इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
खुशफ़हमी है कि बची है थोड़ी शर्म
आड़े वक़्तों कहीं से निकलकर आएगी
जिसे सत्ताओं कर्णधारों ने लगातार अनुपयोगी पाया है
ढूँढ़ेंगी वही कोई न्याय
जो हमारी रक्षा करेगा
कोई क्रोध जो जलाएगा जीर्ण शीर्ण
देखूँ तो यह इच्छा है या विश्वास या धीमी सुलगती कोई आस
जो भटकती हुई जा घुसती है ताक़तवरों के नाचघर में बेख़बर
जलते बुझते रंगों धीमी तेज़ रोशनियों उठते गिरते संगीत में
ख़ुद को अज़नबी पाती है टटोलती है अपने पाँव और भागती है
अपनी असंभावना के दुर्भाग्य की ओर
कोमल चीज़ें सुंदर उदास बिलबिलाती हैं
पंखुड़ियों की भाषा में विस्मृति के उजाड़ में बुझी बीड़ी लिए
दिखता है कोई मुक्तिबोध सरीखा
पेटेंट गूदे हैं रसायन मिले रस हैं दूकानों में कला कविता इंसानी बराबरी
और तरह तरह की संभावनाओं के
नायाब नुस्ख़ों की तरह
काम में लाते हैं जिन्हें सरकारी सोहदे प्रभारी अधिकारी भ्रष्ट कर्मचारी
दुदुंभि बजाते अत्याचारी
तिकड़म और क़ामयाबियों के बाग़ में
कोई वाद्य खोलता है अपने सबसे करुण स्वरों में सोया हुआ दर्द
सब कुछ को अचानक थरथराती मानवीयता के आँसुओं से नहलाता
किसी निराश अध्यापक के स्वप्न की तरह
ज़िंदगी की दहलीज़ पर बाहों में सिर गाड़े हुओं की तरह
क्लांत नदियों की तरह जो अपनी लहरें कहीं भूल आई हों
हक़ की ख़ातिर लड़ते हुओं को विकराल जाल में जकड़ती है
पूँजी की चुनौतियाँ
नेकियों की क़ब्रों पर सूख गए सफेद फूलों के गुच्छे
चमकदार दृश्यों के आस - पास बहती दिखती है ख़ून की धार
अब भी सुनते हैं मनुष्य से प्यार मनुष्य के अधिकार की बातें बार - बार हज़ार.
शुरू से ही आ जाता है उन्हें लोकतंत्र का स्वाँग
बीवी किटी पार्टी मियाँ जीमखाना बच्चे अमरीका
जाते बेफ़िक्री हासिल करते हैं
कोई रेंकता है परलोक सभा में कोई सोने जाता है राज्यसभा
भा भा भा हा हा हा भा भा भाता है जिसे जो
और कोई मनई पूछता है इनका हमसे क्या नाता है
एक रहता है हाइ गलाता प्रजा का प्रजा
और दूसरा सदियों से विधाता है
पिता है माता है दाता है प्रदाता है
एक विन्यास जो अपनी रहस्यमयता में निर्मम है
उसके परदे न उघाड़ो न छेड़ो तोड़ो मरोड़ो नहीं
ज्यों का त्यों कुबूल करो
या जा मरो पीड़ा के अनंत नरकों में
'नहीं' 'नहीं' तुम प्रकट होते हो ख़ुद के सामने
हिंसा और विकल्प लिए विचित्र परस्परता में
लालसाओं के टिमटिमाते तारों के बीच
और ज़िद में जान लड़ाकर पहुँचते हो
प्रभुओं के हरे - भरे सुनहरे संसार की तरफ़
कि परदे खिंच जाते हैं
लगभग ज्यों का त्यों रह जाता है सब कुछ माया के क्रोड़ में
डसते हैं तुम्हें हज़ार हज़ार गेहुँआ
तुम्हारी हार के अंधकार से फिर भी
बाँह पकड़ उठाता है तुम्हें माथा सहलाता कोई स्वप्न
तुम्हारे तमतमाए चेहरे से हताशा की कालिख पोंछता
तुम चल पड़ते हो और बार बार देखते हो
विराट है तृष्णा की लहरें अपार
तोड़ती हैं वे स्वप्नबद्ध आत्मा की लय संकल्प की भुजाएँ
दर्द के लंबे इम्तहानों में शाप की काँटे बिछी घाटियों में
चाटती तुम्हारे विरसे का रुधिर और अग्नि
पर कहता है तुम्हारा स्वप्न अडिग तुम्हारी ही शक्ल में सम्मुख आकर
ग़ौर से देखो जीवित मनुष्य की तरह
तिलिस्मी रंगों के पार
कीड़े ही कीड़े रेंगते जा रहे ऊर्ध्वमुख
महाजनों की प्रशस्त राह पर
वे जा रहे रेंगते उनकी काया और माया की सड़ाँध तक
संभव है संभव है मुक्ति अगर चीन्हो तुम अपनों को.
