इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
जिन्दगी के कशमकश भरे पन्नों में
जब भी उतर के देखा
नजर आते हैं
सिर्फ़ काले काले अक्षर
कोशिश करता हूँ कि
काले काले अक्षरों के बीच
फैला उजाला देखूँ
पर नजर नहीं आता कुछ भी
जिन्दगी की सारी खुशियाँ
जो तुम्हारे साथ चली गयीं हैं
कभी जिन्दगी के किसी पड़ाव पे
मिलने से पहले बताना जरूर
ताकि हम फिर खुश रहने के लिए
कुछ सामान जुटा लें
ताकि तुम्हें न लगे ऐसा कि
हम तुम्हारे बिना अधूरे है.
© 2009 Shashwat Shriparv; Licensee Argalaa Magazine.
This is an Open Access article distributed under the terms of the Creative Commons Attribution License, which permits unrestricted use, distribution, and reproduction in any medium, provided the original work is properly cited.
नाम: शाश्वत श्रीपर्व
उम्र: 44 वर्ष
शिक्षा: बी. सी. ए. (इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय), एम. सी. ए. (कोचीन विज्ञान एवं तकनीक विश्वविद्यालय)
अभिरूचियाँ: उपन्यास पढ़ना, गाना गाना और सुनना, क्रिकेट
संपर्क: एम.सी.ए. बी 6, सीडैक परिसर, ई आर & डी सी आई - आई टी वेल्लयम्बलम, त्रिवेन्द्रम - 695033