इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
कहने को मैं विश्व की शक्ति, पर आज डरी सहमी हूँ
मुझ में मिले भीष्म, मंगल और भगत, मैं तुम्हारे देश की मिट्टी हूँ
लहू पीने की आदत मुझको, मुझे शौक समर का खूब
पर यह कैसा समर हुआ, जिससे विचलित हो मैं आज उठी
कैसे यह लहू आज चखा कि, रक्तदन्ता भी खिन्न उठी
पल में आग लगा दी मुझमे, कैसी चिंगारी आज उठी
कहती हूँ बेटा तो मुझको, नहीं सुनता आज कोई
ना राम है ना कान्हा टैगोर, तिलक ना आज कोई
देखती हूँ दरख्तों से तो, ठँठ का जंसर दिखता है
कहने वाला बुद्धिजीव वह, इसे गणतन्त्र कहता है
कहने को तो वह नेता है, गरीब, दुखी और शोषित का
पर आँगन से उसके इक, लहू का नाला बहता है
कल कल बहते इस नाले में, इक सा रंग दिखता है
आने वाला उसके दर पे, हिन्दु मुस्लिम कहता है
बड़े प्यार से विचल भाव से वह, उन बच्चों के कन्धे सहलाता है
जिनके पिता का रक्त भी, उसके नाले से बहता है
कुछ दूर जाकर वह नाला, मुझमें ही मिल जाता है
कुछ साँसो को थामे अपनी, मुझसे यह कह जाता है
"बड़ी प्यास है लहू की तुझको, विगत कई दसकों से
ले बुझा ले अपनी प्यास आज, अपने निर्दोष बच्चे से
पर ना समझना आज तेरे लिये, कोई चढ़ावा लाया है
उस शासनकर्ता ने ऐसा भी, एक तुला बनवाया है
नोट और वोट को तोलता है जिस तरह
तौल देगा कण-कण तेरा भी इक दिन उसी तरह.
© 2009 Mithilesh Kumar Yadav; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: मिथिलेश कुमार यादव
उम्र: 40 वर्ष
जन्म स्थान: गोरखपुर
शिक्षा: बी. फार्म.
संप्रति: नौकरी
सांस्कृतिक एवं कलात्मक गतिविधियाँ: विभिन्न नाटकों में कार्य