इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
कविता लिखना कुछ वैसा ही है जैसे प्रेम करना. दोनों के लिए समर्पण की जरूरत होती है. इसके बिना दोनों की बुनियाद मजबूत नहीं हो सकती है. मेरे लिये 'कविता' और 'प्रेम' एक दूसरे के पूरक हैं. मैंने अभी तक जितनी भी कविताएँ लिखी हैं उसका स्रोत मेर.'प्रेम' रहा है.'प्रेम' व्यक्ति का बुनियादी मौलिक अधिकार है. जब से मैंने जीवन के इस रहस्य को समझा है तभी से मेरे भीतर वास्तविक रूप से सृजनात्मक तनाव का जन्म हुआ है. बिना तनाव के मैं कुछ भी नहीं लिख पाता हूँ, और तनाव के लिए प्रेम करना मेरा सृजनात्मक आधार है.
'प्रेम' व्यक्ति के आत्म-विचार का साधन होता है जिसे मैंने महसूस किया है. यह महसूसना ही मेरी कविताओं का जीवन है. इस एक शब्द ने मेरी दुनिया बदलने का कार्य किया है. लेकिन मैं इतना खुशनसीब भी नहीं हूँ कि कभी प्रेम की गुनगुनाती धूप को अपनी कविताओं में उतार पाऊँ. इस रास्ते पर चलने के दौरान केवल बजबजाते हुए छाले ही मिले हैं जिसके कारण मेरी कविताओं में एक खदबदाता हुआ हिंदुस्तान दिखाई देता है. लेकिन बावजूद इसके भी मैंने कभी हार नहीं मानी है.
पिछले पाँच वर्षों में जिंदगी इतने चौराहों से गुजरी है, जहाँ से मेरी भटकने की पूरी गुंजाइश थी. लेकिन न जाने क्यों मैंने हरेक उस चौराहे की तुलना अपने एक राहे से की; और मैं भटकने से बच गया? मेरे जीवन का सबसे हसीन ख्वाब भले ही अभी तक पूरा नहीं हुआ हो लेकिन यह भी सच है कि मेरी सृजनात्मकता को बचाने का पूरा श्रेय भी उसी को है. कभी-कभी सोचता हूँ कविता लिखना बंद कर दूँ लेकिन हर बार केवल सोच के ही रह जाता हूँ. जैसे जीवन के लिए पृथ्वी, अग्नि, जल, आकाश और हवा जरूरी है कुछ वैसे ही जरूरत मेरे जीवन के लिए कविता हैं, जो मेरे वजूद के लिए जरूरी है. कविता, प्रेम और जीवन ही तो व्यक्ति के विकास के लिए जरूरी है. कविता के लिए प्रेम करना जरूरी है और प्रेम के लिए जीवन का होना.
जिस जीवन में कठिनाइयाँ नहीं होतीं, उसको जीने का मजा भी नहीं आता. आदमी संघर्ष की आग में जलकर ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है. लक्ष्य पाने के लिए जितना संघर्ष होगा उसकी सफलता का रस उतना ही आनंददायक होता है. आनंद ही व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य होता है. भारतीय दर्शन की परिणति भी तो इसी में है. बिना संघर्ष के व्यक्ति की बुनियाद भी मजबूत नहीं होती, जितना संघर्ष कठिन होगा, आनंद की प्राप्ति भी उतनी ही धनीभूत रूप से होगी. यही तो जीवन का सत्य है. जिसे पश्चिम अभी तक नहीं समझ पाया है. लिविंग रिलेशनशिप में आदमी और औरत साथ रह तो सकते हैं लेकिन यौन संतुष्टि के अतिरिक्त किसी और चीज को हासिल कर पाना उनके लिए निहायत ही मुश्किल है. इसलिए पश्चिम में साथ-साथ रहने के बाद भी लोग साथी बदलने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाते. जिस प्रेम का आधार केवल देह और भौतिक सुख होता है. उसे दरकने में थोड़ा समय भी नहीं लगता है. इसलिए पश्चिम की यह अवधारणा व्यक्ति की संवेदनात्मक अस्मिता के लिए निहायत ही घातक है. हमें आजादी भी ऐसी नहीं चाहिए जो हमारी संवेदना और अस्मिता के लिए घातक सिद्ध हो. इसलिए प्रेम को फिर से समझने की जरूरत है. मुझे अपनी ही गज़ल की कुछ पंक्तियाँ प्राय: ही याद आ जाती हैं - "तलाशो खुद के भीतर वो यूँ ही मर सकता नहीं है मौत भला उसको क्या आएगी वो यूँ ही मर सकता नहीं?"
