इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
धड़ाम की आवाज के बाद कुछ पल की शान्ति और फिर उसके बाद जोर से रोने की आवाज आई. देवेन्द्र ने देविका को आवाज लगाई, " देखना देवी, यह किसके गिरने की आवाज है. " तभी रोने की आवाज और अधिक तेज हो गई. " देख देवी कहीं शुभ तो नहीं रो रहा है, लगता है गिर गया है, कहाँ है, शुभा. " देविका तुरन्त भागी. चार वर्ष का शुभ देवेन्द्र और देविका का प्यारा पोता बाथरूम में फिसल कर गिर गया था. रोते पौत्र को गोद में उठा कर देविका चुप कराने लगी. " बेटे बाथरूम में धीरे धीरे जाते हैं, आप तेजी से भागते हुए गये होगे, तभी फिसल कर गिर गए न, कोई बात नही, कहीं भी चोट नहीं आई, मेरा बहादुर बेटा, कपड़े गीले हो गए हैं, इनको जल्दी से बदलो, नहीं तो जुकाम लग जाएगा. " दादी की गोद में दादी के प्यार के बाद शुभ चुप हो गया, फिर धीरे से गोद से उतर कर बहुत धीरे धीरे बाथरूम की ओर जाने लगा.
"शुभ इतना धीरे धीरे क्यों चल रहे हो, क्या दर्द हो रहा है."
"नहीं दादी, आपने कहा न, बाथरूम धीरे धीरे जाते हैं, इसलिए. बहुत जल्दी भूल जाती हैं आप. अभी तो आपने कहा था न."
नन्हे पौत्र की शैतानी भरी बातें सुन कर देविका हँसने लगी.
"दादी हँस क्यों रही हो. बड़ी दादी की पिटाई करो. उसने मेरे को बाथरूम में गिराया है."
"बड़ी दादी के बारे में ऐसा नहीं बोलते हैं."
"क्यों नहीं बोलते, अभी अभी ममता बाथरुम सुखा कर गई है. बड़ी दादी ने आगे बैठ कर शूशू किया है. बाथरूम का दरवाजा भी बंद नहीं करती. खुले बाथरूम में बैठ कर शूशू करती हैं. पॉट में भी नहीं बैठती हैं. बड़ी दादी शूशू करके निकली, मैं बाथरूम में शूशू पर फिसल गया."
नन्हे शुभ के मुंह से सच्ची बात सुन कर देविका सन्न रह गई, यह सोच कर काँप गई, कि कहीं घर में महाभारत न छिड़ जाए. अगर बड़ी दादी अर्थात देवेन्द्र की माँ और देविका की सास ने शुभ की बातें सुन ली, तो शत प्रतिशत घर में तीसरा विश्वयुद्ध तो किसी भी क्षण छिड़ सकता है. देवेन्द्र भी तब तक वहीं पहुंच गया. "क्या हुआ, शुभ गिर गया, बहादुर बच्चे रोते नहीं हैं." देवेन्द्र ने शुभ को अपनी गोद में लिया और कमरे की तरफ प्रस्थान करने ही वाला था, कि जिस बात की आशंका देविका को थी, वही हो गई. बड़ी दादी ने शुभ की बात सुन ली थी, जो अभी ड्रॉईंग रूम में बैठी थी, वहीं से तेज स्वर में बोली, "देखो कैसा जमाना आ गया है, छोटा, अभी छटाँक भर का है नही, मेरे पर इल्जाम लगा रहा है, मैने कब तेरे को धक्का दिया है."
इतना सुन कर शुभ रोते हुए बोला, "आपने शूशू किया है. आपके शूशू पर फिसल गया. " कह कर और तेज स्वर में रोने लगा.
"हाँ हाँ और चीख कर सच्चा बन, शूशू बाथरुम में नहीं करूँगी तो कहाँ करूँगी." बड़ी दादी ने रौब से कहा."
यह सुन कर देवेन्द्र और देविका सन्न रह गये कि माँ आखिर क्या और क्यों शुभ को बोल रही है. वे दोनो जानते थे कि माँ और बुर्जुगों की तरह इंगलिश पॉट का इस्तेमाल नहीं करती हैं और शूशू पॉट के बारह ही करती हैं. लेकिन छोटे शुभ ने पलटवार किया, " शूशू पॉट में करते हैं."
