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शिखर

गंगा प्रसाद विमल

अकहानी आंदोलन के जनक एवं वरिष्ठ कवि गंगा प्रसाद विमल से अनिल पु. कवीन्द्र की बातचीत

अनिल पु. कवीन्द्र: अपने समकालीन कवियों पर आपकी क्या राय है?

गंगा प्रसाद विमल: समकालीन से मतलब है जो मेरे समय के लेखक हैं, जिन्होंने साथ-साथ लिखना शुरू किया था। वो इस अर्थ में समकालीन हैं कि हम लोगों ने साथ-साथ लिखा। जो समकालीनता से लोग अर्थ लेते हैं वो है - अद्यतन। जो आज लिख रहे हैं वो कैसा लिख रहे हैं? मेरे समय के समकालीन रचनाकारों ने अच्छी रचनाएँ लिखी। और ख़ासतौर से इसलिए कि जो मेरे समकालीन थे उनको दो तरीके से देखना चाहिए आज। और ये बहुत कठिन काम है। एक - उस वक्त जो कविताएँ लिखी गई थीं, उन पर ज़्यादातर ये आरोप लगाया गया कि ये एकदम बड़बोली कविताएँ हैं और या फिर ये कि हमारे बहुत सारे दूसरे घेरों में नहीं आतीं। आज देखना ये है कि 1960 के बाद का जो पूरा माहौल था उसको याद करना पड़े। 1960 के बाद के माहौल में जो युवा चेतना थी, उसके मन में क्या गुस्सा था? वो एक तरह से रचनाओं में उभरकर आया है? ख़ासतौर से एक उदाहरण लेना ठीक रहेगा कि उसी समय कविता की बहुत सारी जो वृत्तियाँ हैं वो भी आ रही थीं। बंगाल की बहुत प्रसिद्ध पीढ़ी या मराठी या तेलुगू की पीढ़ी लगातार एक ही समय में निकली। और ये आकस्मिक नहीं था, बल्कि कहना चाहिए कि उनकी कविता में एक वैश्विक रूप था। उस समय में जो युवा लोग थे, वो एसर्ट करने लगे। अर्थात ये वो लोग हैं जो आजादी के दस साल बाद युवा होने लगे। आजादी के बाद इन रचनाकारों की चिंताएँ, रुख, परेशानियाँ बिल्कुल स्पष्ट हैं। इसलिए मुझे लगता है कि आज ज़रूरत है जो 60 के बाद की कृतियाँ हैं, खासतौर से कविता, उस पर सोचने की ज़रूरत है। उन लोगों ने ऐसा क्यूँ किया होगा? एक आरोप ये लगाया जाता है कि इन्होंने खुले तौर पर यौन क्रियाओं, व्यवहारों का प्रयोग किया। मुझे नहीं लगता कि उस समय के अनेक कवियों ने ऐसा किया होगा। हाँ एक-दो कवियों ने ऐसा ज़रूर किया। इस तरह से तो आरोप सिद्ध करने वाले लोग इन्हें उद्धृत करके आरोप लगाते हैं, पर मैं तो लोगों से कहता हूँ कि मेरी कोई ऐसी रचना, कविता बताओ, जो इस ढंग से लिखी गई। मुझे भी गुस्सा था उन्हीं की तरह, लेकिन कहना यही चाहिए कि इसे दो तरह से देखना होगा। एक भारतीय संदर्भ में इसे देखा जाना चाहिए। दूसरा इसे वैश्विक संदर्भ में देखना होगा। वैश्विक स्तर पर कई लोगों ने अपने ढंग से इस पर अपनी प्रतिक्रियाएँ दी हैं। वो दौर, पूरे विश्व भर में जो स्थापित मूल्य हैं, इनसे कैसे लोहा लिया जाए, ये चिंता थी। और स्थापित मूल्य ऐसे थे जो सनातन मूल्यों से जुड़े हुए थे। और जो सनातन मूल्यों से जुड़े हैं उनसे आप अगर लोहा लेने का प्रयत्न करें तो आप दरकिनार हो जाएँगे। आपका हुक्का-पानी बन्द हो जाएगा। तो सारा ख़तरा उस समय में इन मूल्यों को लेकर था। जिन्हें लेकर कुछ युवा रचनाकारों ने रचनाएँ लिखनी शुरू कीं। और जो दूसरी बात मैं कहना चाहता हूँ कि ये बातें वहीं ख़त्म नहीं हो जातीं। कभी-कभी लोग ये सोचते हैं कि जिन्होंने 1960 में लिखना शुरू किया तो वे 1960 के लेखक हो गए। ऐसा नहीं होता। वो लोग आगे चलते हैं। जो परिवर्तन होते हैं, उन परिवर्तनों को लेकर साथ चलते हैं। और मुझे अब महसूस होता है ये कि ज़्यादातर वो सत्ता पक्ष के विरोधी रहे हैं। और वे आज तक सत्ता पक्ष के विरोधी हैं। अब अगर दूसरे समकालीन घटकों को देखें, अक़्सर लोग कहते हैं कि हमारी जो प्राचीन शैलियाँ थीं, वो शैलियाँ अभी भी कारगर हो सकती हैं। लोगों ने दोहे लिखने शुरू किए। लेकिन दोहों में जो अपने समय का सर्वोत्तम था, वो तो मध्यकाल में कह दिया गया। अब दोहे की शैली में आधुनिक रूपक को कहने का मतलब मुझे तो यह नज़र आता है कि आप 1000 कि.मी. की दौड़ में शामिल है। और हवाई जहाज त्याग करके आप घोड़े पर सवार हो गए। शैली पर सवार होना सही है, मुझे इसका रूपक समझ नहीं आता। परन्तु ये लगता है कि इसको समूचे और समग्र तौर पर ही देखा जाए कि हिन्दी कविता की गतिविधि किस रूप में महत्त्वपूर्ण है। हम लोग जब अक़्सर तुलना करते हैं तो अतीत के कुछ बड़े कवियों को ले आते हैं। कि वहाँ से हम आगे बढ़े कि नहीं बढ़े? और यही परिणाम है। अब इसे विश्व-कविता के संदर्भ में लें तो जो आज अति क्रांतिवादी हैं, सत्ता के विरोधी हैं, उन्हें दो कवियों को पढ़ लेना चाहिए। एक यूनानी कवि हैं कवाफी। कवाफी आज भी मोहित करते हैं। और एक चीनी कवि हैं बाईजू। इन दोनों कवियों के हिन्दी अनुवाद मिल जाते हैं। कहने का अर्थ ये है कि उन लोगों ने अपने समय में जो संघर्ष किया, वो संघर्ष किसी बहुत छोटी चीज से नहीं निकला। कोई बहुत छोटा जातिवाद नहीं था उनमें। उनकी समूची चिंता थी, किंतु जब शक्ति कुछ ऐसे लोगों के हाथ में आई, जो लोग समाज की चिंता से पूरी तरह से वाकिफ़ नहीं हैं, तब वो लोग अपने मनमाने तरीके से काम करें। ये मनमाने तरह से काम विचारधारा के लोग करते हैं। कभी-कभी जो बहुत क्रांतिकारी विचारधारा के लोग होते हैं, जब वो सत्ता में आते हैं तब वो ऐसे व्यवहार करने लगते हैं जैसे कि सत्ता प्रतिष्ठानों में जमे हुए लोग करते हैं। तो इसलिए इस अर्थ में हिन्दी कविता में संभवतः भारतीय कविता में सबसे बड़ी एक धारा है जो वैश्विक कविता के मुकाबले में आगे आ गई। जो नए से नया कवि हैं, उसके मन में कभी ये इच्छा न होगी कि वो वैसा लिखे जैसा लोग लिख चुके हैं। और यही एक कसौटी है। वो अपने ढंग से लिख रहा है। क्या लिख रहा है, कैसे लिख रहा है, हो सकता है अभी शैलीगत परिपक्वता न हो। हो सकता है अभी भाषा पूरी तरह न आई हो, लेकिन धीरे-धीरे हर पीढ़ी अपने लिए नई भाषा चुनती है। और वो नई भाषा जब आदर्श भाषा बन जाती है, तब लोग कहने लगते हैं कि ये पिछले से भिन्न है। इस अर्थ में जब समकालीन कविता पर विचार करेंगे तो मुझे लगता है, बहुत लंबा इसका घेरा है। और इस लंबे घेरे में देखना ये है कि ऐसे सवाल कौन से हैं, जिनसे आजादी के बाद का समकालीन युवक भी टकराता था, 20वीं शताब्दी के अन्त का लेखक भी टकराता था और 21वीं शताब्दी का लेखक भी उससे लोहा ले रहा है। ये समकालीनता का जो दायरा है, वो विस्तृत है। उसके कुछ घटक हैं, जिसमें हम यह परीक्षण कर सकते हैं कि हम कविता के मामले में कहाँ से कहाँ पहुँच रहे हैं। मुझे लगता है कि इस पर बहुत गहराई से सोचना चाहिए।