मित्रों मेरी कुछ कविताओं में कभी-कभी मेरा उग्र स्वभाव हावी हो जाता है, लेकिन यह उग्रता बिना कारण नहीं है. अपने जन्म के बाद जब से मैंने होश संभाला है तब से लेकर इक्कीसवीं शताब्दी के चल रहे इस प्रथम दशक में आदमी की अस्मिता का गिरवी रखकर सत्ता और शासन में चीजों का बेजा इस्तेमाल ज्यादा हुआ है. करोड़ों रुपये किसानों का सरकार ने माफ किया है लेकिन बैंकों के दरवाजों पर किसानों की गर्दनें नींबू-मिर्च की माफिक फिर लटकी हुई हैं. इंडिया शायनिंग के नाम पर बली दक्कनी की मजार को पाट देना और कौसर बानों के गर्भ में धँसे त्रिशूल को विकास का नाम देना आखिर क्या है? देश की राजधानी से सौ मील की दूरी पर मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर की कब्रगाहों में प्रेमियों की नेमप्लेट दूर से ही पढ़ी जा सकती हैं और हम गौरवान्वित हैं कि अब हम मात्र 35 प्रतिशत ही अशिक्षित रह गए हैं. लड़कियों को सरेआम घसीटकर पीटा जाता है और हम अपनी संस्कृति की दुहाई देते हैं. इतने हंगामों के बाद भी मामला केवल चलता रहता है. आखिर कब तक राम के नाम पर बजरंगबली के गदे की चोट हमें सहन करनी होगी. ये तमाम चीजें मुझे सोचने पर मजबूर करती हैं. इसलिए मेरी कविताएँ उन लोगों का मौलिक बयान है जिनकी चीखें दिनोंदिन तीव्र होती जा रही हैं.
जिस तरह बाढ़ के उतरते पानी के बाद
नदियों के किनारे अधगले शव
सड़ांध मारते हैं
कुछ इस तरह कि.'बू' कल रात जगा गई
मुझे महसूस हुआ मेरे नथुनों में बासी हवा भर गई है
उतनी ही बदबूदार जितनी
बिना अंत्येष्ठि के बास मारती कोई सापतहिक्ॐॐॐ लाश
मैं बेचैन होने लगा
और मेरी जिज्ञासु बुद्धि महक के कारणों की
टोह लेने के लिए तड़पने लगी
तभी ताक पर रखे संविधान के विधान की
ओर मेरी नजर टिक गई
जिसे पिछले साठ वर्षों से सौ बार से ज्यादा
सर्जरी की जरूरत पड़ चुकी है
क्योंकि इसकी धाराएँ यमुना के पानी की तरह
बदबूदार तो हैं ही
और इसके शब्द परिभाषाओं के अभाव में
दम तोड़ रहे थे? शायद 'बू' का एक कारण ये भी था
लेकिन दूषित हवा बढ़ती गई
प्रश्न गहराता गया, नींद टिमटिमाती गई
इसलिए मैंने उत्तर पाने की एक और कोशिश की
क्योंकि मेरी खोपड़ी के भीतर पड़ा हुआ दिमाग
खाली रेगिस्तान तालाब भर नहीं था
जरूर कुछ था कुछ ऐसा
जिसके लिए मैं अरूणाँचल से