"बड़ा आया पॉट वाला, बाथरूम में किया है, कौन सा कहीं और कर दिया, जो रोए जा रहा है, चुप कर छटाँका."
"माँ, क्या बोले जा रही हो, शुभ छोटा बच्चा है, बहस करने की कोई जरूरत नहीं है, आप चुप करो. " देवेन्द्र ने माँ को समझाते हुए कहा."
"मैं भी आपके मुँह में शूशू करूँगा, तब आपको पता चलेगा, कैसे शूशू करते हैं." शुभ बोल पड़ा.
"देख पिद्दी की हरकतें, कैसे मुझ बुड्ढी से लड़ रहा है. और सिखाओ बच्चों को, बड़ों की बेइज्जती कैसे करते हैं."
माँ के लड़ाके तेवर देख कर देविका शुभ के साथ कमरे में चली गई. देवेन्द्र ने माँ को कहा, " देखो, हमने शुभ को कुछ नहीं सिखाया, आप शान्ति रखे. आप ने गलत शुरूआत की तो शुभ भी चुप नहीं रहा. आपको मालूम है, वह बहुत बातूनी है, हमसे भी सारा दिन प्रश्न पूछता रहता है. आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए था, हम बड़े तो किसी बात पर चुप रह जायेंगे, पर बच्चे कभी भी चुप नहीं रहते हैं, उलटा कुछ न कुछ जरूर बोलते हैं, बच्चों को सही बात समझा कर चुप कर सकते है, यदि गलत बात पर बच्चों से बहस करेंगे तो हम खुद बच्चों को गलत संस्कार देंगें. जैसा हम बोलेगें, वैसा ही बच्चे सीखेंगे, बोलेंगे, जवाब देंगे. आखिर हमें देख कर ही बच्चे बढ़े होते हैं. बच्चों को नकल करने की आदत होती है, तभी हम उन्हे नकलची बंदर कहते है. आपने जो कहा, वैसा ही उसने उलटा जवाब दिया."
"अरे तू एक पिद्दी को संभाल नहीं सकता, मैने पाँच बच्चों को पैदा किया, पाल-पोस के बड़ा किया, कह तो ऐसा रहा है, जैसे तुम पाँचों बच्चे थे ही नहीं, बड़े पैदा हुए थे."
"पाँच भाई बहन तो हैं, लेकिन बनती किसी की नहीं है. जैसा तुम बहस कर रही हो, वैसा हम आपस में करते हैं."
"तू कहना क्या चाहता है, कि मैंने तुमको गलत पाला."
"माँ बात को समझो, आप की बहस करने की आदतें हम भाई बहनों में भी हैं. यही आदतें छोटे नन्हे शुभ में आ रही हैं. हमें बहस करता देख कर वह भी बहस करता है. देखा आपके साथ कैसे बहस कर रहा था."
"तू कहना क्या चाहता है, मैं गलत हूँ, तुम सही हो."
"मैं आज की बात करता हूँ, आज तो आपने गलत बात की है."
माँ तमतमा गई. "अब तू मुझे सिखाएगा, मैं क्या बात करूँ. उसको सिखाएगा, जिसने पाल-पोस कर बड़ा किया. आज तू दादा बन गया तो यह मतलब नहीं कि मेरा दादा बन गया है. तेरी माँ रहूँगी, बात करता है. अपनी माँ की बेइज्जती करता है. " कहते हुए माँ घर के बाहर मेन गेट पर बैठ गई. बैठ कर शोर मचाने लगी.