अनिल पु. कवीन्द्र : इसी से जुड़ा हुआ सवाल है. ये माना गया, आजादी के बाद हमने एक सुखद स्वप्न को यथार्थ के लिए रखा था, लेकिन जब हम साहित्य में देखते हैं तो ये आरोप लगाया गया कि पाश्चात्यीकरण साहित्य में ज्यादा हुआ और पाश्चात्यीकरण कुछ ख़ास संदर्भों में हुआ। ये संदर्भ थे एकांतिकता, दूसरा रूग्णता, तीसरा यथार्थ को कड़वाहट भरे अनुभवों से गुज़र कर देखना। जबकि जो आज़ादी हमें मिली उस आजादी को कहा गया कि ये सुखद स्वप्न था, जिसे हमने प्राप्त किया। और उसे हम इस दृष्टि से देखने की बजाय पाश्चात्यीकरण की दृष्टि से देख पा रहे हैं। इस पर आप क्या कहते हैं?

गंगा प्रसाद विमल: असल में पाश्चात्यीकरण जो है एक सदी का रंग है। जो आरोप लगता है. मुख्य रूप से हमें ये देखना है कि हम अपनी भाषा में वैसे ही हैं। जैसे पाश्चात्य के लोग हैं, हम वैसे नहीं हो पाए। हम अपने आचरण में भले ही ये कहें कि कुछ-कुछ उन जैसे हुए। लेकिन अपने विचारों और अपनी भाषा में नहीं हो पाए। तो इसका एक अर्थ ये है कि हम पाश्चात्यीकरण का एक रूप तो लेते रहे हैं, लेकिन ये आरोप लग रहा है। मुझे लगता है कि इसे एक नए परिदृश्य में देखना चाहिए। जब हमें स्वतंत्रता मिली तो स्वतंत्रता के जो नए मूल्य निर्मित हुए, उन नए मूल्यों में प्राचीन जो हमारे गणतंत्र थे, जैसा इतिहास में कहा जाता है, उनसे भिन्न थे। एक तरह से हमारी जो जनता है उसको कहा जाता है कि वो आगे आए। और जनता के पास कोई विकल्प नहीं था कि वो जाति और धर्म से उपर उठकर सोच सके। जो पहला आरोप है पाश्चात्यीकरण का, वो इस दृष्टि से देखना चाहिए कि हम पश्चिम के संपर्क में आए। और जैसे ही हम पश्चिम के संपर्क में आए तो उनकी चीजें थोड़ी हमें अच्छी लगीं। ज़ाहिर है, हम आजादी से पहले जिस पश्चिम को जानते थे, वो पश्चिम सिर्फ़ बरतानिया था। क्योंकि अंग्रेज़ों ने हमारी उतनी ही खिड़की खोली थी। तो बरतानिया का जो अंश सर्वश्रेष्ठ था, वो अंश हमें पसंद आया। जैसे हमें शेक्सपियर पसंद आए, कीट्स पसंद आए, हमें मिल्टन पसंद आए। हमें वहाँ के जे. एन. थामस पसंद आए। आज़ादी के बाद जिन्हें हमने पढ़ना शुरू किया। लेकिन आज़ादी के बाद हमारे सामने पूरी दुनिया भी खुल गई। हमें लगा कि हम अब सीधे देखें। कि स्पानी में क्या हो रहा है? हमने बहुत सारी चीजें अंग्रेज़ों के चश्मे से देखी थीं। अब हमने अपने चश्मे से देखना शुरू किया। तो उसमें थोड़ा बहुत प्रभाव जरूर आया। इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन जो मुक्त छन्द है, उसे पश्चिम का कहना थोड़ा सा ज़्यादती होगी। क्यूँकि जो मुक्त छन्द है, उसका प्रयोग जयशंकर प्रसाद ने भी किया है। और मुक्त छन्द का प्रयोग पहले भी हो चुका है। ऐसा नहीं है कि हम पहली बार उसका इस्तेमाल कर रहे हैं। झगड़ा सिर्फ़ इतना है कि लोग कहते हैं भारतीयता छन्द में ही निहित है। लेकिन छन्द के नए अविष्कार होने बन्द हो गए। सबसे ज्यादा जो छन्द की आविष्कृतियाँ हैं, वो निराला द्वारा सबसे अन्त में हुईं। जो आपके छन्द के दिए गए विधान हैं, उससे अलग था। लेकिन हुआ ये कि जो एक आवेगात्मक विषय है। उसे किसी एक खास परंपरा में या कहना चाहिए कि शैली में बांधना थोड़ा कठिन था। और उसके लिए मुक्त होना बहुत ज़रूरी था। इसके कारण बहुत से हो सकते हैं, ये नहीं हैं। व्याख्यात्मकता, गीतपरकता, छायात्मक कविताएँ कहीं -कहीं लिखी गईं। और उसका परिणाम क्या हुआ कि हमारे एक बहुत बढ़िया कवि हैं -दुष्यंत कुमार। उन्होंने बहुत अच्छी कविताएँ लिखी थीं। उनकी जो पहली क़िताब है ’सूर्य का स्वागत‘ अद्भुत हैं। वो सारी मुक्त-छन्द में है। लेकिन उनको लगा कि नहीं, ज़्यादा बेहतर है कि मैं छन्दमय होकर कहूँगा। वो भी कौन सा छन्द जो ग़ज़ल शैली है, उसमें कहूँगा। और उन्होंने उस शैली में अपनी चीजें कहनी शुरू कीं। ज़ाहिर है, उनके पास जो अपना समकालीन गुस्सा था, उसको व्यक्त करने का सबसे बढ़िया माध्यम यह नज़र आया और उसमें वो सफल हुए। अब कोई कवि आगे चलकर ऐसा प्रयोग करे तो स्वागत योग्य है, करना चाहिए। लेकिन जो लोग केवल सरलीकरण के तौर पर