इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
अनिल पु. कवीन्द्र: संवेदना के स्तर पर आपको फ्रांसीसी या हिन्दी साहित्य या संस्कृति में क्या साम्यता या अन्तर प्रतीत होता है?
शीला कार्की: आज कल जो आधुनिक साहित्य है उसको आप देखिए तो मतलब एक तरह था जो चेंज है वो सभी में एक सा ही है. क्योंकि एक भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के तहत रचा जा रहा है. भारत एक ऐसा देश है जहाँ अनेकों मशहूर साहित्यकार हुए हैं उन्हीं में से एक मशहूर साहित्यकार हैं गुजरात के जिनकी चर्चा किए बगैर बात अधूरी रह जाएगी उन्होंने सार्त्र के दर्शन को ले कर अपनी रचनाओं में जो नयापन दिया वो बेशक देखने-पढ़ने योग्य है. वो हमेशा मेरे से बेहद लगाव रखते थे क्योंकि उनको लगता था कि मुझे वो भाषा आती है और जो फ्रांसीसी भाषा को नहीं पढ़ सकते थे उसे मैं पढ़ सकती थी. उन्होंने एक छोटी सी किताब का अनुवाद और चूँकि वो बेहद विख्यात साहित्यकार थे. मैं उनका मुकाबला तो नहीं कर सकती लेकिन उसमें एक खास बात थी कि उनके साहित्य में फ्रांसीसी साहित्यकारों का प्रभाव साफ झलकता था. खासकर सार्त्र का जो आध्यात्मिक चिंतन है जबकि देखिए कि वो तो गुजरात में गुजराती के प्रोफेसर थे. तो हम यह नहीं कह सकते कि इसका प्रभाव जो फ्रांसीसी जानता है या फ्रांस में लिख रहा है उसी पर होगा. चूँकि फ्रांस में ऐसी कई चीजें हैं जिसका मुकाबला दुनिया की कोई भी संस्कृति नहीं कर सकती. साहित्य और कला इसमे विशेष तौर पर फ्रांस दुनिया में सबसे आगे है. उनकी जो साहित्यिक कृतियाँ हैं उनमें फ्रांसीसी रचनाकारों ने यह कोशिश जरूर की कि उसका प्रचार प्रसार हो. जिस तरह साहित्य अकादमी है उसी तरह फ्रांसीसी अकादमी ने भी अपनी भाषा को बनाए रखने पर लगातार जोर दिया. उन्होंने अपने भाषा और साहित्य पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया है. चाहे आध्यात्म या दर्शन हो सभी मायनों में फ्रांस में बहुत काम हुआ है. आप फ्रेंच रेवोल्यूशन को ही देखिए, फ्रेंच रेवोल्यूशन एक ऐसा रेवोल्यूशन है जो सभी दुनिया की सोच बदल सकता है. फ्रांसीसी साहित्य में पहली बार यह रचा गया कि समता है वरना उससे पूर्व या तो गरीब थे या तो अमीर. मध्यवर्ग तो फ्रेंच रेवोल्यूशन के बाद ही संघर्षशील वर्ग बनकर उभरा जिसमें हम जैसे लोग शामिल हैं.
अनिल पु. कवीन्द्र: फ्रांसीसी कृतियों को अनूदित करते हुए आप के समक्ष किस प्रकार की कठिनाइयाँ आईं आपने उनका समाधान किस प्रकार से किया?