कच्छ के रण तक खूब भटका
मुझे हर तरफ चीख पुकार मचती सुनाई दी
कहीं सांप्रदायिकता की आग में
पुरुष का निचला हिस्सा झुलसा मिला
तो कहीं उंमादित सांड उसी माँद पर
झपट्टा मारने को तैयार दिखे
जिस पर मक्खियाँ भिन-भिना रहीं थीं
लेकिन इस बार भी मैं संतुष्ट नहीं था
इसलिए मैंने एक और नजर दौड़ाई
अस्पताल के अहातों में बच्चों की जातों में
मुझे भ्रुजों का एक एकदम ताजा गोदाम मिला
कुछ अजन्मी बच्चियों के जिस्म
जिसे किसी माँ ने खराब अंग की तरह
काटकर फएंक दिया था
फिर भी न जाने क्यों मुझे
किसी डॉक्टर के मरे जमीर पर पड़े
एप्रन की गंध नहीं आई
मेरा जी मितलाने लगा और मुझे
वॉमेटिंग की आशंका हुई
क्योंकि मेरा दिल यह मानने को नहीं था तैयार
कि इन छोटी-छोटी बातों से
खुली है मेरी नींद
मैंने एक और कोशिश की
तो मुझे नवीं मुम्बई में कुछ नये लोग मिले
सिंगूर नंदीग्राम और दादरी में
हिंदुस्तान के सबसे बड़े रोग मिले
मतलब भूख-गरीबी और बेबसी
फिर भी मेरा ज्ञान अधूरा था और
भोर का तारा आसमान में पूरा था
आँखें किसी शून्य में टिकी खोज रहीं थी
कुछ और ही.
तभी ललाती भोर में एक झंडा मिला
जिसका डंडा आदमी की पसलियों पर टिका हुआ था.
और आदमी की बाँहें आसमान को समेटने की हसरत में उठी
धीरे-धीरे ग्रि रही थी जमीन पर
अब मुझे धीरे-धीरे उस 'बू' का रहस्य समझ में आ रहा था
कि आसमान में उछलने वाली हर मुट्ठी में न ही होता बारूद
जिससे दुनिया बदल जाए मिट जाए अंधेरा अरे!
हाथ की लकीरों में सड़ता हुआ भविष्य होता है
जहाँ कुछ नहीं होता सिवाय बू के.
मेरा जन्म
झूठ, फरेब, द्वेष, ईर्ष्या के
उस जंगल में हुआ
जहाँ भेड़ियों की हुकूमत चलती थी
जहाँ दो सियार श्मशान की
अधजली लाश पर झपट पड़ते थे
और नोच-नोच कर ले जाते थे
गरम-गरम गोश्त अपनी दुर्भिक्षा को
शांत करने के लिए
और कभी जब इनका पेट नहीं भरता
तो मुंह मारा फिरते थे
जंघाओं के कपाट में बंद चूल्हे में
कभी कब्रिस्तान में रोते हुए मिलते
पढ़ते हुए फातिहा अपनी ही कब्र पर
दो लठैतों के संग करते हुए बँटवारा
उन्हीं ताबूतों का
जिनमें वे वर्षों पहले दफनाए गए थे
और सुबह अधसड़ी लाश
मरी घर के पिछवाड़े
पड़ी हुई महकती
जिसे देख पूरा मुहल्ला फुसफुसाकर
सो जाता था जानवरों के संग
वैसी ही नींद में, जैसे कोई मुर्दा
किसी अस्पताल के स्ट्रेचर पर.
