अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

मलखान सिंह

एक

वही
मंज़र
बंज़र
कँटीला जंगल
और
वही तपन झुलसन
साँय साँय अट्टहासतीं
चुभती हवाएँ
वही सड़ाँध
और
उस पर उगे कुकुरमुत्ते
कुछ भी तो नहीं बदला
बदला है केवल
कुकुरमुत्तों का रंग.

दो

ख़ामोश
शुष्क होठों पर
बंद है
दर्द - ए - दास्तान
क़ैद है दिलों में
टीस और घुटन
सुर्ख़ आँखों में
झुर्र्यों से बँधे
रंगीन सपनों के
टूटे हुए टुकड़े
बेचैन है
झुलसता तनबदन
फिर भी.
गड्डों से झाँकती
आँखों को
जाने किसका इंतज़ार
आज भी है.

तीन

धधकते मस्तिष्क में
उबल रहे थे
कई प्रश्न
रक्तिम आँखें
ज्वालामुखी की तरह
फट रही थी
ढुलमुल
निर्बल आत्मा
ललकार रहा था
'मैं'
सन्नाटे को
चीरती हुई
गूँज उठी
धाँय धाँय.
चटककर खड़ा हुआ
नथुने फुफकार उठे,
अटेंशन -
लाल सलाम!
लाल सलाम!!

चार

मेरे घाव में
कब तक मथेगा?
तू! कलम मथानी.
नहीं मिलेगी इरीम किरीम
नहीं मिलेगी दृष्टि - समष्टि
तेरी डीलिंग बाजी
तेरी कला कुशलता
सब जाने -
मेरी दीन विवशता.

© 2009 Malkhan Singh; Licensee Argalaa Magazine.

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