अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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युवा प्रतिभा

रश्मि शर्मा

उड़ान

अन्तर्मन की दहलीज पर
मैने देखा एक पक्षी का
सुन्दर सा घोंसला
जिसे देख कर रोज़ बढ़ता
मेरा हौसला

चीं चीं चूँ चूँ की आवाज
मन में जगाती है कौतुहल,
और देती है मुझे एक अनोखा
संबल
सोचती हूँ? कैसे मिटाऊँ फैसला
वास्तविकता और अनुमान में,
आकाश में उड़ते हुए
पक्षियों की कतार
सम्मोहित करती हैं मुझे
मैं चाहती हूँ शून्य में उड़ना
धीरे से पेंग बढ़ाकर
चाँद तारों को छूना
और छुअन के अहसास को
समेटना, समेटकर लाना
मन के वितान में
काश मेरे पंख उग आते
और मैं कर पाती अनुवाद
अपने हौसले का उड़ान में
खैर!
अंधेरी रात में
खुद को जगाऊँगी, हौसला है
पंख भी लगाऊँगी, मैं उडूँगी
चाँद तारों का पता लगाऊँगी
और फिर अपने उड़ान की कहानी
सूरज को बताऊँगी
कल विहान में.

© 2009 Rashmi Sharma; Licensee Argalaa Magazine.

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