इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
मन के पीछे चलने वाले,
मन के साथ भटकना होगा.
हाँ, अभी देखी थी मन ने
रंग-बिरंगी-सी वह तितली
फूल-फूल पे भटक रही थी
जाने किसकी खोज में पगली.
पर वह पीछे छूट गई है
इन्द्रधनुष जो वह सुन्दर है
अब उसको ही तकना होगा.
मन के पीछे चलने वाले,
मन के साथ भटकना होगा.
बच्चों-सा जो कल सीधा था
और कभी किशोर-सा चंचल
आज वयस्कों-सा वह दूर, क्यों
रूप बदलता है पल-पल ?
मन घबराए, गुस्सा आए
चोट लगे, आँसू आ जाएँ
हर कुछ को ही सहना होगा.
मन के पीछे चलने वाले,
मन के साथ भटकना होगा.
(शहर की ज़िंदगी को समर्पित)
तरस गई हूँ मैं
पथरा गई आँखें.
देख चुकी रास्ता
कई बार जा के.
पूछा पड़ोसियों से
उसे देखा है कहीं.
पागल समझते हैं
मुझे लोग सभी.
बहुत मन्नतें माँगी
बहुत रोई, गिड़गिड़ाई.
कितने संदेशे भेजे पर
काम वाली आज फिर नहीं आई.
© 2009 Jaya Jha; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: जया झा
जन्म स्थान: बाँका (बिहार)
शिक्षा: बी. टेक, (; आई. आई. टी., कानपुर); एम. बी.ए. ( आई. आई. एम., लखनऊ; बैच टॉपर)
अनुभव: बेंगलूरु में पहले एक स्टार्ट-अप और फिर गूगल इण्डिया में बतौर प्रोडक्ट मैनेजर काम किया. 2007 में अपनी कंपनी पोथी.कॉम शुरु की जो कि पुस्तकों के प्रकाशन के लिए प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराती है.
कविता संग्रह: कविताओं का एक संकलन स्कूल के दिनों में ही नॉवेल्टी प्रकाशन, पटना द्वारा प्रकाशित; दूसरा संकलन 'कुछ पल' पोथी.कॉम के माध्यम से स्व-प्रकाशित किया है
अभिरूचियाँ: साहित्य और अन्य चीजें लिखने-पढ़ने का बचपन से शौक.
वेब साईट: http://jayajha.wordpress.com