इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
बिना बताये चला आता है
बीच का यह अंतराल,
अँगुलियों से चुक गए शब्द
आंखों से गुम चाँद की कसक,
सपनों की नींद से
वही पुरानी खटर-पटर
आज और अभी का चाबुक
दशकों को चुटकी में मसल,
आखों के गड्ढों पर
उम्र की परत चढ़ा,
नए-पुराने सभी ज़ख्म भर देता है
धड़कनो से निकल
जिन्दा पलों की महक,
थके पाँव में पंख लगा देती है
एक आस
अधखुली आखों से,
अलार्म को अनसुना कर
सपनों को दबोच,
करवट बदल पलकें मूँद लेती है
कविता उसे लिखेगी
सूर्यास्त बुलाएगा,
कभी न कभी तो खोया आसमाँ
पतंग की डोर सा मिल जायेगा.
आइना पूछता आखों से
वो दिखाई नही देता
आँखें मुँह छुपाती चाँद से
कहीं वह रास्ता न रोक ले
जंगल कहता नदी से
न चलो सड़क पर
छाले पड़ जायेंगे
पाँव में..
उंगलियों खोजती गुमी हथेली.
ज़मीन पर गिरी पत्ती में,
विंड स्क्रीन पर जमी बर्फ में,
खिड़की पर छाये अँधेरे में,
स्टडी में घटे ऐतिहासिक पल में,
खुली आँखों की नींद में,
रेडियो में बजते प्रेम गीत में,
धड़कनों से गुम जिन्दा पलों में,
गिरने से पहले
रोज़ कहते
आँसू
उसके कंधे पर गिरते तो
बहा ले आते उसे
तुम्हारे कदमों में.
वज़ह नहीं
हालात नहीं
जज़्बा नहीं
आस नहीं
फिर भी
ख़ुद को नहीं
खामोशी तोड़ो
कलम की आवाज़ से
धो डालो
दुनिया के अवसाद
स्याही की धार से
तूफ़ान को निगला
कई बार
हवा का रुख बदल दो
इस बार
न बदली दुनिया
न रोशन हुए रास्ते
नज़रिया बदलो तो
क्या दिन क्या रात.
कितनी सर्द हवा थी
दोनों के बीच
छुआ जा सकता था
हर साँस को
आइस क्यूब की तरह
टटोलती रही खामोशी
दिल में छुपे राज़
कैसे मुमकिन हुआ
धड़कनों का मुँह सीना
आमने-सामने होकर
आँखे चुरा लेना
जंगल से गुज़र
पत्ती को न छूना
उसके सवाल को
जवाब समझ लेना
पाँव तले जमीं
ज़रा डगमगाई
क्या तुम्हीं ने
अनंत दूरी को
पल में मिटाया था
रोज़ नया सूरजमुखी
रातों को उगाया था
धरती और आकाश को
मेरी मुट्ठी में दबाया था
आँखें गड़ी रही शून्य में
न उसने आवाज़ दी
न उसने हथेली बढ़ाई.
© 2009 Neera Tyagi; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: नीरा त्यागी
जन्म स्थान: दिल्ली
शिक्षा: बी. एस. सी. (मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय)
संप्रति: दो दशक से भी अधिक लीड्स सिटी काउंसिल में प्रोजेक्ट मैनेजर
यात्राएँ: यू. के.
संपर्क: यू. के. में निवास
वेब साईट: http://www.neerat.blogspot.com