अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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गीत माधुर्य

कृष्ण स्वरूप राजवंशी

उनका वैरागीपन कैसा लगता है?

तम का एकाकीपन कैसा लगता है?
जीवन का नीरस सुख कैसा लगता है?

जब भी गोद हरी होती है अँधियारे की,
निशा सिमट खो जाती है उजियारे में.
विवश चाँदनी रातों को रोना पड़ता है,
रिमझिम सावन की भीगी रातों में.

मन का सूना बन्धन कैसा लगता है?
जीवन का एकाकीपन कैसा लगता है?

तारों की गिनती का इतिहास बहुत ही लम्बा है,
राही का दीपक सम्बल बन जाता है अँधियारे में.
बड़े बड़े पेड़ों को क्षण में काटा जाता है,
एक शूल का दर्द नहीं मिटता चौबारे में.

तम का एकाकीपन कैसा लगता है?
उनका वैरागीपन कैसा लगता है?

बरसों बाद मिले हो मुझको

बरसों बाद मिले हो मुझको
वैसी गरमी प्यार नहीं है
अपने भी अनजाने लगते
आँखों में मनुहार नहीं है

नपी तुली सी श्वास पर,
केवल बस था नाम तुम्हारा
भीगी-भीगी सी आँखों में
स्पष्ट बना प्रतिबिम्ब तुम्हारा

अपने जब अनजाने बनते,
हृदय मुकुर खंडित हो जाता
खंड-खंड फिर जीवित होकर,
विस्मृतियों के चित्र बनाता

पलक उठाकर तुमने देखा,
पलक झुकाई झुकी रह गई
भीड़ भाड़ में रहा अकेला,
भीगी भीगी पलक रह गई

हर आहट ऐसी लगती थी,
जैसे तुमने मुझे पुकारा
बहुत दिनों के बाद मिले थे,
भूल गये थे नाम तुम्हारा

अवसादों ने घेरा लेकिन,
मुझको तुमसे प्यार वही है
भूलो मुझको, नाम हमारा,
दर्द वही अभिसार वही है

बरसों बाद मिले हो मुझको
वैसी गरमी प्यार नहीं है
अपने भी अनजाने लगते
आँखों में मनुहार नहीं है.

© 2009 Krishna Swarup Rajvanshi; Licensee Argalaa Magazine.

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