कहते हैं कि छन्द से आप मुक्त हो गए. आप पश्चिमी हो गए। ये आरोप लगाते हैं। पश्चिमीकरण ऐसा है ज्यों पश्चिम की बैसाखियों के सहारे हम अपने साहित्य को उठाकर ले जा रहे हैं। ये भी ग़लत है। हमारे यहाँ अद्भुत कवि बीसवीं शताब्दी में पैदा हुए। मैं सोचता हूँ कि जिन कवियों को लोग याद नहीं करते, उन्हें याद करने का मौका आता है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रमेश चन्द शाह, आज़ादी के बाद बहुत बड़े अैर प्रखर कवि बनकर उभरे। बहुत पुराने समय में आप अनन्त कुमार पासवान ले लीजिए। नए दौर के कवियों में से हैं- जगदीश गुप्त। आप इन्हें ले लीजिए। ये ऐसे लोग थे जो बराबर प्रयोग करते रहे। तो मुझे महसूस ये होता है कि इन आरोपों की सच्चाई जाँचने के लिए पहले इन उदाहरणों से देखें कि वे चीजें पढ़ते रहे हैं। हो सकता है वो अपने साथ उस तरह का प्रभाव लाए हों। बहुत सारे कवियों पर ये आरोप है कि उन्होंने न केवल प्रभाव, बल्कि जस की तस चीजें उठा लीं। ये एक तरह से घृणित कार्य है, जो कुछ लोगों द्वारा हुआ होगा। इसकी भर्तसना जितनी हो सके, की जानी चाहिए। लेकिन उनमें से कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो अपने ढंग की कविताएँ लिखते रहे हैं। कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह हैं। ये कवि अपने ढंग की कविताएँ लिखते रहे हैं। और आदर्श कवि के रूप स्थापित हैं। या कैलाश वाजपेयी हैं। इनकी कविताएँ देखें तो सीधे भारत में घुसी हुई हैं। कहना चाहिए कि भारत के अतीत में उन्होंने प्रवेश किया हुआ है। तो एक ये जो सरलीकरण का आरोप लगाया हुआ है, ये बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है। महत्त्वपूर्ण ये है कि हाँ, इस कविता में आजादी के सपनों की जाँच-पड़ताल नज़र आती है। क्यूँकि सपने पूरे हुए ही नहीं। जब सपने नहीं पूरे होने से जो स्थिति आयी मोहभंग की और मोहभंग के कारण लग सकता है कि रुग्णता, अवसाद का पुनर्पाठ दिखाई पड़ा हो। क्योंकि हम एकांतिकता और रुग्णता को पश्चिम की चीज मान बैठते हैं। लेकिन कवियों की दुनिया में ये चीजें किसी एक की बपौती नहीं हैं। कोई एक कवि अपनी एकांतिकता में बहुत महत्त्वपूर्ण हो सकता है। जैसा हम मुक्तिबोध के बारे में कहते हैं कि वो बहुत विलक्षण-आत्मचेतना के कवि हैं। विश्व चेतना भी है। उनका जो संघर्ष है, वो एक आदमी का संघर्ष भी हो सकता है, लेकिन उसमें सामाजिकता का पुट भी पूरी तरह भरा हुआ है। तो ये बातें बहुत स्पष्ट करती हैं कि हिन्दी कविता में पश्चिम का अन्धानुकरण, हो सकता है. और कुछ कवियों में उपलब्ध हो, लेकिन मुख्यधारा में उस अन्धानुकरण, को कोई जगह नहीं मिली। जो मुख्य धारा में चलती रही वो मुख्यधारा की कविता हो गई। उस कविता में ये भेद नहीं हैं कि वो गीत में लिखी जा रही है या मुक्त में। बहुत सारे ऐसे कवि हुए हैं, जिन्होंने गीतों में ही केवल प्रयोग किए हैं। गीतों में प्रयोग करने के कारण वो साहित्य में मुख्यधारा से जुड़ जाता है। और इसीलिए सोचना ये है कि जो परिवर्तन आज़ादी के बाद आया, वो परिवर्तन कहना चाहिए कि एक तर्कप्रणाली से जुड़ा हुआ है। तर्कप्रणाली ये कि जो सपने थे, वो पूरे होते दिखाई नहीं दिए। उनकी जगह दूसरी चीजें उजागर होने लगीं। ये वो चीजें थीं, जिन्होंने अपना विराट रूप प्रस्तुत किया हुआ है। और इस विकराल स्थिति से शायद ही कोई कवि उनका समर्थन करता हो, याकि उनके पक्ष में कभी कुछ कहता हो। और पूरा-पूरा जो आज़ादी के बाद का साहित्य है, वो एक प्रतिपक्षीय भूमिका निभाता है। पर कैसे प्रतिपक्ष की? हमारे यहाँ बहुत सारे प्रतिपक्ष हैं। हमारे यहाँ एकता खींचने वाला प्रतिपक्ष है। उसे तात्कालिक मिल जाए। लेकिन आप याद रखिएगा, जो सत्ता की लड़ाई में शामिल हैं, वो लोकप्रिय भी चाहें हों, लेकिन ज़्यादातर लेखक और कवि सत्ता की लड़ाई में शामिल नहीं हैं। वो अपने ढंग से अपनी कविताएँ लिखते हैं और लगातार इन स्थितियों की भर्त्सना करते हैं।

अनिल पु. कवीन्द्र : भारतीय इतिहास के किस समय ने आपको रचनाकार्य हेतु सबसे अधिक प्रभावित किया और क्यूँ?

