इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
औरत-
एक माँ, संस्कारों की धरती, पावन गंगा.
लोग इसे भूल जाते हैं!
एक माँ, काली बन जाती है
जब उसके बच्चे पर कुदृष्टि पड़ती है!
एक औरत,
बन जाती है दुर्गा,
करती है महिषासुर का वध
जब संस्कारों की धरती पर
पाप के बीज पड़ते हैं!
पावन गंगा बन जाती है विभीषिका
जब उसकी पावनता के उपभोग की अति होती है!
सूखी नज़र आती गंगा
काल का शंखनाद बनती है
दिशा बदल-सर्पिणी बन जाती है!
लड़की के जन्म को नकारकर
वंश की परम्परा में ख़ुद आग भरते हो,
जो पुत्र जन्म लेता है
लड़की की मौत के बाद,
वह पुत्र-
विनाश का करताल होता है!
जागो,
संस्कारों की धरती को
बाँझ मत बनाओ.
गंगा में संस्कारों को मत प्रवाहित करो
विश्वास की देहरी को
अंधकारमय मत करो.
लक्ष्मी को
आँगन से निष्कासित मत करो!
नारी का सम्मान करो,
उसकी ममता को मान दो,
अन्धकार से प्रकाश की ओर
प्रस्थान करो,
आँगन में-
बसंत को आने दो!
बाल-विवाह, सती-प्रथा,
अग्नि-परीक्षा.
जाने कितने अंगारों से गुजरी
ये मासूम काया!
यातनाओं के शिविर में,
विरोध की शिक्षा ने,
उसे संतुलन दिया,
शरीर पर पड़े निशानों ने
'स्व' आकलन का नज़रिया दिया!
हर देहरी पर,
'बचाव' का गुहार लगाती,
अपशब्दों का शिकार होती,
लांछनाओं से धधकती नारी ने
अपना वजूद बनाया.
माँ सरस्वती से शिक्षा,
दुर्गा से नवशक्ति ली,
लक्ष्मी का आह्वान किया-
प्रकाशपुंज बनकर ख़ुद को स्थापित किया!
समाज का दुर्भाग्य-
उसकी शक्ति, उसकी क्षमताओं से परे
हत्या पर उतर आया!
आज फिर,
कुरुक्षेत्र का मैदान है,
और कृष्ण नारी सेना के सारथी.
यकीनन,
जीत निश्चित है!
उम्र कोई हो,
एक लड़की-
16 वर्ष की,
मन के अन्दर सिमटी रहती है.
पुरवा का हाथ पकड़
दौड़ती है खुले बालों मे
नंगे पाँव.
रिमझिम बारिश मे!
अबाध गति से हँसती है
कजरारी आँखों से,
इधर उधर देखती है.
क्या खोया ?-इससे परे
शकुंतला बन
फूलों से श्रृंगार करती है
" बेटी सज़ा-ए-आफ़ता पत्नी " बनती होगी
पर यह,
सिर्फ़ सुरीला तान होती है!
यातना-गृह मे डालो
या अपनी मर्ज़ी का मुकदमा चलाओ,
वक्त निकाल,
यह कवि की प्रेरणा बन जाती है,
दुर्गा रूप से निकल कर
"छुई-मुई" बन जाती है - यह लड़की!
मौत को चकमा तक दे जाती है.
तभी तो
"रहस्यमयी" कही जाती है.!
परिस्थितियाँ परिभाषाएँ बदल देती हैं,
और एक अलग सच परिभाषित होता है.
चार दीवारों से घिरी एक छत 'घर' नहीं होती,
'घर' एक माँ होती है, दो बाँहें-चार दीवारों से अधिक सशक्त होती हैं,
छत में वो बात कहाँ, जो बात माँ के आँचल में होती है!
आँधी-तूफ़ान, क्या नहीं सह जाती है माँ,
एक-एक साँस मजबूत ईंट बन जाती है!
चार दीवारों का घर अपना न हो,
बनाये रिश्तों की यादें अपनी न हों,
माँ-एक सुरक्षित घर का एहसास देती है,
ममता के जादुई स्पर्श से-किराए का दर्द बाँट लेती है.
© 2009 Rashmi Prabha; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: रश्मि प्रभा
जन्म स्थान: सीतामढ़ी (बिहार)
शिक्षा: स्नातक (इतिहास प्रतिष्ठा)
प्रकाशित रचनायें: कादम्बिनी में और कुछ महत्त्वपूर्ण अखबारों में रचनायें प्रकाशित
अभिरूचियाँ: कलम और भावनाओं के साथ रहना
वेब साईट: http://lifeteacheseverything.blogspot.com /
आत्मकथ्य: सौभाग्य मेरा कि मैं कवि पन्त की मानस पुत्री श्रीमती सरस्वती प्रसाद की बेटी हूँ और मेरा नामकरण स्वर्गीय सुमित्रा नंदन पन्त ने किया और मेरे नाम के साथ अपनी स्व रचित पंक्तियाँ मेरे नाम की - " सुन्दर जीवन का क्रम रे, सुन्दर - सुन्दर जग - जीवन ". शब्दों की पांडुलिपि मुझे विरासत मे मिली है. अगर शब्दों की धनी मैं ना होती तो मेरा मन, मेरे विचार मेरे अन्दर दम तोड़ देते. मेरा मन जहाँ तक जाता है, मेरे शब्द उसकी अभिव्यक्ति बन जाते हैं, यकीनन ये शब्द ही मेरा सुकून हैं