मैं रोज पढ़ता था
अखबार की सबसे उत्तेजक खबर
लेकिन मेरा पौरुष भी
अंतिम पन्ने की लहराती उसी संगीन
दुनिया में सिमट जाता था
जहाँ सदी का महानायक
हाजमोला बेचा करता था,
मुझे रोज सुनाई देता था
जंगल का लाउड स्पीकर
जिससे आवाज आती थी
हर-हर महादेव, अल्लह-हो-अकबर की
फिर शाम होते ही दफना दिए जाते कुछ हिंदू
जला दिए जाते थे कुछ मुस्लिम
और फिर सड़क वीरान हो जाती थी
उन चित्तकबरों की आहट पाते ही
जो अपनी जंग लगी बंदूक लिए
उधर ही जाते थे जहाँ साफ-साफ
मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा होता था
ॐॐॐॐॐॐॐॐ. तौल दवजंससवूमक ईमतमण
हर शाम को शोक सभाएँ होती
और रेडियो पर अपील करता
एक औधड़ शांति का
जैसे श्मशान में चिता पर बैठ
कर रहा हो कोई साधना सिद्धि की
उनकी साधना सफल भी होती थी
क्योंकि छोटे-मोटे जीव-जंतु
बड़े-बड़े जानवरों को सौंप देते थे
पंचवर्षीय योजनाओं के साथ-साथ अपने सपने.
मेरा जन्म
इतिहास के उसी कपाट में हुआ
जहाँ जिंदा मुर्दे थे और मुर्दे जिंदा
जहाँ अयोध्या से गोधरा तक
आदमी की लाश पर भगवा लहराता था
भागलपुर, पंजाब, कश्मीर के बीच
मैं रोज मरता था जीता था
जहाँ जहानाबाद और गोहाना में
'गो' की तरह रोते जाते थे कुछ सिरफिरे
जिन्हें हुकूमत से बगावत
करने की छूट नहीं थी.
जहाँ जंगल के बीचोंबीच बना चिड़ियाघर
घायल आजादी के किले पर
लहराता झुका तिरंगा
रोज ही शोक दिवस मनाता था
मुम्बई की लोकल ट्रेनें
क्षत-विक्षत शव लिए
उसी रफ्तार में चलती थी
जैसे स्टॉक एक्सचेंज के सेंसेक्स में
वर्षों पहले जमा कर दी गई थी कुछ खोपड़ियाँ
जिनसे जंगल के जानवर
फुटबाल का खेल खेला करते थे
और हुकूमत आई. एस. आई मार्का लगा
अपनी ही जीत में चौधियाई फिरती थी.
मेरा जन्म
विश्वविद्यालय के ऐसे खंडहरों में हुआ
जहाँ अपनी जमीन के लिए लड़ने वाला
नक्सली कहलाता था
(क्या जल-जंगल जमीन का हक माँगने वाला नक्सली होता है?)
और बावजूद इसके नक्सली लड़ाई के
आंध्रा से पंजाब तक किसानों की गर्दनें
बैंकों के दरवाजों पर
नींबू मिर्च की माफिक लटकी रहती
फिर शनी शांत नहीं होता था.
जहाँ छात्रों पर लाठियाँ बरसाई जातीं
और शिक्षक हार्ट-अटैक से मार दिये जाते
जहाँ स्त्री मुक्ति की हवा बंद कमरों में गूँजती
और सुबह ब्रेक-फास्ट की टेबल पर कहती खबर
सामुहिक बलात्कार की शिकार युवती पुलिस स्टेशन में
जाँच जारी!
जहाँ अंधा कानून तारीख-पर-तारीख देते-देते
खुद ही तारीख हो चुका था
और पुलिस स्टेशन के भीतर टंगी
मुसकुराती तस्वीर गांधी की
जैसे अब भी कहती थी
शांति ओम शांति.
© 2009 Manoj Kumar; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: मनोज कुमार
शिक्षा: एम. फिल. (हिन्दी), शोधरत, दिल्ली विश्वविद्यालय
संपर्क: 38- सी, सेक्टर-4, डी आई ज़ेड एरिया, गोल मार्केट, दिल्ली - 110001