गंगा प्रसाद विमल: कहना चाहिए कि भारतीय इतिहास का सारा ही समय बड़ा रोचक है। पर ख़ासतौर से भारतीय इतिहास का एक हजार वर्षों का जो मध्यकाल है, वो लुभाता हैं. और उतना तो लिखा नहीं जाता उसके बारे में, जितना सोचा जाता है। कि वो कैसे लोग रहे होंगे? जंगलों में रहे? कहाँ रहे? और हमेशा भागे रहे। मतलब अधिकांश कवि जो हैं, वो बाहर ही रहे। जो सत्ता प्रतिष्ठानों में थोड़ा बहुत सुख-सुविधाओं में रहे और बाहर रहे। बाहर रहकर ज्ञान की उतनी उच्च शिखर वाची स्थापनाएँ थीं, वो भी करते रहे। और कला की ऊँचाइयों पर पहुँचते रहे। सबसे बड़ी बात ये है, जो संप्रेषण था उनका। जनसामान्य तक वो भी संभव था। तो एक हजार वर्षों का वो वक्त लोगों को बड़ा लुभाता है। कि वो रहे, एकांत, अकेले रहे। किसी जगह कोई मठ इत्यादि कुछ नहीं बनाया। अलग रहकर संघर्ष करते रहे। बल्कि मुझे तो कभी -कभी लगता है कि उसका पटाक्षेप जो है, वो एक ऐसे व्यक्ति मे होता है, जो कि पूरा सेनानी बन जाता है।
गुरु गोविन्द सिंह हैं मूल रूप से कवि। गुस्सा उनका जो है, ’जफ़रनामा‘ में शंहशाह जो पत्र लिखता है, वो बिल्कुल उसी की भाषा में लिखता है। कहाँ से सीखी वो भाषा? फ़ारसी, अरबी और तुर्की की मिली-जुली अभिव्यक्ति है। इसका अर्थ है कि कवि के लिए किसी भाषा में सवारी करना मुश्किल नहीं होता। वो उसको उसी भाषा में उत्तर देना चाहता है। एक तो ये है। लेकिन इसके अतिरिक्त जो है। उसके काव्य वैभव के बहुत सारे प्रमाण हैं, जो आज भी लोगों को मोहते हैं और बराबर आज भी संगीतकारों के लिए काव्यकारों के लिए, चित्रकारों के लिए, वो बहुत महत्त्वपूर्ण सामग्री है। दुर्भाग्य ये है कि जब हम उससे विमुख हो जाते हैं, बिल्कुल इतर हो जाते हैं, तब हम पूरे हिन्दुस्तान को नहीं समझ सकते। तब हमें मध्यकाल का वही हिस्सा, मध्यकाल ही कहें उसे, क्योंकि जानना बहुत ज़रूरी है। वो हिन्दुस्तान के टूटने का दौर भी है। जब हिन्दुस्तान टूट रहा है, क्षीण हो रहा है। मैं तो लोगों से यही कहता हूँ।
मुझसे ज़्यादातर लोग पश्चिम में सवाल करते हैं, जब मेरा जाना होता है, वो लोग कहते हैं कि उस युग में लोग कैसे थे? राख ओढ़े बैठे हुए; अज़ीबोग़रीब वेशभूषा वाले लोग कैसे जीवन जीते थे? मैंने कहा उनकी बातें मत करो। तुम उन्हें जानते नहीं हो। वो लोग ऐसे नहीं थे जैसे कि तुम थे। अगर उन्हें समृद्धि जुटानी थी तो जुटा लेते। लेकिन समृद्धि जुटाना उनका लक्ष्य नहीं था। उनका लक्ष्य था मनुष्य बेहतर से बेहतर कैसे हो सकता है? और वो उस त्याग के अन्तिम छोर पर बेहतर करने में लगे थे। वो दूसरों के लिए ये सब कुछ कर रहे थे। अपने लिए कभी नहीं किया। अपने लिए करते तो स्वाभाविक था कि बड़े ठाठ से रहते, बड़े मकान बनाते, मँहगे कपड़े पहनते। किन्तु ऐसा कुछ नहीं था, एक लंगोटी पहनी हुई है। एक छोटा सा आश्रम है, उसमें थोड़ा सा खाना और इसमें ही वो परफ़ेक्ट हो गए थे और दुनिया को उस ओर लौटना पड़े।
जिस तरह की दुनिया का नक्शा अब बन रहा है। इसके बारे में सोचना पड़ेगा, क्योंकि उसमें बहुत सारे सवाल हैं। उसमें सबसे बड़ा लाभ ये है कि स्वास्थ्य अच्छा रहता है। यानि कि उसमें से मैंने देखा है अधिसंख्य कवि जो 120 से ऊपर हुए हैं। उस समय के कवियों को देखें आप। ये कैसे हो गया संभव? उन्होंने कहा कि देखो लक्ष्य जो है, वो जुटाना नहीं है। लक्ष्य जो है, देना है। हम देने के काम में माहिर हैं। इसलिए वो ज्ञान की धारा जो है वो दीप्ति से भरी धारा है। उसमें कुछ चीजें ख़राब भी हैं। हर धारा में कुछ न कुछ कमियाँ, त्रुटियाँ तो होती ही हैं। हर समय में बहुत सारी चीजें ख़राब होती हैं। हम ही बहुत अच्छे नहीं हैं, ऐसा कहना बहुत ज्यादा कहें कि दावा करना है। लेकिन अच्छे बनने की प्रक्रिया जो है, पश्चिम को विस्मृत करती है। पश्चिम को लोग कहते हैं अच्छा। क्योंकि मैकाले को जो अंग्रेज़ों को लगा, इनको पार पाना बड़ा कठिन काम है। ये तो अपने थोड़े में ही गुजारा कर लेते हैं। ये लोग इतने अपरिग्रही हैं कि जिस चीज का इस्तेमाल करते हैं उस चीज का आगे के लिए संग्रह नहीं करते। पश्चिमी बुनियादी तौर पर इस भावना को समझ ही नहीं सकते। हो सकता है कि कुछ कल्पना जोड़ते हों, लेकिन कुछ तो सच था। वो जो सच था हमारे हाल से विलग हो गया। तो लौटना बड़ा कठिन है, क्योंकि उसमें उतनी बड़ी साधना चाहिए। उसमें हज़ारों वषों के त्याग का पूरा इतिहास, तपोवन की वो संस्कृति चाहिए। वो नहीं मिलेगी। संभव नहीं है, इसलिए अब पश्चिम के साथ मिलकर के ही मनुष्य जाति के लिए कुछ कर सकते हैं। जैसा कि पहले के लोगों ने किया, और पूरे एक हजार सालों का इतिहास बताता है कि वो मनुष्य के किस पक्ष के लिए कर रहे थे, ये नहीं समझ आता, क्योंकि कम से कम वो क्षेत्रीय नहीं थे, जातिवादी नहीं थे और केवल क्षेत्र में रहते थे। भौगोलिक कारणों से दूर नहीं जा सकते थे। यानि जाना नहीं चाहते थे। यही कारण है कि भारतीय राजनीति में कभी दूर तक जाने की सोची नहीं। इसलिए नहीं सोची गई कि वो जा नहीं सकते थे। बल्कि इसलिए नहीं सोची गई कि उससे दूसरे की स्वतंत्रता का अपहरण होने वाला है। और ये मूल्य हैं कि आप अपनी स्वतंत्रता तभी कायम रख सकते हैं जब दूसरे की स्वतंत्रता पर आफ़त न करें। बाद में इसे गांधी ने स्थापित करने की कोशिश की। गांधी ने दुनिया को बताया। गांधी के पास भी ताम-झाम बहुत ज़्यादा नहीं था। जैसे कि दूसरे नेताओं के पास साधन संपन्नता होती है। तो कहने का अर्थ ये है कि ये दौर बहुत ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है। और अब केवल खोज ये होनी चाहिए कि इस दौर में जो हमने खोया है। वो कौन सी चीज खोई है? क्योंकि ज्ञान की एक बहुत महत्त्वपूर्ण धारा हमारे हाथ से खिसक गई। और वो पश्चिम के मुकावले में कहीं बड़ी ज्ञान की धारा थी। उनका जो आयुर्विज्ञान था या उनका जो ज्योतिर्विज्ञान था, इसके बड़े पुराने समय से इन्होंने प्रयोग किए थे। और बहुत ही सत्य, यहाँ तक कि आने वाले हज़ारों वर्षों तक के लिए सच हो सकते हैं। और उसके समानान्तर जो उनकी पार्थिव चीजों की प्रयोगशालाएँ थीं, वो विलुप्त हो गईं। वो कहाँ चली गईं? किसी को नहीं मालूम। प्राचीन साहित्य में कुछ छोटे-छोटे विवरण आते हैं। हो सकता है, मैं ये छूट देता हूँ कि कवि या वांग्ड.्मय के रचयिता जो उस समय के थे। जब छंद में लिख रहे थे। तो ये बहुत बड़ा मूल्य है। जो काल हमें सिखाता है।