"क्या जमाना आ गया है, अब मुझे दो चार साल के बच्चों से सीखना पड़ेगा, किससे क्या बात करूँ. मेरा बेटा कहता है, मैं गलत हूँ." माँ अर्थात बड़ी दादी के विलाप से गली की सफाई कर्मचारिनी, दो चार राहगीर और पड़ोसी जमा हो गए. उन्होनें तो केवल तमाशा देखना था. वे हाँ में हाँ मिलाते गए. घर के गेट पर शोरगुल सुन कर देवेन्द्र ने बाहर आ कर तमाशबीनों को हटने को कहा. जवाब में एक आदमी ने कमेन्ट कस दिया. "बूढ़ी माँ को तंग करते हो, माफी माँग कर इज्जत से घर में ले जाओ, वरना एक फोन घुमाने की देर है, दर्जनों टीवी न्यूज चैनल वाले इक्कठे हो जायेंगे. मिस्टर जेल की हवा खानी पड़ सकती है." इतना सुन कर देवेन्द्र का माथा ठनका. सब तमाशबीनों से हाथ जोड़ कर माफी माँगी और माँ को मनाने में जुट गया. माफी माँगता देख माँ के तेवर और तीखे हो गए. " माँ कभी गलत नहीं होती है, समझ ले." काफी ना-नुकुर के बाद माँ घर के अंदर गई और तमाशबीनों की भीड़ छट गई. देवेन्द्र एक हारे हुए जुआरी की तरह चुपचाप कमरे में आया, जहाँ देविका रो रही थी. नन्हा शुभ भौचक्का सा देविका की गोद में सहमा सा गुमसुम चिपका था. गंभीर वातावरण को बदलने के लिए टीवी ऑन कर कार्टून चैनल लगाकर शुभ को अपनी गोद में लिया.
"शुभ उदास क्यों हो, देखो आपका प्यारा मनपसन्द कार्टून चैनल. " देवेन्द्र ने नन्हे शुभ के गाल पर एक प्यारा सा चुम्बन लेकर कहा.
"दादा, बड़ी दादी मेन गेट पर बैठ कर लड़ाई क्यों कर रही थी."
"आप इसको भूल जाओ और कार्टून चैनल देखो. " देवेन्द्र ने शुभ को बहलाने की कोशिश की, लेकिन उसने फिर प्रश्न किया " बताओ न दादा, बड़ी दादी क्यों लड़ाई कर रही थी. बाहर लोग क्या कह रहे थे. " नन्हे शुभ की भोली बातें सुन कर देविका ने कहा, " आप जितना यत्न कर लें, एक छोटे बच्चे को बहका नहीं सकते हैं. माँ की गलत बात पर क्यों परदा डाल रहे हैं."
"बात परदे की नहीं है, घर में शान्ति रखने की है. लड़ाई झगड़े से बच्चों के नाजुक मस्तिष्क पर गलत असर पड़ता है."
"क्या घर की शान्ति का सारा जिम्मा आपने ले रखा है, माँ का कुछ दायित्व नहीं है, शान्ति बनाने में. एक छोटे नन्हे से बालक से ऐसे लड़ रही थी, जैसे कोई हमौम्र हो. बच्चे की सही बात भी नहीं मान रही थी. लड़ कर कोई मान मर्यादा बढ़ गया क्या. छोटे बच्चे को दुश्मन समझ कर लड़ रही थी. क्यों आप हमेशा माँ से दब जाते हो. आपके दूसरे भाई बहन जमकर उलटे जवाब देते हैं. माँ की हिम्मत नहीं होती किसी से बहस करने की. भीगी बिल्ली की तरह उनके घर चुपचाप पड़ी रहती है. सारी भड़ास यहीं आप पर उतरती है. सारी उम्र माँ की बातों को सहा है, अब छोटे बच्चे पर माँ की भड़ास नहीं सह सकूँगी. क्यों नहीं बोलते माँ को."
"दादा भीगी बिल्ली क्या होता है. बड़ी दादी बिल्ली क्यों बन जाती हैं. बताओ दादा."
"भीगी बिल्ली एक मुहावरा है."
"मुहावरा क्या होता है. " शुभ ने फिर से प्रश्न किया. दादा, पोता थोड़ी देर तक कार्टून चैनल देखते हुए बातें करते रहे. थोड़ी देर बाद शुभ को नींद आ गई, तो देवेन्द्र और देविका का वार्तालाप फिर शुरू हो गया. " आप माँ को समझाते क्यों नहीं हो, बच्चों से बहस जिद उचित तो है नही."
"तेरी बातें उचित हैं, समझाता बहुत हूँ, लेकिन बुढ़ापे में हर व्यक्ति समझने पर अपनी तौहीन मानता है. जब पूरी उम्र बच्चों पर अपनी मरजी चलाई, तो बच्चों की सही बात भी अखरती है. इसलिए हर घर में झगड़े होते हैं, जिससे मैं कतराता हूँ. आज भी माँ को समझाने की पूरी कोशिश की, लेकिन समझने के बजाए गली में तमाशा खड़ा कर दिया, जिस कारण बिना किसी बात के तमाशबीनों से माफी माँगनी पड़ी."
