अर्गला

इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका

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युवा प्रतिभा

रेणु शाह

देह बाँसुरी

बजती है देह बाँसुरी
साँसों के स्वर के संग
अतल-वितल तक गूँजता है
जिसका अनहद नाद
स्वार्थ और द्वेष से परे
होता है जिसमें
अपनत्व का स्नेहिल बोध
वही है, वही तो है
जीवन का शाश्वत स्वर
करता है निनादित
प्रेम की अजानी रागिनी से

देह में समाहित हैं
वे पंच-तत्व जो
सृष्टि में रचे-बसे हैं
आए हैं छूट-छूट कर
देह को देने एक आकार
सार है तत्वों का
जीवन के रंध्रो से
बजना ही है देह को
सरगम के प्रस्फुटन तक
खुलना है अपने आप में
अवगुंठन के उन रंध्रों को
करना है स्वीकार
स्वर और लय के साथ
देह जब तक है स्वयं में
तब तक जुड़े हैं
सांस के तारों से सारे सम्बोधन,
यह बाँसुरी बजेगी
व्यष्टि से समष्टि तक
सृष्टि है तब तक
नाद है अवबोध है.

कुछ भी तो नहीं

कुछ नहीं
कुछ भी तो नहीं
अभिशप्त जीवन में
है एक भीतर से
बार-बार उठता ज्वार
कुछ सहमे विचार
मन से गुत्थमगुत्था
एक वेदना की पुकार

न चाह न राह
न कोई मंजिल
दूर तक फैला
एक भयावह सन्नाटा
बार-बार बनता
फिर बिखरता हर बार
एक जीवन-सत्य
उसी तरह चलना
चलते ही जाना उस ओर

मर्माहत मन को घेरे
सारे के सारे संत्र्स्ॐॐॐॐ
उसी जहर को पीना
लौट-लौट जाना
फिर आना उस छोर
कुछ अपने ही प्रश्नों में कैद हो जीना

आशा के अवसान में
जहाँ चुपचाप
मौन धरे जी लेते हैं हम
वहीं, ठीक वहीं पर
उठती है भीतर से
करूणा की पावन लहरें
और सींचते हैं हम
अभावों के वृक्ष

कुछ पैबंद
चुप्पियाँ ओढ़े सीते हैं
यही तो है
इस जीवन का चेहरा
एक अंतस का दर्द
भरा-भरा लगता है
अपना सब कुछ
किन्तु सच में हम रीते हैं

प्रेम की पावन धारा है तब तक.

© 2009 Renu Shah; Licensee Argalaa Magazine.

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