वह स्मृतियों के पीछे पीछे जाता हुआ क्षमायाची
कभी सशंकित
नींद और जाग के बीच मटमैले जल संसार में
सुबह दोपहर शाम रात छटपटाता
भटकता रितुचक्र में
अपराजेय विचारों के तीक्ष्ण शरों में बिंधा सा
कभी उन्मत्त
अग्निपिण्ड, छवि को ढूँढता हुआ
वह नीले पीत रक्तपुष्प छली
छवियों से
छूट छूट जाता हुआ
संगी वह अनंत युद्ध यात्राओं का
फैलता है दिगंतों के पार जिसका ताप प्राणों में अनिर्वचनीय सुवास सरीखा बसता
बस ज़रा सी स्मिति में
सदियों के कैसे कैसे भेद खोलता
डोलता कभी महाकाय आपदाओं के सम्मुख
बनता भूधराकार प्रतिघाती
अभिनव प्रतिनव
कभी कभी होता है वह सारे कार्य व्यापार में आहत
पाप के इस साम्राज्य में प्रकंपित भी
जब देखता है दुर्घटनाओं के
असंख्य बिम्ब अपनी ही झील में प्रतिच्छायित
अनेक अनेक दु:स्वप्न से बिंधा हुआ
संताप के धागों से ही बुनता है वह एक चादर
बेहद झीनी
और ढकता है अपनी
मनुष्योचित पीड़ाएँ
तुम्हारी मुक्ति और अभिमान के लिए.
नहीं है उपलब्ध पूर्वसूचना या अनुमान का
कोई विज्ञान कि
कहाँ पहुँचकर किसके लिए प्रकट होता है
कितने घुमाओं और मोड़ों के बाद
कौन सा खेल
अचानक निकट और विकट होता हुआ
फिर भी बहुतों के लिए प्रच्छन्न
रहा चला जाता है
अंधकार की निस्पंद काया में बंद
ज्यों किसी छाया द्वीप की गोपन नाटकीयता में
सामूहिक स्मृति से उलझती गुँथी सत्ताएँ हैं
जिनके कारोबार में
सब कुछ के होने की ज़रूरी शर्त सी
बनी रहती है बर्बरता
छल और छद्मों के आयुध लिए सँवरी सी
पसरी सी आक्षितिज
उसके घावों को स्वीकार करते हैं नागरिक
बाँहों पर, आँतों में, सीने में
दृश्यों में, आत्मा में, लड़ - मरकर जीने में
दुहराते जाते हैं चमत्कार की तरह उसी के सबक
बिखरे - बिखरे वाक्यों में दिन प्रतिदिन
रात - बिरात
क्लीवता में
क्षमा का स्वाँग करते हैं ज़्यादातर लोग
क्षमा बर्बरता के भृत्यों को, दास - अनुदासों को
पुलकित पीठ को अपनों के वध का
ठीहा बनाने के लिए
सच को विवादग्रस्त कर तिल - तिल मिटाने के लिए
सूख चुका मानो
निष्कासित जल करुणा की सदानीरा का
नींदों में उमड़ता आता है जो जल प्लावन की ध्वनियाँ लिए
आँसू हैं सदियों का शायद निरपेक्ष हो चला
या प्रयत्न कर आक्रामक होता
वेग - आवेगहीन रक्त जो शिथिल रहा दीर्घकाल
क्रियाहीन द्रव सा
ऐसा भी होता है कभी कभी
झुटपुटे में दिन और रात की संधिरेखा पर
अमर्ष में तप उठती है शोककारी आवाज़ें
तार - तार करती हुई सहमत नागरिकता के आवरण
पूछ - पूछ उठती है
जो तुम्हें देते हैं अन्न और कपास
उन्हीं को देते हो भूख और विनाश, क्यों
उन्हीं को अंधकार, उन्हीं को, क्यों.