शीला कार्की: जब आप किसी भी भाषा का दूसरी भाषा में अनुवाद करते हैं कठिनाइयाँ आती ही हैं. भाषा तो एक तरह का प्रतिबिंब है आपकी संस्कृति का जो शब्द विशेष तौर पर संस्कृति से जुड़े होते हैं वो हमें ढूँढ़ने मुश्किल होते हैं. उनका अनुवाद में किसी न किसी तरह समाधान तो करना ही पड़ता है और वहीं पर फर्क आ जाता है. ओरिजिनल कृति और जो आप अनुवाद करते हैं उसके बीच. लेकिन जहाँ तक हो सकता है हम उसका एक नजदीकी जितना भी अर्थ लिया जा सके वहाँ तक कोशिश करते हैं. चूँकि अनुवाद करना संस्कृति को बचाए रख कर दूसरी संस्कृति के समक्ष अपना वजूद बनाए रखना होता है तो ऐसे में थोड़ा बहुत फर्क आ ही जाता है. परन्तु कठिनाईयाँ तब भी बनी ही रहती हैं. खास कर सांस्कृतिक वर्णन जहाँ आता है. क्यूँकि किसी तरह आप समझायेंगे कि फ्रांस की संस्कृति में हमसे कितना अलग है. चूँकि फ्रांस भले ही भारत जितना देश न सही किंतु उनमें जो प्रदेश है उसी में इतनी भिन्नताएँ हैं कि वही फर्क अपने आप में बहुत बड़ी कठिनाई है अनुवाद में. जो कि हमारे यहाँ भी है लेकिन जब तक आप उसको अच्छी तरह समझ नहीं लेते. चूँकि एक भाषा एक संस्कृति को समेटने में बहुत बहुत वक़्त लगता है तो देखिए अनुवाद में यह अंतर बना ही रहता है. एक भाषा एक संस्कृति को समझने में बहुत वक़्त लगता है जब आप अपनी भाषा को अच्छी तरह समझेंगे तभी आप संस्कृति को समझ सकेंगें तभी आप अन्य संस्कृति को समझ अकते हैं. और उसके प्रभाव को देख सकते हैं जैसे फ्रांसीसी संस्कृति का प्रभाव मेरे उपर भी बहुत है, रहा है शुरू से. हालाँकि मैं दिल से हिन्दुस्तानी रह गई हूँ क्योंकि जन्म मेरा यहाँ पर हुआ लेकिन दोनों ही संस्कृति चाहे वो अंग्रेजी की हो या साझे की दोनो का भारी प्रभाव रहा है मेरे ऊपर. पर तब भी हिन्दुस्तानी होने का फ़क्र है. न मैनें कभी चाहा कि मैं फ्रांस में बस जाऊँ. लेकिन बावजूद इसके फ्रांसीसी लोग जब भी मुझसे मिलते हैं वो खुश होते हैं यह देख कर कि मैं उनके कितने नजदीक हूँ.
अनिल पु. कवीन्द्र: आपने अब तक किन-किन कृतियों और रचनाओं को अनुवाद के लिए चयन किया?
शीला कार्की: चूँकि मैं एक बार कीबेक गई थी कीबेक कनाडा का एक प्रदेश है जहाँ फ्रेंच बोली जाती है और वो लोग कब से इम्मीग्रेट हो कर फ्रांस में आ गए थे. लेकिन उन्होंने अपनी भाषा अपनी संस्कृति नहीं छोड़ी और वो लोग जो वहाँ पर इम्मीग्रेट हुए हैं वो ऐसी जगह थी जिसे बापानी बोला जाता है और वो अटलांटिक सागर या कहें कि समुद्र के पास है. तो उनका एक तरह का कल्चर है जो कि वो कीबेक में लाए. और उसको मैने इस लिए अनुवाद किया कि उसमे बहुत समानताएँ थीं सबसे पहले तो ए थी कि वो एक एग्रीकल्चरल कम्यूनिटी थी. हमने उनका आगमन जो कनाडा में हुआ और फ्रांस में हमने उनका तुलनात्मक अध्ययन किया है.
