इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
सप्त रंगी फूल खिले उपवन में, एक फूल निराला था
मीठी मीठी खुशबू देता, मंद मंद मुस्कराता था
इक लड़का भोला भाला सा, रोज उपवन में आता था
उसी फूल के आगे आकर, रोज खड़ा हो जाता था
एक दिन ज़ोर की आँधी आई, फूल टूट कर बिखर गया
पर अपनी खूशबू फैलाकर, हर दिल में वह उतर गया
वह लड़का जब उपवन में आया, उसने फूल नहीं पाया
बिखरी पंखुड़ी पड़ी ज़मीन पर, अश्रु बिंदु गालों तक आया
रहता वह ग़मग़ीन सदा ही, फिर भी बाग में आता था
मीठी सी मुस्कान फूल की, यादों में खो जाता था
एक दिन वह भारी मन से, सेना की छावनी में आया
पहन के वर्दी सैनिक की, वह जंग बहादुर कहलाया
उधर मची हलचल सरहद पर, दुश्मन आगे बढ़ आया
ले सैनिक की टुकड़ी साथ में, सरहद पे तिरंगा लहराया
वह कहता था जिऊँ मैं जब तक, फूल ही जैसे मुस्काऊँ
वीर गति पाऊँ यदि रण में, सुगंध फूल जैसी फैलाऊँ
और आया वह दिन जल्दी ही, जब सीने में गोली खाई
कहर बरपाया दुश्मन पर, उसने भगदड़ वहाँ मचाई
आखरी दुश्मन गिरा ज़मीन पर, वह भी भी ज़मीन पे आया
थी मुस्कान चेहरे पर उसकी, यमदूत ने शीश झुकाया
जब जब फूल खिले उपवन में, हर बार एक फूल निराला था
सैनिक जैसे तन कर रहता, मंद मंद मुस्कराता था
माँ सैनिक की बाग में आती, जब जब फूल खिले
आँखों में आँसू आ जाते, जब फूल से गले मिले.
© 2009 Harendra Singh Rawat; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: हरेन्द्र सिंह रावत
उम्र: 91 वर्ष
शिक्षा: बी. ए. (दिल्ली विश्वविद्यालय)
संप्रति: पेंशनभोगी
प्रकाशित रचनायें: कई कविताएँ, कहानियाँ और संस्मरण विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित
अभिरूचियाँ: पढ़ना और लिखना
यात्राएँ: अमरीका
संपर्क: फ्लैट # 204, प्लॉट # 24, से. 10, द्वारका, नई दिल्ली - 110075