अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

दीपमाला महला

मेरा कच्चा आँगन

सौंप दी है तुम्हें
अपने सपनों की धरती
अपने सपनों का आकाश

अब बो ओ तुम बीज
भरो तुम रंग
इंद्रधनुष के, चाँदनी के, अमावस के
या फिर मेरे तुम्हारे
फिर जियो तुम
और पियो तुम

लौटा नहीं सकते तुम मुझे
मेरे हिस्से के ज़मीं अंबर
क्योंकि अब मैं नहीं हूँ
मैं तो हो गयी हूँ तुम

आती है न तुम्हें
महक मेरे कच्चे आँगन की
अपने दिल से.

नाम तुम्हारा

सपनों की पगडंडी पे चलते चलते
ओस को हथेलियों पे मलते मलते
मैंने लिया नाम तुम्हारा

और वो लिख गया
मेरे होठों की सिलवटों में

अब जब भी रचाओ मुस्कान मेरे होठों की
पढ़ लेना नाम अपना.

© 2009 Deepmala Mahla; Licensee Argalaa Magazine.

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