आर्य लोग जब हमारे देश में आए तो अपनी सभ्यता ले कर आए और हमारी सभ्यता में उनकी सभ्यता मिली एक नई सभ्यता बनी. जिसे हम आज वहन कर रहे हैं. तो आर्यों का हमारे ऊपर एक कल्चर लाए. कीबेक में फ्रन्सीसी अपना कल्चर लाए और ऐसी जगह में आये जहाँ छ: महीने बर्फ पड़ी रहती थी. उन्हे बेहद तकलीफ़ होती थी क्या होता था कि जब भी किसी देश में इम्मीग्रेसन होता है. वो यूँ ही कभी नहीं होता उसके अपने विदित कारण होते हैं. चूँकि वो किसान लोग थे जो इम्मीग्रेट हुए. और उन्हें कहा गया कि कनाडा में जमीन ही जमीन है तो वो जरूर उस जमीन के लिए वहाँ पर बसे. और फ़िर वो दरसल सिर्फ़ किसान थे तो उन्होंने जमीन को तैयार करने के लिए पहाड़ हटाये पत्थर हटाये. और मुझे ऐसा लगा जैसे जब पृथ्वी का निर्माण हुआ और तब वहाँ मौजूद आदिवासियों ने जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए किस तरह मेहनत की. तब मुझे लगा कि ये एक कल्चर है जो उस समय काफ़ी समृद्धशाली था. जहाँ पर लोग मामूली नाव पर आते थे. और इतनी ठण्ड गर्मी बरसात में भी एक तरह से नए प्रदेशों का आविष्कार होता था. और फ़िर वहाँ से उन्होंने फ्रांस के राजा का नाम दर्ज किया तो मैंने कीबेक फ्रान्स और हिन्दुस्तानी संस्कृति में इतनी समानता पाई. और इसलिए मैंने इसे अपने अध्ययन का केंद्र बनाया. और जो मेरा पी एच डी का काम रहा है उसमें मैंने यही समानता दिखाई है. एक तो सबसे पहले जो पुरानी कथाएँ हैं जिनको मिथ्स बोलते हैं वो देशों में हैं. वो खासकर अमेरिका और कनाडा ये नये देश हैं. तो इनमें ये पुरानी सभ्यता नहीं रही. अब ये क्या करते हैं कि पुराने देशों के मिथ को बाव्रो करते हैं और तब उन्हें अपने तरीके से ढालते हैं. जहाँ तक हमारी बात है हमारे जो मिथ हैं बहुत कुछ ग्रीक की सभ्यता से काफ़ी मिलते जुलते हैं और अगर इसमें भी आप देखें तो हमारे यहाँ इन्द्र हैं तो वहाँ भी ऐसे ही देव हैं इन्द्र का वज्र अगर शस्त्र है तो वहाँ के देव का थण्डरबोल्ट है. एक समानता तो मैंने वहाँ देखी. उसी को मैंने साहित्य में भी देखा उसी पर मैंने अपना शोध एक तुलनात्मक रूप से किया और जब वहाँ गई तो मुझसे कहा भी गया कि आप बीसवीं सदी के साहित्य को प्रिमेटिव लेजेन्द से किस तरह से देखेंगी? क्योंकि समय का एक बड़ा अन्तर तो है ही. मैंने उन्हें बताया कि समय का अन्तर तो जरूर है लेकिन यह एक यूनिवर्सल फ़िनोमिना है. आप देखें अगर तो हम अपने मिथ को प्रतीकों की तरह आज भी उपयोग करते हैं जैसे वो अर्जुन की तरह वीर है यही उनके भी साहित्य और जीवनानुभूतियों में समान रूप से है. कि अगर हैक्टर वीर था तो वहाँ उसका प्रतीक दिया जाता है तो ये जो प्रतीक है किसी भी समय किसी भी संस्कृति में ऐसे ही चले आ रहे हैं ये समानता आप बिलकुल देख सकते हैं. जैसे पृथ्वी उनके लिए माँ जैसी है हमारे लिए भी वैसी ही है. इसीलिए मेरे रिसर्च का जो पहला अध्याय है वो है मदर जिसे हिन्दी में माँ कहते हैं. ऐसे कई उनकी सभ्यता में उदाहरण हैं जहाँ उन्होंने धरती को माँ भी बताया है और पत्नी भी बताया हैं हमारे साहित्य में सीता को ही ले लीजिए कैसे उन्हें जनक ने पाया और कैसे राम की वो पत्नी भी बनीं. और बाद में मां भी. जबकि सीता को हमने साहित्य में राजकुमारी की तरह देखा लेकिन है तो वो धरती की ही पुत्री. धरती से ही उन्हें जनक ने पाया था. मैं ऐसे आपको तमाम शब्द कीबेक के साहित्य में बता सकती हूँ जहाँ उन्होंने धरती को अपनी पत्नी भी बताया है. कहते हैं कि जो किसान होता है उसकी एक ही पत्नी होती है वो होती है धरती. कीबेक में एक पात्र है जो धरती में मरा हुआ मिला था. कहते हैं कि वो कभी धरती से अलग नहीं हो सका वो वहीं अपनी धरती पर मरा.
