अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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काव्य पल्लव

पंकज सिंह

अब भी सुनते हैं

खुशफ़हमी है कि बची है थोड़ी शर्म
आड़े वक़्तों कहीं से निकलकर आएगी
जिसे सत्ताओं कर्णधारों ने लगातार अनुपयोगी पाया है
ढूँढ़ेंगी वही कोई न्याय
जो हमारी रक्षा करेगा
कोई क्रोध जो जलाएगा जीर्ण शीर्ण

देखूँ तो यह इच्छा है या विश्वास या धीमी सुलगती कोई आस
जो भटकती हुई जा घुसती है ताक़तवरों के नाचघर में बेख़बर
जलते बुझते रंगों धीमी तेज़ रोशनियों उठते गिरते संगीत में
ख़ुद को अज़नबी पाती है टटोलती है अपने पाँव और भागती है
अपनी असंभावना के दुर्भाग्य की ओर

कोमल चीज़ें सुंदर उदास बिलबिलाती हैं
पंखुड़ियों की भाषा में विस्मृति के उजाड़ में बुझी बीड़ी लिए
दिखता है कोई मुक्तिबोध सरीखा

पेटेंट गूदे हैं रसायन मिले रस हैं दूकानों में कला कविता इंसानी बराबरी
और तरह तरह की संभावनाओं के
नायाब नुस्ख़ों की तरह
काम में लाते हैं जिन्हें सरकारी सोहदे प्रभारी अधिकारी भ्रष्ट कर्मचारी
दुदुंभि बजाते अत्याचारी

तिकड़म और क़ामयाबियों के बाग़ में
कोई वाद्य खोलता है अपने सबसे करुण स्वरों में सोया हुआ दर्द
सब कुछ को अचानक थरथराती मानवीयता के आँसुओं से नहलाता
किसी निराश अध्यापक के स्वप्न की तरह

ज़िंदगी की दहलीज़ पर बाहों में सिर गाड़े हुओं की तरह
क्लांत नदियों की तरह जो अपनी लहरें कहीं भूल आई हों

हक़ की ख़ातिर लड़ते हुओं को विकराल जाल में जकड़ती है
पूँजी की चुनौतियाँ
नेकियों की क़ब्रों पर सूख गए सफेद फूलों के गुच्छे
चमकदार दृश्यों के आस - पास बहती दिखती है ख़ून की धार
अब भी सुनते हैं मनुष्य से प्यार मनुष्य के अधिकार की बातें बार - बार हज़ार.

संभव है

शुरू से ही आ जाता है उन्हें लोकतंत्र का स्वाँग
बीवी किटी पार्टी मियाँ जीमखाना बच्चे अमरीका
जाते बेफ़िक्री हासिल करते हैं
कोई रेंकता है परलोक सभा में कोई सोने जाता है राज्यसभा
भा भा भा हा हा हा भा भा भाता है जिसे जो
और कोई मनई पूछता है इनका हमसे क्या नाता है

एक रहता है हाइ गलाता प्रजा का प्रजा
और दूसरा सदियों से विधाता है
पिता है माता है दाता है प्रदाता है

एक विन्यास जो अपनी रहस्यमयता में निर्मम है
उसके परदे न उघाड़ो न छेड़ो तोड़ो मरोड़ो नहीं
ज्यों का त्यों कुबूल करो

या जा मरो पीड़ा के अनंत नरकों में

'नहीं' 'नहीं' तुम प्रकट होते हो ख़ुद के सामने
हिंसा और विकल्प लिए विचित्र परस्परता में
लालसाओं के टिमटिमाते तारों के बीच

और ज़िद में जान लड़ाकर पहुँचते हो
प्रभुओं के हरे - भरे सुनहरे संसार की तरफ़
कि परदे खिंच जाते हैं
लगभग ज्यों का त्यों रह जाता है सब कुछ माया के क्रोड़ में