"सब आप की कमजोरी है, माँ को कुछ नहीं बोलते."
"हम अपने बच्चों पर खुद अपने व्यवहार को विरासत में देते हैं. जैसा हमारा व्यवहार, आदतें होती हैं, बच्चे उसी का अनुसरण करते हैं. मैंने हमेशा कोशिश की है कि खुद अच्छा व्यवहार करूँ ताकि हक से बच्चों को कह सकूँ कि वे भी अच्छी आदतें अपनायें. अपने बच्चों को देख लो, प्रथम को कोई बुरी आदत नहीं है, बहू प्रतिमा को देखो, तुम्हारा कितना मान सम्मान करती है. बहू कम और बेटी अधिक है. हम बच्चों का ध्यान और ख्याल रखेंगे तो उससे अधिक वो हमारा ध्यान और ख्याल रखेंगे. अब तुम खुद अपने बच्चों की तुलना मेरे भाई बहनों के बच्चों से कर सकती हो. माँ बाप को गाली निकाल कर बात करते हैं, क्यों कि खुद मेरे भाई बहनों का उग्र स्वभाव है. विरासत में बच्चों को भी वही स्वभाव मिला. जब बच्चे छोटे होते हैं, गाली निकालने, उनके झगड़ने पर हम खुश होते हैं, देखो पिट के नहीं आया, दूसरे बच्चों को पीट कर आया है. बुनियाद बचपन में ही पड़ जाती है. बे हो कर झुकना, समझौता करना शान-ओ-शौक़त के खिलाफ हो जाता है. मैं मानता हूँ कि माँ का स्वभाव उग्र है, जो गलत है. आज जो शुभ के साथ किया और मेन गेट पर बैठ कर तमाशा किया, बिल्कुल गलत है. यदि माँ सिर्फ एक शब्द बोल देती कि शुभ आगे से ख्याल रखूँगी तो एक पल में बात समाप्त हो जाती. बच्चा भी खुश हो जाता और अच्छे संस्कारों के बीज पनपते. बुजुर्ग अपनी हठ नहीं छोड़ते, कि बच्चों से नीचे हो जायेंगे. अपने बच्चों से तालमेल ही बड़प्पन की निशानी है. इसी कारण अपना बेटा प्रथम कोई भी कार्य करने से पहले हमारे से सलाह लेता है और हम अपने अनुभवों के अनुसार उसका मार्ग दर्शन करते हैं. जबकि मैं माँ को कुछ भी नहीं बताता, क्योंकि उसकी आदत मीनमेंख निकालने की है, कि मेरे से पूछ के कोई काम करते हो, अब क्यों पूछ रहे हो. इसलिए न बताने पर ही भलाई है. दुनियादारी बड़ी कठिन है. जो भी कर लो, कोई खुश नहीं होता."
"हमने किसी का क्या करना है. अपने घर में शान्ति रहे, बस यही चाहा है." देविका ने कहा.
"इसी बात की कोशिश करता हूँ."
"एक कोशिश और करो, माँ को कहो, कम से कम नन्ही जान शुभ को तो बख्श दे. उससे बहस न किया करे. क्या कसूर है शुभ का, जो अपनी भड़ास आज बच्चे पर निकाली है."
"देविका तेरे सामने ही बात बहुत शान्ति के साथ की थी, लेकिन खुद तुमने देखा कि गली में तमाशबीन एकत्रित कर लिए. मैं ऐसा मजबूर हुआ कि बिना गलती के माफी माँगनी पड़ी."
"अउर माँग भी क्या सकते हो."
"खाना, शुभ को भी भूख लगी होगी. कुछ बना दे, शान्ति के साथ भोजन करे."
"माताश्री से भी पूछ लो, नहीं तो फिर शुरू हो जायेंगी, बहुएँ सास को भूखा रखती हैं, किसी टीवी चैनल वाले को बुला लिया तो मुसीबत हो जाएगी."
