अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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कथा साहित्य

गोपाल रंजन

नहर के किनारे

अब वे सारी चीजें सहेजने का मन करता है जो हमेशा इर्द गिर्द बिखरी रहीं पर कभी उनकी ओर देखने का मन नहीं हुआ. वक्त ने कभी थकने नहीं दिया. अश्वमेध के घोड़े की तरह मन दौड़ता रहा. पिछले पच्चीस साल कैसे गुजर गये, पता ही नहीं चला. पीछे मुड़कर देखने की नौबत ही नहीं आयी. सामने इतनी सारी जिम्मेदारियाँ दिखती रहीं कि एक के बाद एक, परत दर परत उभरते रहे सवाल और उन सवालों का जवाब ढूँढ़ने में ही जिंदगी के कीमती साल बीत गये. आज जब तुम्हारा घर दिखा तो अपना भी खयाल आया. नहर के किनारे दूर-दूर तक सपाट दिखती जमीन और इक्के-दुक्के आते-जाते लोग मुझे अतीत की ओर खींच रहे थे. बीच-बीच में बकरियों की आवाज उन चरवाहों की ओर जरूर ध्यान बँटा रही थीं जिन्हें इससे कोई मतलब नहीं था कि एक शख्स तीस सालों बाद उनके गाँव को फिर जीना चाह रहा है. वह घर भी करीब ही था जिसे कभी तुमने अपनी कहानियों का केंद्र बनाया था. याद आया यहीं कहीं आसपास एक तालाब था जिसमें तुम डूबते-डूबते बची थीं. यह घटना बड़े विस्तार से तुमने बताई थी.

खड़े-खड़े काफी समय गुजर गया. शाम घिर आयी थी और अंधेरा भी छाने लगा था. लगा अब यहाँ अधिक देर तक रुकना ठीक नहीं होगा. तभी वह लड़की नज़र आयी जो मुझे जबरदस्ती यहाँ खींच कर लायी थी. वह करीब आ रही थी, हंसती-खिलखिलाती. उस लड़की से मुझे डर लगने लगा. लगा वह कुछ ऐसा कर देगी जिससे कहीं न कहीं मुझे भीतर तक घाव कर जायेगा. मेरे पैर जवाब दे रहे थे. मैं बैठना चाहता था लेकिन उस खुरदुरी जमीन पर मैं बैठने में अजीब सा महसूस कर रहा था. वह मेरे करीब आ चुकी थी.

कॉलेज के वार्षिकोत्सव में मेरे भाषण पर खूब तालियाँ बजी थीं. बच्चों को मेरा खुलापन काफी पसंद आया था. बिना लाग-लपेट के, बनावट से दूर मेरी बातें बच्चों को अपने काफी करीब लगी थीं. बाहर मैदान में खड़ा था, गुनगुनी धूप का आनंद लेता मैं बच्चों के सवालों का जवाब दे रहा था. सवाल सब सहज थे खासकर मेरे लिए क्योंकि उन सवालों में मेरे लिए उलझन खड़ा करने वाला नहीं था. मेरी विद्वता के सभी कायल लग रहे थे, तभी एक किशोरी ने अपने सवाल से मुझे कटघरे में खड़ा कर दिया-" जिम्मेदारियों की बात करने वाले आप, क्या अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह कर सके? " एक टीचर ने उसे रोकने की कोशिश की. पर मैं हाथ के इशारे से उन्हें चुप करा दिया! " नहीं, मैं नहीं कर सका और यह स्वीकार करने में मुझे झिझक भी नहीं होनी चाहिए. मैंने कभी इस बात का दावा नहीं किया कि मैं पूरा हूँ. हाँ पूरा बनने की कोशिश जरूर करना चाहता हूँ." लगा वह लड़की मेरे उत्तर से संतुष्ट थी. अच्छी लगी वह बच्ची. पूछा-" तुम्हारे पिता क्या करते हैं? " उसने संक्षेप में उत्तर दिया-" नहीं रहे. माँ है. गाँव में रहती है. मुझे लगता है, आप मिलना चाहेंगे." मैंने यूँ ही कह दिया-" क्यों नहीं."

वह मुझे खींच ले गयी. मुझे लग रहा था - लड़की कुछ छिपा रही है. शायद इसलिए भी मैं उसके साथ आगे बढ़ गया. मेरे साथ कार में बैठी वह चंचल सी किशोरी मेरे काम के बारे में पूछती रही और मैं उसके सवालों का जवाब ऐसा देता रहा जैसे कोई शोध छात्र मेरा इंटरव्यू कर रहा हो. बीच-बीच में वह ड्राइवर को रास्ता बताती चल रही थी. उस बातूनी लड़की से बातें करना मुझे अच्छा लग रहा था. उसकी आँखें नाच रही थीं और वह इस बात से बेखबर कि मैं उसे, उसकी हरकतों को बड़े गौर से देख रहा हूँ, धाराप्रवाह बोले जा रही थी. अचानक उसने ड्राइवर से कहा-' अंकल रोकिये.'. कार नहर के किनारे एक परती पड़ी जमीन के पास रुक गई.