अनिल पु. कवीन्द्र : महाकाव्यों से लेकर समकालीनता के दौर तक काव्य के विकास का महत्त्वपूर्ण बिंदु किस समय में रहा और क्यों?

गंगा प्रसाद विमल: सृजन का एक बहुत अच्छा काम ये है कि जो बीत चुका, वो बीत चुका। अब नया क्या कहना है, वही महत्त्वपूर्ण है। और इसलिए मुझे लगता है कि आज का जो वक्त है, उसमें क्या कहा जा रहा है? उसमें कैसी चीजें कही जा रही हैं? क्या लिखा जा रहा है? और इसमें से भी समझिए कि प्रतिशत क्या है? क्योंकि कोई तराजू तो मेरे पास है नहीं कि इतना प्रतिशत कार्य है। लेकिन इसमें से भी खोजना पड़ता हैे कि वो बेहतर, महत्त्वपूर्ण, प्रासंगिक, मूल्यवान कहाँ जा रहा है। उसकी खोज करनी पड़ती है और इसलिए मुझे लगता है कि आज के कवि के जिम्मे एक ज़्यादा दायित्वपूर्ण बोझ है। इससे उसे देखना है कि वो क्या कह रहा है? कैसे कह रहा है? हमारी समझ में बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जो समझिए कि संकोच से अपने दावे प्रस्तुत करते हैं और ये चीज जो है, इसको ध्यान में रखना चाहिए। जहाँ तक एक मोटे तौर पर प्रश्न है कि महाकाव्य और दूसरे काव्यों के मुकाबले में जो महत्त्वपूर्ण था, उसमें से क्या चीज आज हमें याद रहती है? तो मैं ये कहना चाहूँगा कि निःसंदेह हमारे जो दो बड़े काव्य हैं महाभारत और रामायण- ये बेमिसाल हैं। और मैं तो ये याद दिलाना चाहूँगा मैं पिछले दिनों बुद्धदेव बाबू की ’महाभारत की अन्तर्कथा‘ पढ़ रहा था। उसके दोहे के अनुवाद मेरे हाथ लगे और बुद्धदेव बाबू के कुछ लेख हाथ लगे। और बुद्धदेव बाबू के कुछ लेख भी मैंने पढ़े। निर्विवाद रूप से वो पश्चिम से प्रभावित थे। भारतीय तुलनात्मक साहित्य के पुरोधा थे। लेकिन कहीं इससे समझौता नहीं किया। उन्होंने कहा कि नहीं, ’महाभारत‘ का मुकाबला ’अखिलीज़‘ या और कोई नहीं कर सकते हैं। और बहुत निर्विवाद रूप से कहा। बहुत सतर्क बात थी। मुझे लगता है कि इसी से इसका महत्त्व प्रतिपादित होता है और लगता है कि हाँ आपके पास कोई संपदा है, जो बहुत महत्त्वपूर्ण है, बड़ी है। और, बल्कि कहना चाहिए, जो हम लोग दावा करते हैं, हम उसे छोटा बना देते हैं। वो तो विश्व-संपदा है। हमारी संपदा तो है ही। विश्व मनीषा जब चाहे उसमें से निकाल सकती है। ले सकती है। और इसलिए कहा जाता है कि संसार में कुछ भी ऐसा नहीं है जो महाभारत में नहीं है। यहाँ तक कि जो घृणास्पद या अश्लील चीज है तो आज हम उसके मुकाबले कुछ रचना चाहें फिर भी वो पहले ही उपलब्ध है। और वो विनोदपूर्वक कहा जाता है कि महाभारत में ये भी उपलब्ध है आप रहने दीजिए। तो इसलिए मुझे लगता है कि महत्त्व की दृष्टि से हमारे ये दो बड़े काम और केवल दो बड़े काव्य नहीं। मैं तो कभी-कभी सोचता हूँ कि जो छोटी चीजें हैं, उसमें से वो कितनी महत्त्वपूर्ण साबित होंगी और दुर्भाग्य से उन्हें धर्म के खाते में डाल दिया गया। जब उन्हें हम धर्म के खाते में डाल देते हैं तो अधार्मिक अधर्मी वस्तु हो जाती है। मैं अभी इतना दावेदार नहीं हूँ कि उनको अधर्म के खाते से धर्म के खाते में ले आऊँ। जहाँ वो पड़ी हैं, पड़ी रहें। परन्तु अद्भुत सर्जनाएँ जो हैं, वो भारतीय सर्जकों ने प्रस्तुत की हैं। आवश्यक नहीं कि बड़े महाकाव्यों में ही सब कुछ है, छोटे महाकाव्यों को भी धीरे-धीरे उलटें तो आपको विलक्षण चीजें दिखाई देंगी।

अनिल पु. कवीन्द्र : आपका पसंदीदा कवि कौन है और क्यों?