डसते हैं तुम्हें हज़ार हज़ार गेहुँआ

तुम्हारी हार के अंधकार से फिर भी
बाँह पकड़ उठाता है तुम्हें माथा सहलाता कोई स्वप्न
तुम्हारे तमतमाए चेहरे से हताशा की कालिख पोंछता

तुम चल पड़ते हो और बार बार देखते हो
विराट है तृष्णा की लहरें अपार
तोड़ती हैं वे स्वप्नबद्ध आत्मा की लय संकल्प की भुजाएँ
दर्द के लंबे इम्तहानों में शाप की काँटे बिछी घाटियों में
चाटती तुम्हारे विरसे का रुधिर और अग्नि

पर कहता है तुम्हारा स्वप्न अडिग तुम्हारी ही शक्ल में सम्मुख आकर
ग़ौर से देखो जीवित मनुष्य की तरह
तिलिस्मी रंगों के पार
कीड़े ही कीड़े रेंगते जा रहे ऊर्ध्वमुख
महाजनों की प्रशस्त राह पर
वे जा रहे रेंगते उनकी काया और माया की सड़ाँध तक

संभव है संभव है मुक्ति अगर चीन्हो तुम अपनों को.

शायद वह कवि तेरा

वह स्मृतियों के पीछे पीछे जाता हुआ क्षमायाची
कभी सशंकित
नींद और जाग के बीच मटमैले जल संसार में
सुबह दोपहर शाम रात छटपटाता
भटकता रितुचक्र में
अपराजेय विचारों के तीक्ष्ण शरों में बिंधा सा

कभी उन्मत्त
अग्निपिण्ड, छवि को ढूँढता हुआ
वह नीले पीत रक्तपुष्प छली
छवियों से
छूट छूट जाता हुआ
संगी वह अनंत युद्ध यात्राओं का
फैलता है दिगंतों के पार जिसका ताप प्राणों में अनिर्वचनीय सुवास सरीखा बसता

बस ज़रा सी स्मिति में
सदियों के कैसे कैसे भेद खोलता
डोलता कभी महाकाय आपदाओं के सम्मुख
बनता भूधराकार प्रतिघाती
अभिनव प्रतिनव

कभी कभी होता है वह सारे कार्य व्यापार में आहत
पाप के इस साम्राज्य में प्रकंपित भी
जब देखता है दुर्घटनाओं के
असंख्य बिम्ब अपनी ही झील में प्रतिच्छायित
अनेक अनेक दु:स्वप्न से बिंधा हुआ

संताप के धागों से ही बुनता है वह एक चादर
बेहद झीनी
और ढकता है अपनी
मनुष्योचित पीड़ाएँ
तुम्हारी मुक्ति और अभिमान के लिए.

उन्हीं को क्यों

नहीं है उपलब्ध पूर्वसूचना या अनुमान का
कोई विज्ञान कि
कहाँ पहुँचकर किसके लिए प्रकट होता है
कितने घुमाओं और मोड़ों के बाद
कौन सा खेल
अचानक निकट और विकट होता हुआ

फिर भी बहुतों के लिए प्रच्छन्न
रहा चला जाता है
अंधकार की निस्पंद काया में बंद
ज्यों किसी छाया द्वीप की गोपन नाटकीयता में

सामूहिक स्मृति से उलझती गुँथी सत्ताएँ हैं
जिनके कारोबार में
सब कुछ के होने की ज़रूरी शर्त सी
बनी रहती है बर्बरता
छल और छद्मों के आयुध लिए सँवरी सी
पसरी सी आक्षितिज

उसके घावों को स्वीकार करते हैं नागरिक
बाँहों पर, आँतों में, सीने में
दृश्यों में, आत्मा में, लड़ - मरकर जीने में

दुहराते जाते हैं चमत्कार की तरह उसी के सबक
बिखरे - बिखरे वाक्यों में दिन प्रतिदिन
रात - बिरात
क्लीवता में
क्षमा का स्वाँग करते हैं ज़्यादातर लोग
क्षमा बर्बरता के भृत्यों को, दास - अनुदासों को
पुलकित पीठ को अपनों के वध का
ठीहा बनाने के लिए
सच को विवादग्रस्त कर तिल - तिल मिटाने के लिए