वे महान भारतीय पहचान के आभायुक्त घेरे से
बाहर हैं, साल के हर महीने हर सप्ताह हर दिन हर पल
उन पर गुजरती है तूफ़ानी मुश्किलें मानों लगातार
उन्हें मिटा डालने के दैवी आदेशों की प्रेरणा हो
ज़हरीला झाग उगलती
जो चाहते हो तुम
उनके पास नहीं है, मसलन सहमति मसलन सारे अपराधों के लिए अंतत: क्षमा
मसलन भोले भ्रम औ विश्वास
मसलन तुम्हारे अलौकिक लोकतंत्र के जबड़ों में
गायब होने के लिए समर्पित युवा शरीर और मष्तिस्क
तुम दिखाते हो छवियाँ और परिदृश्य
ढोल, नगाड़ों और घोषणापत्रों के साथ
उस सब में उन्हें कुछ और दिखता है
मसलन प्रधानमंत्री गरीबी के बारे में कोई योजना परोसता है भाषा में
तो साफ दिखते हैं उन्हें
विश्व बैंक और अंतर्राष्टीय मुद्रा कोष के स्वामी संकेत
और रंग ब रंगी डोरियाँ
जिनके छोर पृथ्वी के सुदूरवर्ती केंद्रों तक जाते हैं
और दुनिया को दिखाते हो तुम सफेद पँछियों की उड़ान
पंक्तिबद्ध लोगों के प्रार्थना में जुड़े हाथ, लाठीवाला गाँधी
सुनाते हो अहर्निश कलरव कभी तेज कभी मंद होती रामधुन
कैसी कैसी नाट्य - छटाएँ
कपास और गेहूँ उपजाने वाले किसान आत्महत्या करते हैं
स्त्रियाँ और बच्चे पिसते हैं भूधराकार चक्की में
किनके हाथ उस निर्मम चक्की को चलाते हैं वे जानते हैं
किनके हित में गलती जाती है उनके भाईयों की हड्डियाँ
दरार भरे खेतों में छल से झुलसते नगरों में
किनकी ख़ातिर अकाल मृत्यु की नियति पाते हैं
कोटि कोटि अभागे
वे जानते हैं
तुम बढ़ाते हो कभी कभी कुछ विचित्र फूल उनकी तरफ
उनकी तड़प में शामिल होने का स्वाँग करते हो
कितनी कितनी रंगशालाएँ हैं तुम्हारे प्रशिक्षण के लिए
काल की वेदी पर तुम नृत्य करते हो सहस्र गणिकाओं संग
तुम्हारी आँखें चमकती हैं हिंस्र पशुओं सरीखी अँधेरे उजाले के अँधेरे में
गाँव नगर और अरण्यों में तय करते हैं वे जो किया जाना है
वे जानते हैं
कल को बेहतर जानेंगे
क्या क्या किया जाना है.
© 2009 Pankaj Singh; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: पंकज सिंह
उम्र: 77 वर्ष
जन्म स्थान: पैतृक गाँव चैता (पूर्वी चम्पारण), मुजफ्फ़रपुर (बिहार)
शिक्षा: बी. ए. ऑनर्स और एम. ए. (बिहार विश्वविद्यालय)
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में वियतनाम के संघर्ष पर शोध.
अनुभव: - कई वर्षों तक जनसत्ता में नियमित कला - समीक्षा.
- नवभारत टाइम्स में एक वर्ष तक साप्ताहिक स्तंभ 'विमर्श' उल्लेखनीय.
- फ्रेंच एन्साइक्लोपीडीया 'लारूस' में हिंदी साहित्य पर टिप्पणी.
- अनेक पाण्डुलिपियों का संपादन.
- ऑस्फोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, एन. सी. ई. आर. टी. और साहित्य अकादमी आदि के लिए अनुवाद.
- डाक्यूमेन्टरी और कथा फ़िल्मों के लिए पटकथा लेखन.
- डाक्यूमेन्टरी फ़िल्मों का निर्माण और निर्देशन .
- रेडियो और टेलीविज़न के प्रसारक और प्रस्तोता के रूप में बहुख्यात.
- संपादक की हैसियत से दूरदर्शन समाचार, ब्रिटिश उच्चायोग और कई पत्र - पत्रिकाओं से संबद्ध रहे.
- पेरिस के पौवार्त्य भाषा और सभ्यता संस्थान तथा सीपा प्रेस इंटरनेशनल के भारतीय विभागों में काम किया.
- बी. बी. सी. लंदन की विश्व सेवा में साढ़े चार वर्ष तक प्रोड्यूसर.
- यात्राओं औ प्रवास के दौरान विश्वविद्यालयों और संस्थानिक आयोजनों में व्याख्यान और काव्यपाठ
- पेरिस के अंतर्राष्टीय कैता उत्सव में भारत का प्रतिनिधित्व.
सामजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियाँ:
- क्रांतिकारी वाम राजनीति और पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय.
- रचनात्मक लेखन के अतिरिक्त राजनीति और साहित्य - कला - संस्कृति पर निबंध और समीक्षा चर्चित.
- 'जनहस्तक्षेप' नामक संगठन के संस्थापक सदस्य और उसके कार्यक्रमों में निरंतर भागीदारी.