गंगा प्रसाद विमल: ये कहना बड़ा कठिन काम है। बल्कि मैंने एक पुस्तक चार कवियों को भेट की हैं। ओर इस तरह कहा है उसमें कि ‘अपने चार दुश्मनों के लिए’ और उसमें सब के पहले हैं कालिदास, कबीर, केदारनाथ सिंह और कुंवर नारायण। और इन कवियों के नाम कविताएँ दी हैं। ये कहते हुए कि आप न लिखते अपनी कविताएँ तो इसमें कम विपदा पड़ जाती? मैं तो आ ही रहा था, मैं ही लिख देता। तो ये कहने का अर्थ है कि चार तो निःसन्देह पसंदीदा कवि हैं। लेकिन पसंदीदा कवियों की सीमा नहीं होती। जिस तरह मनुष्य के सुख-दुख की कोई सीमा नहीं है। कब कौन पसंद आ जाए। इसलिए मैं ये नहीं कह सकता कि ये ही पसंद के कवि हैं। बहुत लंबी सूची है इसकी। और उसमें मुझे कई बार हैरानी होती है। मुझे नए लोग बहुत पसंद आते हैं, इसमें क्या करूँ मैं? कुमार अंबुज से लेकर के पंकज चतुर्वेदी तक मुझे बड़े पसंद हैं। जब मैं गीतकारों की ओर देखता हूँ, तब माहेश्वर तिवारी से लेकर के और हमारे मित्र जो हैं एम. कुमार कृषक, तमाम लोग पसंद आते हैं और ये बड़ी विचित्र चीज है। लोग उस पर कभी-कभी बहुत गुस्सा भी करते हैं कि एक तरह की चीज पसंद करो। लेकिन हिन्दुस्तान में हम लोग बहुत सारी चीजों से प्रेम करते हैं। बहुत सारी पोशाकों, भोजन से तो बहुत सारी कविताओं से प्रेम करने में क्या नुक़सान है? आखिर वो हमारा ही तो है और एक कदम आगे जाकर कहूँगा कि उनमें से जो चीजें विश्व भर के लिए बची रहेंगी, वो महत्त्वपूर्ण है।

अनिल पु. कवीन्द्र : एक बेहद महत्त्वपूर्ण सवाल है कि उन कवियों के बारे में बताएँ, जिन्हें क्रांतिकाल के समय में आप सुरक्षित रखना चाहेंगे। और किन कृतियों को युग-युगांत तक संघर्षशील जमीन का प्रेरणास्रोत आप मानते हैं और क्यँू?

गंगा प्रसाद विमल: देखिए इसमें थोड़ा मनो-विनोद कर लिया जाए पहले, कि आप कितने किलो प्रलयकाल में ले जाने की इजाज़त देते हैं। मैं सोचता हूँ कि जैसा आपने कहा कि मेरी नाव टूटी है और प्रलय काल आरंभ हो गया है। अब हमें हिमालय पे जाकर रखना है और कुछ भी बचाकर चलना है। तो चूँकि बचा के ले चलना है तो बताइए कि कैसे एक किलो आप ले जा सकते हैं? अब मेरी अपनी कविताएँ कम से कम पाँच-छः किलो होंगी। ज़ाहिर है कि सेंसर के तहत मैं पहले अपनी कविताएँ लेकर निकलूँगा। अगर कोई और निकले (हंसते हुए)। इस एक किलो में जो बचाना होगा बड़ा कठिन है। और कहना चाहिए कि पूरी सृष्टि को बचाना चाहिए तो मैं सोचता हूँ कि मैं उस कवि को बचाऊँगा जिसके वाक् जो हैं, वो बीजों की तरह हैं। वो वाक् बीज बचा लूँगा, बाद में खेतों में डालूँगा और अपने आप वो कविताएँ बन जाएँगी। वाक् बीज पैदा करने वाला कवि जो है। ऐसा नहीं कि वो ईसा से 2000 वर्ष पूर्व पैदा हुआ होगा। हो सकता है कि अद्यतन जो नया कवि है, वो पैदा हुआ हो। पर इसे मैं इस रूप में रखना चाहूँगा। अजित कुमार ने एक पुस्तक में कहीं एक बड़ी बढ़िया कहानी लिखी, जो मुझे इस तरह याद है कि एक बार एक बहुत बड़े राजा को ये ज़रूरत महसूस हुई कि मैं संत साहित्य पढूँ, धर्म-दर्शन क्या है? उसने कुछ लोगों को बुलाया कि तुम लोग कुछ साहित्य रच लो। और कहा कि पाँच साल में तुम रच लो। ये लो इतने लाख। वो चले गए। उन्होंने बड़ी एक पोथी बना ली। अब जब बड़ी पोथी बना ली, तब राजा के पास गए और कहा कि हमने ये दस हजार पृष्ठों की रचना की है। राजा ने कहा दस हजार पृष्ठ? हमारे पास समय कहाँ? इसे छोटा करो काटकर। तब उन्होंने छोटा किया उसे। वो लेकर आए सौ पृष्ठ की रचना। तब तक राजा बूढ़ा हो चला था। उसने कहा सौ पृष्ठ! आँखे कमजोर हो चुकी हैं, मैं कैसे पढूँगा इसे? इसे और छोटा करो। वो जब लाए लिखकर तब पन्ना लिख लाए। तब तक राजा की आँखें विलुप्त हो गई थीं। उसने लिखा था मूर्ख के लिए इतना काफ़ी है। कहने का मतलब है कि मैं जो बचाना चाहूँगा वो स्मृति में है। अच्छे कवि। वो तो बच जाएँगे। उन्हें मैं दोहराता रहूँगा, इसलिए वो बच जाएँगे। लेकिन कुछ ऐसी चीजें, कुछ ऐसे कवि, जिन्हें बार-बार आप पढ़ना चाहेंगे। वो पैदा होते रहते हैं। जैसे मैं सोचता हूँ कि कालिदास स्मृति में होंगे। कबीर स्मृति में होंगे। ग़ालिब काफ़ी लोगों की स्मृति में होंगे। लेकिन जो बच जाए वहाँ से, बचाना चाहिए। और मुझे ये लगता है कि जो नए लोग काम कर रहे हैं, वो बचाकर रखना बेहद ज़रूरी होगा। क्योंकि वो नए बीज हैं, उनसे नई चीजें आगे पनपेंगी। इसलिए इसमें यही कहूँगा कि जो अच्छी चीजें होंगी, स्मृति में बची रहेंगी। और जो न बच पाएँगी, न रह पाएगी स्मृति में, उन काग़ज़ों को ले जाने में मैं गुरेज न करूँगा। और उसमें नए कवियों को ले जाऊँगा।

अनिल पु. कवीन्द्र : एक सवाल है आपकी कृतियों से संबंधित कि वो कौन सी स्वरचित कृति है, जिसे आप बेहद पसंद करते हैं और क्यों?

गंगा प्रसाद विमल: इसका उत्तर कठिन है। क्योंकि मुझे बाकी लोगों की बहुत सी चीजें पसंद हैं, अपनी एक भी पसंद नहीं है।
अनिल पु. कवीन्द्र : आप किसी ऐसी कृति के बारे में बताएँ, जिसमें आपने इतिहास-बोध से लेकर के बातें कही हों या फिर समकालीन जो स्थितियाँ हैं, उनको लेकर जो अंतर्द्वंद हैं, उसमें रहकर आपने रचना की?
गंगा प्रसाद विमल: कुछ कविताएँ मुझे पसंद रही हैं। वो या तो लंबी होने के कारण याद नहीं रहतीं या शायद मुझे भी कम ही याद ही रहती हैं। उसमें से एक कविता है जो मेरे पास है। पुरानी कविता है ’मेरा गाँव ‘। और वो काफ़ी लंबी कविता है। उसमें है कि मैं गाँव से चला तो गाँव मेरे साथ ही चला आया। कुछ दिन तक तो मेरे साथ ही रहता था। अब नहीं रहता। अब मैं पूरा शहरी हो गया हूँ। गाँव बिल्कुल विलुप्त हो गया है। लेकिन जब मैं अपने गाँव लौटा तो वहाँ भी गाँव नहीं था। अब वो गांव कहाँ चला गया। और इसी तरह से कुछ कहानियाँ मुझे अपनी पसंद हैं। उन कहानियों में कारण ये है कि पश्चिम में मेरी आलोचना भारतीयों द्वारा इसलिए हुई कि उन्होंने कहा कि आप ऐसे भारत की तस्वीर दिखा रहे हैं, जोकि जानबूझकर के आप दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि ऐसा नहीं है। ऐसी ही एक कहानी थी ’सड़क पर‘। उसका निष्कर्ष ये है। आज तुम मुझे पीट लो लेकिन आने वाले समय में बहुत लोग खड़े होंगे। जो तुम्हारे इसका प्रतिकार लेंगे। इसी तरह से छोटी-छोटी कई कहानियाँ हैं। एक मैंने कहानी लिखी थी ’फूल कह रहे हैं‘। वो विनोदपूर्वक लिखी हुई कहानी है, जिसमें एक आदमी को किसी ज़ुर्म में सज़ा हो जाती है। तो वो अपने दुश्मनों के नाम बता देता है। और तब वो सभी जेल चले जाते हैं। वो बाहर देखता है कि खूब फूल लहलहा रहे हैं, अन्दर तो कुछ है नहीं, केवल जेलखाना है। तो उसे बड़ा अफसोस होता है कि बेकार लोग अन्दर हैं और कसूरवार बाहर घूम रहे हैं।ये हमारे समाज की कुछ सच्चाइयाँ हैं, जो उन कहानियों में देखने को मिलती हैं। मैं सोचता हूँ कि कहना थोड़ा कठिन है, लेकिन एक उपन्यास मैंने लिखा था ’मरीचिका‘। वो इस अर्थ में कि उसका बुनियादी सूत्र जो है वो मुझे किसी बड़े लेखक से मिला। वो यह कि जितनी भी सच्चाइयाँ हैं, वो मनुष्य के यथार्थ से निकलती हैं। और ये मनुष्य का यथार्थ जो है, ये बड़ा भयावह है। मनुष्य के यथार्थ में दोनों चीजें रहती हैं। उसके यथार्थ में एक अपेक्षा भी रहती है। उसके यथार्थ में हताशा भी रहती है। ये दोनों चीजें हैं। कोशिश ये है कि मैं कहूँगा याद रखने लायक और रेखांकित करने वाली चीज जो है, मैं नहीं रच पाया। ख़ैर, कोई और रच लेगा।

अनिल पु. कवीन्द्र : साहित्य को ’वाद‘ और ’आंदोलन‘ से बचना चाहिए; आपकी क्या राय है?

गंगा प्रसाद विमल: देखिए! आप अपराधी से पूछ रहे हैं कि अपराधियों को खुला छोड़ देना चाहिए? हम लोग तो अपनी जगह बनाने के लिए सबसे पहले अपने को आंदोलनकारी घोषित करते रहे और तमाम तरह के आंदोलन में शामिल रहे। तो बेहतर ये होगा इस बारे में कहना कि साहित्यिक आंदोलन साहित्यकार नहीं पैदा करता। ये दूसरे लोग पैदा करते हैं कि देखो, ये इस आंदोलन के हैं। ये इस क्षेत्र के हैं। हम पर वो आरोप लगाया गया। लेकिन मैं सोचता हूँ कि वाद और आंदोलन बहुत छोटी चीजें हैं। और सृजन जो है, वो इससे कहीं बड़ा है। अब अगर वाद और आंदोलन कोई सामने आ भी गया तो सृजकत्व को उनसे उपर उठकर देखना चाहिए। वाद और आंदोलन कोई बहुत महत्त्वपूर्ण चीजें नहीं हंै। ये उसी तरह से खेेमेवाजी है, जैसे कि गुटबाजी, दलबाजी आदि। ये कहना चाहिए कि साहित्यिक राजनीति का हिस्सा है। और मेरा ख़्याल है कि साहित्य जो है वो राजनीति के इन प्रपंचों से हमेशा अपनी असहमति ज़ाहिर करता है। असली साहित्य वही है। और जब हम परिपक्वता के दृष्टिकोण पर पहुँचते हैं, जब उसके प्रति विरोध जताते हैं। आंदोलन और वाद का महत्त्व ऐतिहासिक दृष्टि से हो सकता है। हम जब इतिहास की चर्चा कर रहे हैं, उसमें आंदोलन और वाद आते हैं। लेकिन साहित्य वादातीत है आंदोलन से।
अनिल पु. कवीन्द्र : हिन्दी की नई कहानी किस दिशा में विकसित हो रही है और विश्व साहित्य के वर्तमान धरातल पर उसका क्या स्तर है?
गंगा प्रसाद विमल: हिन्दी की नई कहानी जो है, वो बहुत ही सशक्त कहानी है। और उसका मुख्य आधार जो है- वो हिन्दुस्तान को ही एक तरह से पुर्नअन्वेषित कर रहा है। जो हिन्दुस्तान देख नहीं पाया उसे देखने की कोशिश कर रही है। ऐसे बहुत सारे कथाकार हैं, जो इस तरह की कहानियाँ लिखने में व्यस्त हैं। मैं ये कहूँगा कि इस मामले में नए लोगों का दख़ल ज़्यादा महत्त्वपूर्ण होगा। वो नए लोग जो आजकल लिख रहे हैं। मैं उनकी कहानियाँ पढ़ रहा हूँ मुझे लगता है कि वो वास्तविकता को पूरी तरह से व्यंजित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। जो पहले लोग नहीं कर पाए वो नए लोग कर रहे हैं। इस अर्थ में हिन्दी कहानी विश्व साहित्य की दृष्टि में, अब ये तो नहीं कहा जा सकता कि किस प्रकार से उनकी तुलना की जाए? परन्तु अपनी स्थानिक वास्तविक स्वरूप को बहुत बढ़िया तरीके से जो व्यक्त करने की कला है, वही एक तरह से वैश्विक कला है। कला का स्थान से बहुत अच्छा संबंध है। और स्थानिक रूप व्यक्त करना बहुत बड़ी बात है। ऐसे बहुत सारे कथाकारों की कहानियाँ ये काम रही हैं।