वह लौट रही थी अकेली. पास आने पर मैंने पूछा-' क्यों क्या हुआ? " माँ घर पर नहीं है.' मुझे लगा वह कुछ छिपा रही है. उसकी चमकती आँखों में पानी जैसा कुछ दिख रहा था. मैं जानता था, तुम मुझसे मिलना नहीं चाहती और यह बात बताकर वह बच्ची मुझे दुखी नहीं करना चाहती शायद. मैंने उसे अपनी बाँहों में समेट लिया. उसके बालों को सूँघना मुझे अच्छा लगा. वह सुबक रही थी ठीक तुम्हारी तरह, मेरे कोट को कसकर अपनी मुट्ठियों में भींचे हुए. मैंने उससे कहा-' मुझसे मिलना. शायद अच्छा लगेगा.'

दूरी जैसे खत्म ही नहीं हो रही थी. मैं इस पूरी कहानी में खलनायक तो कभी नहीं रहा, फिर क्यों खुद को दोषी महसूस कर रहा हूँ. सब कुछ उसी तरह हुआ जैसा तुम चाहती थी. तुमने ही तो कहा था-जलने के लिए जरूरी है लकड़ी का सूखा होना. तुमने त्याग की बात की थी. तुमने कहा था-क्या सोचेंगे लोग. कहींगे-वकील साहब की दूसरी बेटी भी वैसी ही निकली. और जैसा कि होता है, कसमें, वादे, प्यार, वफा.... उस चमकती आँखों वाली लड़की ने जब मुझे मेरी जिम्मेदारियों की याद दिलायी तो मुझे लगा कि सचमुच मैं कहीं चूक गया. वाकई तुम वैसा ही चाहती थी तभी तो-. नहीं तुम खुद का ही नहीं समझ पायी थी और आज भी तुम उसी भय में जी रही हो. तुम्हें मुझसे नहीं खुद से डर लग रहा है. तुमने अपनी बेटी को मेरे जैसा बनाना चाहा. मैं महसूस कर रहा हूँ, उसकी आँखों में खुद के लिए एक अजीब सा अहसास. वह मुझे लेकर आश्वस्त है. मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि तुम अपनी बेटी की आँखों की भाषा क्यों नहीं पढ़ पायी. आज भी तुम्हारी चिट्ठियाँ मेरे पास हैं. उन्हें पढ़ता हूँ तो ऊर्जा मिलती है मुझे. फिर कहाँ खो गया तुम्हारा आत्मविश्वास.

गेस्ट हाउस के पास गाड़ी रुकी तो लगा लम्बा सफर करके आया हूँ. महज दो घंटे का सफर पूरी जिंदगी का सफर लगा. वैसे जब भी मैं कुछ लिखता हूँ, थक जाता हूँ पर आज तो.... अब शायद ही कुछ लिख पाऊँ. मन बेचैन था, यह बात मुझे साल रही थी कि उस प्यारी सी बच्ची का भ्रम तोड़ा. अच्छा नहीं किया. वह यदि यही सोचती कि मैं गैर जिम्मेदार किस्म का आदमी हूँ तो मेरा कुछ बिगड़ तो नहीं जाता. अब वह लगातार मुझ.' मि.' करेगी. मैंने कह दिया कि वह मुझसे मिल सकती है परंतु लगता है, वह फिर मिलना नहीं चाहेगी. वह खुद नहीं चाहेगी कि मेरा मन दुखी हो. बिन बाप की लड़की. मैं भावुक होने लगा था, अपने स्वभाव के विपरीत.

'आओ काफी पीते हैं' - तुमने प्रस्ताव किया था. मैं तुम्हारी बात को टाल गया था, हमेशा की तरह. तुम फिर मुझ पर खीझी थी पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किये बिना रिक्शे पर बैठकर चल दी थी. मैं खड़ा-खड़ा बड़ी देर तक सोचता रहा, जिंदगी के उतार चढ़ाव पर. कितना अंतर है दोनों की सोच में, पर रह भी नहीं पाते एक दूसरे के बिना. मेरे लिए समाज महत्वपूर्ण, तुम्हारे लिए मैं महत्वपूर्ण, तुम्हारे लिए मैं महत्वपूर्ण. दिखने में सीधे रास्ते पर चलते दो लोग और सोचने पर उलझते बिंदु. वक्त अपनी रफ्तार से चलता रहा और हम अपनी रफ्तार से. कौन कहाँ गया, कौन कहाँ पता ही नहीं चला. या यों कहा जाये कि पता करने की कोशिश भी नहीं हुई. परंतु मन की दूरी नहीं बढ़ी. मैं अकेले चलता रहा निर्द्वन्द्व. चलते चलते दक्षिण के एक विश्वविद्यालय में ठाँव मिली और फिर वहीं का होकर रह गया. काम के बीच सोचने का वक्त ही नहीं मिलता. कभी उत्तर की ओर आया भी तो दोस्तों से मिलने का मन नहीं हुआ. कभी किसी से मुलाकात हुई भी तो बस दुआ सलाम तक ही बात हुई. पहली बार पुरानी दुनिया से रूबरू हुआ और वह इस कदर भीतर तक....