पुरस्कार: मैथिलीशरण गुप्त सम्मान (2003), शमशेर सम्मान (2007), नई धारा सम्मान (2008)
संप्रति: लेखन के अतिरिक्त फ़िल्म और मीडिया प्रामर्श के क्षेत्र में गतिशील.
प्रकाशित रचनायें: प्रथम रचना 1966 में प्रकाशित. आहटें आसपास (1981), जैसे पवन पानी (2001), नहीं (2009). अनेक देशी विदेशी संकलनों में कविताएँ. उर्दू, बांग्ला, अँग़्रेज़ी, जापानी, रूसी तथा फ्रेंच आदि में कविताओं के अनुवाद.
यात्राएँ: पेरिस (1978 - 80), लंदन (1987- 91), फ्रांस और ब्रिटेन के अलावा बेल्ज़ियम, ज़र्मनी, हॉलैण्ड, ईराक़, पाकिस्तान, नेपाल, आदि कई एशियाई - यूरोपीय देशों की यात्राएँ.
संपर्क: दिल्ली में रहते हुए समकालीन बौद्धिक - सामाजिक - सांस्कृतिक जीवन में हस्तक्षेप.
आत्मकथ्य: कविता के संदर्भ में पंकज सिंह अक्सर मुक्तिबोध की काव्य पंक्तियों .... "नही होती खत्म कविता नही होती /वह तो आवेग -- त्वरित कालयात्री है " ... को स्मरण करते हुए कहते हैं कि उनकी कविताओं का आवेग देने वाला तत्व है भारतीय समाज के शोषित - उत्पीड़ित समुदायों के संघर्ष की चेतना के साथ उनके व्यावहारिक जीवन और रचना संसार की प्रतिबद्द सम्बद्दता. पंकज सिंह के लिए कविता अभिजनों की रूचि से अनुकूलित कला - कौशल नहीं बल्कि अपने ऐतिहासिक समय की सामूहिक चेतना का कलात्मक विस्तार है वे यह मानते हैं कि काव्य रचना उनके व्यक्तित्व का सत्व है .
पंकज सिंह ने अपने पिछले काव्य -संगर्हों, आहटें आसपास और जैसे पवन पानी, की कविताओं में सार्थक जोखिम उठाते हुए भारतीय समाज में पिछली शताब्दी के सातवें दशक की ' वसंत गर्जना ' से उत्प्रेरित प्राण - शक्ति को भाषा के अनूठे रूपाकार दिये अन्याय की सत्ताओं के बरक्स सांस्क्रतिक संरचना में प्रतिरोध के साहस की अभिव्यक्ति और परिवर्तन के महास्वप्न की अर्थ - सक्रियता उन कविताओं की उदग्र पहचान बनी उन तत्वों से हिन्दी में अनुभव - सघन तथा अभिप्राय की गरिमा से भरी जिस मौलिक राजनीतिक कविता को पंकज सिंह के कवि ने सम्भव किया, उसके नये और अधिक क्षिप्र रूप उनके नए काव्य संग्रह नहीं ई कविताओं में हैं.
इन कविताओं में अनुभव - अनुकूलित शिल्प का सुघड़पन है कहने के ऐसे अनेके लहज़े हैं जो काव्य - औज़ारों, हिकमतों और समग्र प्रविधि के मामले में हिन्दी काव्य के नये विस्तार के सूचक हैं.
पंकज सिंह की जीवन्त अनुभव - राशि में अगर अन्तविरोधों और द्दुन्द्दों में शामिल विडम्बनाएँ और कई प्रकार के सामूहिक बोध के समुच्चय हैं, तो निजी आवेग- संवेग, प्रेम और आसक्ति, आघात-संघात और अवसाद - विषाद भी हैं जो पंकज सिंह की कविताओं में व्यापक और तीव्र संवेदकों की उपस्थिति को गहराई देनेवली चीज़े हैं और इस अर्थ में चकित करनेवाली भी कि वे तर्क और विवेक की शक्लें अख़्तियार करके सार्वजनिक संलाप का हिस्सा मालूम होने लगती हैं.
अगर काव्य के कुछ शाश्वत मापक होते हों तो उनके सम्मुख भी पंकज सिंह की जीवन विश्वासी कविता सार्थक और सामाजिक - सांस्क्रतिक उपयोग की बनी रहेगी क्योंकि इसकी आत्मा में करूणा और प्रेम की सुनिशिचत लय है वह उसी महस्वप्न से आबद्द -प्रतिबद्द है जो उसे जीवन और भाषा में चतुर्दिक फैले विचलनों के बीच सन्तुलित और ऊर्जस्व बनाये हुए है.