धरती का एक बहुत बहुत आत्मीय लगाव जो कि वहाँ भी है और हमारे में भी है. दूसरा ये कि इंडो सिविलाइजेशन में धरती को गॉडेस (देवी) भी कहते हैं तो ये जो मातृत्व के प्रति अटैचमेंट है ये मुझे दोनों साहित्य में समान लगता है. क्योंकि माता हमेशा जन्म देती है, धरती फल देती है धरती मां जैसी ही तो है तो मैंने उसमें इतनी समानताएँ पाईं और इस तरह से मैंने तुलनात्मक अध्ययन किया है. उनके साहित्य में होमो सेक्सुअलिटी - लेस्बियनिज्म इंडोनिज्म बहुत है.. हमारे साहित्य में भी हमें भिन्न मिलते हैं जो वहाँ भी इग्जिस्ट करते हैं और खासकर कीबेक का साहित्य जो हालाँकि फ्रांस के साहित्य जैसा नहीं है. वो असल साहित्य फ्रांसीसी भाषा में एक नई धरती पर लिखा गया. इस तरह मैं बताऊँ कि ढेरों समानताएँ हैं हमारे और कीबेक और फ्रांसीसी साहित्य में.
आपने इस्कॉन टेंपल के बारे में सुना होगा एक बार मैं वहाँ के महन्त से मिली तो उन्होंने कहा कि मैं यहाँ कभी कभी कृतियाँ देखने आती हूं. और ये मेटल कास्टिंग करते हैं जो कि बेहद डिफिकल्ट होता है. मैं जब पहुँची वृन्दावन, वहाँ एक स्कल्पचर उन्होंने बनाया था जो बेहद पसंद आया तो मैंने कहा कि ये तो अखिलेश जैसा है तो उन्होंने कहा कि ये अखिलेश नहीं अर्जुन है तो वहाँ मैंने एक समानता देखी चूँकि वो एक विदेशी है तो उन्होंने अर्जुन को अखिलेश की तरह रचा. वीरता की जो पॉलिसी है वो तो दोनों में ही सम्मान थी. तो यहाँ पर हमें समानता जरूर दिखी है हम इसी तरह हर एक साहित्य को मिथ से जरूर जोड़कर देखते हैं. चूँकि ज्यादातर साहित्य मिथ को लेकर ही लखे गए. इसीलिए लेख मिथ हमारे लिए बहुत जरूरी हैं. अगर साहित्य और संस्कृति में समानता और भिन्नता देखनी है और आज के युग में जब रोमन जनता सिविलाइज्ड होता या है. कल्चर को इस तरह ढाला कि वो आर्टिफिशियल हो गया है. हम पहले जैसे नहीं रहे तो हम पीछे जा रहे हैं. फ्रांस के सामने भी इसमें आधुनिक साहित्य में यही समस्या है. क्योंकि पुराने मूल्य, संस्कार, रीतियाँ खत्म होती जा रही हैं और जो नए समाज की विचारधारा है उसमें स्थिरता जरा भी नहीं है. फ्रांस के साहित्य में आधुनिकता होने के साथ - साथ आधुनिक समस्याएँ भी हैं. यह फ्रांस के सांस्कृतिक साहित्य में साफ झलकती है लेकिन हृदय के साहित्य में आज भी एक तरह की प्राचीनता है एक तरह का प्रिमिटिव ऐलिमेंट है. जो मैं वेदों से जोड़ सकती हूं जो मैं उस समय के साहित्य से जोड़ सकती हूं जो सभ्यता प्राचीन थी विकसित नहीं थी मगर हाँ पुराना जो साहित्य है उसमें नेचुरलिज्म है. रियलिज्म है ये जो सारे आधुनिक साहित्य हुए हैं साहित्य में सामूहिक साहित्य सामाजिक विषयों पर ही केंद्रित रहे हैं. कीबेक में भी है लेकिन उसमें जो प्रकृति का वर्णन है. उतना खूबसूरत ढंग से रचा गया है कि उसे शब्दों में वर्णित करना मुश्किल है. उसने एक किताब लिखी ' सरवाइवल ' एक बहुत बड़ा मुद्दा था ठण्ड इतनी ज्यादा कि तापमान 0 डिग्री से नीचे, बर्फ चारों तरफ पड़ी हुई. उन स्थितियों में उनको कैसे रहना था वो रेड इंडियन थे. इसलिए उनके साहित्य में मिथ बहुत मिक्स हो गया और ब्राइट इंडियन भी बहुत आये. प्रकृति के करीब रहे प्रकृति को लेकर नेचुरल लिटरेचर रचा जो कि हमारे वेदों में ऋचाओं में दिखता ही है. ये जो जीवन के मूलभूत पांच तत्व हैं ये दोनों जगह के साहित्य में खूब मिलता है.