मुझे नहीं आना चाहिए था यहाँ. बड़ी मुश्किल से उबर पाया था, उस स्थिति से जिसने जीना मुश्किल कर रखा था. कहना आसान होता है पर जीना कितना मुश्किल, यह वही जानता है जिसने अपने से अपनी सोच से कट कर जीने की कवायद की हो. नहीं मैं अब तक झूठ कहता रहा हूँ कि मैं भावुक नहीं हूँ. सरासर झूठ है यह. एक छोटी सी बच्ची ने इतना बांध लिया हो..... बड़ी ने ऐसा कदम उठा लिया कि सभी स्तब्ध रह गये. किसका कसूर था, इसकी व्याख्या नहीं करूँगा. हो सकता है उन्होंने जो किया वही सही हो. पर उनके एक कदम का असर हम पर पड़ा. वे दोनों अपने अपने घर सुखी हैं अपने बच्चों के साथ और हम अपनी कहानियाँ बुनने में लगे हैं. खैर उस समय तो हालात ही कुछ और थे. इस दौरान हमारे रिश्ते की भी काफी जाँच हुई और तुम ऐसी दुनिया में चली गई जिसके बारे में सोचना भी मेरी आत्मा को गवारा नहीं था. फिर वह शहर ही मेरे लिए जैसे बेगाना हो गया.

हवा तेज़ थी और वक्त भी उसी रफ़्तार से गुजर रहा था. विचारों को पंख लग गये थे. शहर वही था पर वह ऊष्मा नहीं थी.

पचीस वर्ष का समय बहुत छोटा तो नहीं होता. परंतु मुझे लगता, बस एक ही कदम दूर तो है, गुज़रा वक्त. जैसे मेरे लिए सब कुछ ठहर सा गया था. यह बात अजीब लग सकती है लेकिन यह सच. शायद मनोवैज्ञानिक इसे सही ढंग से समझ सकें. मेरे लिए वक्त की चाल अबूझी ही रही. न कभी वर्तमान में जी पाया और न ही भविष्य की सोच पाया. जो था बस था. यदि सचमुच किसी चीज में दिलचस्पी थी तो वह था मेरा क्लास. मैं सचमुच किताबों और छात्रों में ही जी पा रहा था. कभी-कभी खुद सोचता-जो मैं बोलता हूँ, उसका अर्थ जानता भी हूँ या नहीं. वह कौन सी दुनिया थी जिसे मैं सच समझे बैठा था. अब सोचता हूँ तो लगता है चलते-फिरते मैं कोमा में चला गया था जहाँ से आज वापस आया हूँ.' सर गाड़ी ढाई घंटे लेट है, चाय बनाऊँ.' डाक बंगले का रसोइया था.' हाँ जरूरत महसूस हो रही है.' मेरे मुंह से बड़ी मुश्किल से आवाज निकली. लेकिन सच कहूँ, मन कह रहा था यहीं इसी शहर में रह जाऊँ. कोई कह कर तो देखे. पर यह मेरे मन का वहम था. ऐसा कोई नहीं था जिसे मेरी जरूरत होती. वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है और बदल जाते हैं रिश्ते भी.

वही थी. धीमे-धीमे आगे बढ़ रही थी. वही चुलबुली लड़की, पर उसकी आँखों में कुछ भारी भारी सा नजर आ रहा था. लग रहा था वह अपनी उम्र से बीस वर्ष बड़ी हो गयी है. करीब आयी. वही थी. अपने पर्स से चिट्ठी निकाली और मेरी ओर बढ़ा दिया. वह तुम थी-' तुमसे कट नहीं सकती और जुड़ना नियति में नहीं है. यह मेरे पास रहेगी तो तुम हमेशा मेरे करीब नजर आओगे, जीना और कठिन हो जायेगा. तुम्हारी यात्रा आसान करने का कोई इरादा नहीं है और न ही तुम पर कोई एहसान करना चाहती हूँ. यह साथ रहेगी तो बोलना जाओगे और जिम्मेदारी का अहसास भी पनपेगा. मुझसे जो हो सका किया, जानती हूँ तुम बेहतर सोच सकते हो. एक इल्तज़ा है नहर के किनारे फिर मत आना. किसी भी तपस्या भंग करना सबसे अपराध होता है. तुम किसी पर निर्भर रहना पसंद नहीं करते. पर जानती हूँ, मेरा कहना टाल नहीं पाओगे. इस बेटी को शादी के बाद भी अपने पास ही रखना, मुझे सुख मिलेगा.' पत्र के अक्षर एक-एक कर आँखों पर नाच रहे थे.

मैं सोच नहीं पा रहा था. कहीं वह प्रायश्चित तो नहीं कर रही. मैंने हाथ बढ़ाया और उसकी ठुड्डी उठाकर देखी, आँखें भर आयीं थीं. हवा में नमी बढ़ गयी थी.

© 2009 Gopal Ranjan; Licensee Argalaa Magazine.

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