर उन पर किसी का ध्यान नहीं था.
'नृत्य बंद किया जाए!' एक कठोर स्वर ने सारे मादक वातावरण को चीर कर रख दिया. सब ने विश्मय से देखा - युवराज कीर्ति भट्ट एक जलती अग्नि की तरह तमतमा रहा था. महापुजारी ने आश्चर्य से युवराज को देखा,
'युवराज!'
'हाँ महन्त! यह नृत्य नहीं हो सकता!' जन-समूह को पार करती हुई सुप्रिया की दृष्टि युवराज पर जा टिकी, वह एक क्षण के लिए चेतना-हीन हो गई, इतिहास का एक टुकड़ा उसकी आत्मा को रौंदता हुआ निकल गया, 'आप?' उसके मुख से निकला यह शब्द कोई नहीं सुन पाया. वह पत्थर की प्रतिमा की तरह जड़ हो गई.
महापुजारी ने कहा, 'युवराज! तुम प्रजा के स्वामी हो ईश्वर के नहीं. यदि यह तुम्हारी आज्ञा है तो तुम अनाधिकार चेष्टा कर रहे हो, और यदि यह तुम्हारी इच्छा है तो धार्मिक परंपरा तोड़ कर तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं की जा सकती. सुप्रिया. की पलकें गीली हो गई जिन्हें किसी ने नहीं देखा.
निर्भय खड़े युवराज ने कहा, 'मेरी आज्ञा और इच्छा का अंतर आप न पूछे गुरुदेव! बस इतना जान ले कि यह नृत्य नहीं होगा.
'यह जानना धर्म का अधिकार है.'
'जिस धर्म पर मानवीय इच्छायें लद जाएँ उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर प्रश्न-चिन्ह लगाने का अधिकार नहीं रह जाता.'
पहली बार महापुजारी को ऐसे विरोध का सामना करना पड़ा, वे इस अप्रत्यासित घटना से हिल गए. 'युवराज! यह नृत्य ईश-उपासना का आवश्यक अंग है, देवदासी मंदिर की अर्चना का स्वर. धर्म कहता है कि उपासना में इस प्रकार विघ्न डालने वाल नास्तिक जनता का स्वामी नहीं बन सकता.'
'मैं अपने हृदय का स्वामी तो बन सकता हूँ, आपकी आस्तिकता की परिभाषा किसी को भी नास्तिक बना सकती है, 'युवराज अडिग खड़ा था. महापुजारी ने थोड़ा नम्र होते हुए कहा. 'मुझे भी आश्चर्य है युवराज! तुम इस नृत्य में कौन सा अप्रिय देख रहे हो, मैं भी आश्चर्य निवारण चाहता हूँ परंतु इससे पूर्व चाहता हूँ इस पर्व की संपूर्णता. तुम बैठ सकते हो.' युवराज ने अभय मुद्रा मं प्रतिवाद करते हुए कहा, 'नहीं महन्त! मैं चाहता हूँ पहले इस आश्चर्य का निवारण.
सब आश्चर्य से युवराज को देख रहे थे, चारों तरफ एक कोलाहल फैला था, सबको शांत करते हुए महापुजारी ने एक दृष्टि देवदासी पर डाली जो अभी भी एक सुसज्जित प्रतिमा-सी खड़ी थी. युवराज ने सहज दृष्टि से देवदासी सुप्रिया को देख कर महापुजारी की ओर घूमकर घोषणा के स्वर में कहा, इस महापर्व की नृत्यान्गना देवदासी नहीं है.'
सुप्रिया थरथर कांपने लगी, युवराज को यह अच्छा न लगा. सब आश्चर्य से एक-दूसरे को देखने लगे - एक समवेत स्वर सुनाई पड़ा-देवदासी नहीं है?
'हाँ यह देवदासी नहीं, इस साम्राज्य की होने वाली महारानी है.'. युवराज ने कहा. भीड़ यह सुनकर खड़ी हो गई, सब तरफ एक अनोखी हलचल थी. ऐसा लगा जैसे महासागर एक पल के लिए निश्चित हो गया हो.
'हाँ..' युवराज ने भीड़ के हल्के से शोर को अपने तीव्र स्वर से ढकते हुए कहा.' कुछ दिन पूर्व मैं जब कौशल नरेश का अतिथि था तो शिकार के पीछे भटक कर मैंने एक कुटिया में शरण ली थी. उसी रात मैंने एक रुग्ण राज-पुरुष को वचन किया था कि मैं उसकी कन्या का वरण करूँगा. यह वही कन्या है.' कहते-कहते युवराज रूक गया, सब तरफ एक गहरा सन्नाटा भर गया, महापुजारी आश्चर्य से युवराज को देख रहे थे.
सब कुछ समझते हुए भी महापुजारी ने कहा.' युवराज.'! भूल करते हो, देवता के चरणों पर गिरे पुष्प को फिर उपवन में नहीं सजाया जा सकता. यह धार्मिक अनुशासन है कि मंदर की प्राचीरों को लाँघ कर कोई देवदासी महारानी नहीं बन सकती.