अनिल पु. कवीन्द्र : आप किन कथाकारों को इस संदर्भ में सक्षम पाते हैं कि वो विश्व स्तर की कथाएँ रच रहे हैं?

गंगा प्रसाद विमल: इसमें कोई संदेह नहीं कि विश्व स्तर पर जो बहुत सारी दूसरी तरह की समस्याएँ मनुष्य जाति को घेरे हुए हैं और उन समस्याओं पर, उन जगहों पर उन कथाकारों द्वारा कहानियाँ लिखी जा रही हैं, जो उनसे लड़ रहे हैं। हम लोग हमारे क्षेत्र में लड़ रहे हैं। और ये कहना चाहिए कि बुनियादी तरीका है, जो बड़े साहित्य का है। वैसे हमारे यहाँ
कुछ बड़े क्षेत्रों में जाएँ तो वहाँ एक तरह से सम्मान बचाए रखने के लिए हत्याएँ करने की कोशिश की जा रही हैं या होती हैं। अब वो जो घृणित काम है, वो सम्मान के नाम पर हो रहा है, जातीय सम्मान, कुल गोत्रीय सम्मान, ये जहाँ भी विद्यमान हैं और जो लोग वस्तु को लेकर के रचना रचते हैं, उनमें से कुछ लोग बहुत सफल हैं। इसी तरह पश्चिम में बहुत सी समस्याएँ हैं। जो मनुष्य को घेरे हैं और वहाँ उस तरह की कहानी लिखी जा रही हैं। तो मुझे ये महसूस होता है कि पहले की कहानियाँ अपने स्थापत्य के कारण, अपने रूपांकन के कारण बहुत बड़ी, महत्त्वपूर्ण कहानियाँ हैं। लेकिन अब जो कथाकार लिख रहे हैं, चाहे वो आदिवासी क्षेत्र के हैं, चाहे दलित वर्ग के हैं, चाहे दलितेतर... ये लोग जो हैं वो दुनिया रच रहे हैं और इससे हम आगामी भारतीय कहानी का जो रूप है, उसकी कल्पना भी कर सकते हैं। कि कितना महत्त्वपूर्ण है, कितना बढ़िया काम है? जबकि एक बहुत बड़ा डर ये है कि अक्षर से हमारा संपर्क जो नई-नई तकनीक है, उससे कम हो जाएगा, लेकिन नई कहानियाँ आश्वस्त करती हैं कि हमारा बराबर संपर्क बना हुआ है।

अनिल पु. कवीन्द्र : आपकी कविताएँ सुनना चाहेंगे।

गंगा प्रसाद विमल: मेरी ये जो कुछ कविताएँ हैं उन्हें कवि सम्मेलनीय अंदाज में पढ़ता हूँ.

जब कुछ नहीं लिखा जाता

जब कुछ नहीं लिखा जाता
तब एक तैयारी होती है
चुप्पेपन में छिपी आक्रामकता
अपने सींग फैलाती है
शब्दों की व्यर्थता के भीतर
बाहर की ओर चलता है अर्थ
हवा में अर्थ हो
आसमान में अर्थ
तब हर ओर वार करने में ही
होता है अर्थ
व्यर्थ नहीं है
कुछ न लिखा जाना
इसलिए कि आज कुछ लिखे जाने से बेहतर है चुप रहना
कल शब्दों की जगह
चुप्पी के हथियार
सदी को चीरेंगे।

पता पूछा मैंने

मैंने हवा से पूछा उसका पता
हवा बोली खुद उसका ठिकाना नहीं
ठौर कैसे बता दे वो पता
इस अनंत आसमान में कहीं तो ठहरेगी हवा
मैंने पूछा ठहरकर
आराम से बताना
मुझे कोई जल्दी नहीं
यूँ ही भूल गया था उसका पता
असल में अब उसकी स्मृति भी नहीं
पूछ रहा था जिसका पता
उस किसी हवा का
हवा तेज अंधड़ की तरह अभी
झकझोरती हुई चली गई
मैं सवाल को
सवाल की कैद में छोड़कर
मैंने दिशा से पूछा
उत्तर नहीं आया
पता चला
वो पूछना संबोधनहीन था
दिशाएँ चल दीं मुझे छोड़
हवाएँ अंतरिक्ष में
मैंने सबसे पूछा
सबका जवाब था
लापता .....
बे-पता....!!

ये कविताएँ लिखना

लिखना कि
फिर कभी न हो अतीत
एक लंबे अंतराल में अंत तक जाएँ शब्द
लिखना, भरे रहें अपने में अर्थपूर्ण भाव
पूर्ण संगीतमय लिखना कि
अनुगूंज में सृष्टि का समूचा सौंदर्य चित्रित हो सचल
और बहे रक्त प्रवाह में
यही लिखना
कि सदा इसी में मिलता रहे
अंतरिक्ष का विस्तार
और पूरे-पूरे स्पर्श से प्राणवान हों सन्नाटे
लिखना कि
अंतरिक्ष के वाक-नाद में
सिर्फ़ गुंजरित हो
मनुष्य का नया बनना
और बनते-बनते लिखना
परिकल्पनाओं से परे अकल्पित सुखों का
अनंत समय यहीं है कहीं
आस-पास!!

© 2011 Ganga Prasad Vimal; Licensee Argalaa Magazine.

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