सूख चुका मानो
निष्कासित जल करुणा की सदानीरा का
नींदों में उमड़ता आता है जो जल प्लावन की ध्वनियाँ लिए
आँसू हैं सदियों का शायद निरपेक्ष हो चला

या प्रयत्न कर आक्रामक होता
वेग - आवेगहीन रक्त जो शिथिल रहा दीर्घकाल
क्रियाहीन द्रव सा

ऐसा भी होता है कभी कभी
झुटपुटे में दिन और रात की संधिरेखा पर
अमर्ष में तप उठती है शोककारी आवाज़ें
तार - तार करती हुई सहमत नागरिकता के आवरण
पूछ - पूछ उठती है
जो तुम्हें देते हैं अन्न और कपास
उन्हीं को देते हो भूख और विनाश, क्यों

उन्हीं को अंधकार, उन्हीं को, क्यों.

वे जानते हैं

वे महान भारतीय पहचान के आभायुक्त घेरे से
बाहर हैं, साल के हर महीने हर सप्ताह हर दिन हर पल
उन पर गुजरती है तूफ़ानी मुश्किलें मानों लगातार
उन्हें मिटा डालने के दैवी आदेशों की प्रेरणा हो
ज़हरीला झाग उगलती

जो चाहते हो तुम
उनके पास नहीं है, मसलन सहमति मसलन सारे अपराधों के लिए अंतत: क्षमा
मसलन भोले भ्रम औ विश्वास

मसलन तुम्हारे अलौकिक लोकतंत्र के जबड़ों में
गायब होने के लिए समर्पित युवा शरीर और मष्तिस्क

तुम दिखाते हो छवियाँ और परिदृश्य
ढोल, नगाड़ों और घोषणापत्रों के साथ
उस सब में उन्हें कुछ और दिखता है

मसलन प्रधानमंत्री गरीबी के बारे में कोई योजना परोसता है भाषा में
तो साफ दिखते हैं उन्हें
विश्व बैंक और अंतर्राष्टीय मुद्रा कोष के स्वामी संकेत
और रंग ब रंगी डोरियाँ
जिनके छोर पृथ्वी के सुदूरवर्ती केंद्रों तक जाते हैं

और दुनिया को दिखाते हो तुम सफेद पँछियों की उड़ान
पंक्तिबद्ध लोगों के प्रार्थना में जुड़े हाथ, लाठीवाला गाँधी
सुनाते हो अहर्निश कलरव कभी तेज कभी मंद होती रामधुन
कैसी कैसी नाट्य - छटाएँ

कपास और गेहूँ उपजाने वाले किसान आत्महत्या करते हैं

स्त्रियाँ और बच्चे पिसते हैं भूधराकार चक्की में

किनके हाथ उस निर्मम चक्की को चलाते हैं वे जानते हैं

किनके हित में गलती जाती है उनके भाईयों की हड्डियाँ
दरार भरे खेतों में छल से झुलसते नगरों में
किनकी ख़ातिर अकाल मृत्यु की नियति पाते हैं
कोटि कोटि अभागे
वे जानते हैं

तुम बढ़ाते हो कभी कभी कुछ विचित्र फूल उनकी तरफ
उनकी तड़प में शामिल होने का स्वाँग करते हो
कितनी कितनी रंगशालाएँ हैं तुम्हारे प्रशिक्षण के लिए
काल की वेदी पर तुम नृत्य करते हो सहस्र गणिकाओं संग
तुम्हारी आँखें चमकती हैं हिंस्र पशुओं सरीखी अँधेरे उजाले के अँधेरे में

गाँव नगर और अरण्यों में तय करते हैं वे जो किया जाना है
वे जानते हैं
कल को बेहतर जानेंगे
क्या क्या किया जाना है.

© 2009 Pankaj Singh; Licensee Argalaa Magazine.

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