'जिस पुष्प को स्वयं देवता ने किसी को दान कर दिया हो उसे विवशता में बांध कर देवदासी भी नहीं बनाया जा सकत.' युवराज ने तीखे स्वर में महापुजारी का प्रतिवाद किया.' और फिर कोई भी नियम अपनी अमरता लेकर धरती पर नहीं उतरता, मानव की दृष्टि ही उपयोगिता और आवश्यकता के आधार पर नियम बनाती-बिगाड़ती है.'
'कुछ भी हो एक देवदासी महारानी नहीं बन सकती.'
'यह महारानी चाहे न बन सके पर मैं इसे देवदासी नहीं बनने दूँगा.'
'तुमने इसे उसी समय क्यों नहीं अपना लिया था?'
'मैं उस समय किसी का अतिथि था और वह राजपुरुष दण्डित था, राजा का अतिथि होकर उसके दण्डित राज-पुरुष की कन्या को अपनी अर्धांगिनी बनाना धृष्टता होती, महन्त.' युवराज ने कहा.' और कुछ दिन पश्चात जब मैं फिर उस पर्ण कुटी में गया तो वह शून्य थी.'
महापुजारी को विश्वास हो चला कि अब युवराज से अधिक विवाद करना निरर्थक है, उन्होंने एक नये लक्ष्य की ओर संधान करते हुए कहा.' क्या कोई एक देवदासी को साम्राज्ञी के रूप में स्वीकार करेगा?'
प्रश्न स्वाभाविक था और कठोर भी. युवराज ने तत्काल उत्तर दिया.' राज्य मेरा कर्तव्य है, अधिकार नहीं, जब जनपद को मेरी आवश्यकता नहीं रहेगी मैं स्वयं राज्य को छोड़ दूँगा, परंतु सुप्रिया के पिता को दिया वचन मैं नहीं तोड़ सकता.
'सोच लो!'
'महन्त! यह कोई व्यापार नहीं कि लाभ-हानि के आधार पर निर्णय लिया जाए.'
सुप्रिया इस सारे विवाद में जड़ प्रतिमा सी खड़ी थी, पर विवाद के इस मोड़ पर वह हिल गई. वह मंच से उतर कर दौड़ी और महापुजारी के चरणों में आ गिरी.' दया करो देव दया करो, मैं देवदासी रहने के लिए बनी हूँ और युवराज सम्राट बनने के लिए.'
'सुप्रिया! तुम देवदासी बनी रहना चाहती हो और युवराज, युवराज नहीं रहना चाहते, किसकी इच्छा पूरी की जाए?
पुष्प की कुछ पंखुड़ियाँ जो सुप्रिया के कोमल चरणों पर लगी थीं गिर कर धूल में मिल गयीं.
'एक बार फिर विचार कर लो युवराज कीर्ति भट्ट.'. बंकिम दृष्टि से महापुजारी ने युवराज को देखा.
'मेरा विचार अटल है, महन्त!'
युवराज की दृढ़ता के सामने सारा वातावरण जैसे पराजित हो गया, सभी आश्चर्य से जकड़े पाषाण-मूर्तियों की तरह युवराज को देख रहे थे. क्या होगा कोई नहीं सोच पा रहा था. धर्म की जीत हुई या प्रेम की हार कोई नहीं समझ सका. युवराज कीर्ति भट्ट को साथ लेकर उस भव्य-प्रांगण से बाहर चला गया.
देवदासी प्रभा ने इस अधूरे महापर्व को संपन्न किया. युवराज लौटकर फिर इस धर्म प्रधान साम्राज्य में नहीं आया, पर उसने धार्मिक परंपराओं के गलित साम्राज्य को पराजित कर दिया. इस साम्राज्य के लोग बहुत दिनों तक सुप्रिया और कीर्ति भट्ट के प्रेम की गाथा को याद करते हैं.
© 2009 Braj Kumar Mittal; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: ब्रज कुमार मित्तल
जन्म स्थान: मुजफ्फर नगर (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा: पी- एच. डी., इलाहाबाद विश्वविद्यालय
संप्रति: इलाहाबाद के प्रतिष्ठित महाविद्यालय ई. सी. सी. में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष एवं कला संकाय के डीन
प्रकाशित रचनायें: अनेकों रचनायें तमाम प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित; नाटक - चाणक्य और चाणक्य, यह सिंहासन अपना है, अपने अपने अंधेरे, यह क्या हो गया; दूरदर्शन से 'जेलर की डायरी से' धारावाहिक का प्रसारण.
कहानी संग्रह: पारदर्शी चेहरा.
सांस्कृतिक एवं कलात्मक गतिविधियाँ: साहित्य की तमाम विधाओं कहानी, नाटक, काव्य का मंचन.
संपर्क: हिन्दी विभाग, ई. सी. सी., इलाहाबाद.