"ठीक कहती हो, देविका."
"मैं तो हमेशा ठीक कहती हूँ, लेकिन सुनता कौन है."
"मैं तो सुनता ही हूँ."
"कहाँ सुनते हो, एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देते हो."
"सफल गृहस्थी के लिए सब कुछ करना पड़ता है."
"भारत में शरीफ पत्नियाँ होती हैं, अगर अमेरिका, यूरोप होता तो कब का तलाक हो जाता. सास की कोई नहीं सुनता है. सब अलग अलग रहते हैं."
"मैं कभी अमेरिका, यूरोप तो नहीं गया, लेकिन सुना है, वहाँ गृहस्थी नाम की कोई चीज ही नहीं होती है. छोटी सी बात पर तलाक हो जाते हैं. अखबार में पढ़ा, कि एक बार तो शादी के कुछ घंटों बाद ही तलाक हो गया."
"भारत में खाना खाना है, य यूरोप जाना है."
"अपुन तो भारत में ही रह कर खुश हैं, जीवन के उतार-चढ़ाव, गृहस्थी के झमेलों में ही खुश हैं."
देविका ने खाना परोसते हुए पूछा, " ऐसा गृहस्थी में कब तक."
"अंतिम साँस तक, यही दुनिया है और गृहस्थी का सुख, आनन्द है. मिलजुल कर ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव सहना और जीना ही गृहस्थी की सफल कुंजी है, जिसका परम आनन्द और सुख केवल गृहस्थ इंसान ही प्राप्त करता है. जो डर कर भाग जाता है, शायद साधू बनता है. जो निडरता से सामना करता है, वही सच्चा गृहस्थ इंसान होता है."
देवेन्द्र और देविका खाना खाते हुए बातें कर रहे थे, तभी शुभ की नींद खुली और भोलेपन से पूछा, " दादा, बड़ी दादी क्यों लड़ाई कर रही थी."
"अब नहीं कर रही है, वो भी खाना खा रही है, आप भी खाओ."
"कौन सी सब्जी बनाई है. " शुभ ने देविका की गोद में बैठते हुए पूछा.
"आपकी मनपसंद गाजर मटर." शुभ देविका के हाथों खाना खा रहा था और देविका मन ही मन में सोच रही थी, मासूम बच्चों को भी बहलाया नहीं जा सकता. नींद से जागने के बाद भी सबसे पहले बड़ी दादी की लड़ाई के बारे में पूछा और बड़ी दादी है, कि बुज़ुर्ग हठ के कारण एक बार भी कोप भवन से बाहर आ कर नहीं पूछा, कि नन्हे बालक शुभ ने कुछ खाया भी है या नही. आखिर बुज़ुर्गों की बेकार हठ कब समाप्त होगी.
© 2009 Manmohan Bhatiya; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: मनमोहन भाटिया
उम्र: 68 वर्ष
जन्म स्थान: दिल्ली
शिक्षा: बी. कॉम., ऑनर्स, हिन्दू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय; एल. एल. बी., कैम्पस लॉ सेन्टर, दिल्ली विश्वविद्यालय
संप्रति: बी. सी. एल. सिक्योर प्रेमिसेस प्राईवेट लिमिटेड में सीनियर मैनेजर (खाता)
प्रकाशित रचनायें: समाचारपत्रो (हिन्दुस्तान टाईम्स, नवभारत टाईम्स, मेल टुडे और इकॉनमिक्स टाईम्स) में नियमित रूप से सामयिक विषयों पर करीब दस वर्षों से पत्र छपते रहे हैं
कहानियाँ: सरिता और नवभारत टाईम्स में प्रकाशित
सम्मान एवं पुरस्कार: दिल्ली प्रेस की कहानी 2006 प्रतियोगिता में 'लाईसेंस' कहानी को द्वितीय पुरस्कार; अभिव्यक्ति कथा महोत्सव - 2008 में 'शिक्षा' कहानी पुरस्कृत
अभिरूचियाँ: कहानियाँ लिखना शौक है. कहानी लिखना 2006 से शुरु किया
संपर्क: बी - 1/4, पिंक सोसाइटी, सेक्टर - 13, रोहिणी, दिल्ली - 110085.
वेब साईट: http://manmohanbhatia.blogspot.com/