अनिल पु. कवीन्द्र: फ्रेंच लोगों ने भारत में उपनिवेश बनाए थे क्या उसके साहित्य में भारत की कुछ झलक मिलती है. या भारत को आधार बनाकर फ्रेंच साहित्य में कुछ रचा गया?
शीला कार्की: भारत में जितना भी सांस्कृतिक साहित्य रचा गया इस बात को हमें नहीं भूलना चाहिए कि फ्रेंच लोग जब हिंदुस्तान में आये थे, वो भी व्यापारी बनकर आए थे. और इन्होंने पांडिचेरी में अपना एक केंद्र स्थापित किया था. व्यापार के लिए, लेकिन धीरे - धीरे उनकी शक्ति बढ़ती गई शायद हम लोग कमजोर थे कि अपने आपके झगड़ों में इन्हें इन्वॉल्व करने लगे. इस तरह से इनका एक इंफ्लुएंस बन गया. लेकिन ज्यादातर व्यापार में वे कपड़े का व्यापार करते थे. और कपड़ा जो हमारा एक नेचुरल डाइज होते हैं वो कपड़े आज भी आप अर्काइव या म्युजियम में लगे मिल जाएंगे. जो कि आजकल गुजरात में होता है. या राजस्थान में. हैण्ड प्रिंटेड कपड़ों का व्यापार ये लोग करते थे. उसमें जो हमारे कस्टम, कल्चर, रिचुअल्स हैं वो देखने को मिलते थे इन लोगों में एक और खास बात थी यात्रा. ये लोग भ्रमण करते थे और उन यात्राओं के बारे में लिखते थे. जब कोई कोरोपियन देखता है अपनी नजर से तो उसे पूरी तरह समझ नहीं होती. दो बाहरी नजरिये से देखता है चित्रों को तो उन्हें कई सांस्कृतिक गतिविधियाँ अजीब लगी होगी जैसा कि मैं करीब एक बरस पांडिचेरी में रही और वहाँ सरवाइव करने के लिए पैसा नहीं था मेरे पास. तो मैं वहाँ अनुवाद करती थी. और एक नन थी जो पुराने पांडिचेरी के ऐतिहासिक वर्णनों पर रिसर्च कर रही थी और सारे तथ्य फ्रेंच में लिखे होते थे. तो वो सारे प्रपत्र अर्काइव में से ले आती थीं तो मैं उनको अनुवाद करके बताती थी जो उनकी जरूरत योग्य सामग्री लगती थी उसे वो अंग्रेजी में रख लेती थी. ये प्रक्रिया बेहद परिश्रम भरी होती थी. तो जो शख़्स वहाँ पांडिचेरी में रहा था सबसे पहले यूरोपीयन उसने पोर्तुगीज से शादी भी थी और पोर्तुगीज यहाँ आते नहीं थे वो गोवा में थे. और वो व्यापारी बनकर ही आए थे और घर में यहाँ राज करना शुरू कर दिया था तो उनमें से एक लेडी जो थी, उससे शादी की थी उन्होंने और वो अपने आप को नवाब बताते थे. और उनको बेगम. तो असर तो उनके ऊपर भी हुआ और आज भी जो फ्रांसीसी मेरे संपर्क में हैं वो बेहद पसंदीदा तरीके से हिंदुस्तान में रहना चाहते हैं. हिंदुस्तान की आबो हवा, कल्चर को देखना चाहते हैं. यहाँ कि ऐतिहासिक इमारतें देखना चाहते हैं. यहाँ के जो प्रदेश हैं उनको देखना चाहते हैं क्योंकि इतनी वैराइटी है यहाँ के कल्चर में. क्योंकि यहाँ आधुनिक और प्राचीनता दोनों तरह के रिवाजों में लोग लिपटे हैं. उनको यहाँ का नृत्य सीखना बेहद रोमांचक लगता है एक आदमी था जिसका पास्कल, उसको बॉलीवुड के गीत बेहद पसंद थे. किशोर कुमार का फैन था. सारे किशोर कुमार के गाने उच्चारण बिल्कुल ठीक करके गाता था. और बाद में फ्रेंच लोग उससे इतने प्रभावित हुए कि उसे उन्होंने आई. आई. टी में एक कंसर्ट रखा जिसका नाम रखा पास्कल वालीवुड.
मैं तो सबसे ज्यादा इसीलिए प्रभावित हुई क्योंकि मेरे पिता एक कलाकार थे. और मुझे संस्कार में यही सीखने को मिला. और जब मैं पढ़ने गई तो आर्ट हिस्ट्री पढ़ी मैंने पेरिस में. इसी वजह से मैं अंतरात्मा से उनसे अड़ी रही यह एक किस्म का ऐसा प्रेम था जो दो धरातलों पर रहा पिता - पुत्री, गुरु - शिष्य. मेरी फ्रेंच टीचर मुझे फ्रेंच पढ़ाती थी. इटालियन टीचर मुझे पेण्टिंग सिखाती थी. पिता हमारे संस्कृति को सीखने पर हमेशा ही जोर देते थे. जबकि मैं और मेरी बहन दोनों कॉन्वेंट में पढ़ी फिर भी जो छाप मुझ पर संस्कृति की, कला की, भाषा की पड़ी वो मेरी बहन कहती है कि उस पर नहीं पड़ सकी. ये वो गायना था जब देश की आजादी का समय था जब लोग ये कहते थे कि अपना देश, अपनी संस्कृति अपनी स्वतंत्रता, संस्कार, मूल्य होना चाहिए. मैंने इसी सांस्कृतिक विचार धारा के बीच संगीत, कला, साहित्य सीखा. मेरे घर पर प्यानो सिखाने वाले आध्यापक आते थे. हम तीनों बहनों को बराबर दीक्षित किया गया लेकिन, सबसे ज्यादा अगर जैसा मेरी बड़ी बहन कहती है कि मुझ पर उसका पूरा असर पड़ा. हालाँकि मैं यह सब कोंसियशली नहीं करती थी पर फिर भी बचपन से मेरा माहौल ऐसा रहा मैं ऐसी कल्चरल रिच परिवार में पली, मैंने अपने घर पर महादेवी वर्मा को देखा है, सुमित्रानंदन पंत को देखा और वो बड़े प्यार से मुझे कुमाउँ में बोलते थे और मेरे चाचा जो कि कुमाउँ के थे उनका नाम मनोहर था तो वे कहते थे कि मनोहर की बेटी आ गई. पहाड़ की राजकुमारी. मेरे पिता के कलाकार होने की वजह से ही इस तरह सुशिक्षित सांस्कृतिक, साहित्यिक, कलाकार वर्ग के लोग मेरे यहाँ अक्सर आते रहते थे. भले ही मैं उन जैसी विख्यात कलाकार न सही लेकिन मेरे जैसे सामान्य कलाकार तो आज इस उम्र में भी जमा रहते हैं.
अनिल पु. कवीन्द्र: फ्रांस और भारतीय साहित्य में आप संस्कृति वर्णन की क्या विशेषता पाती हैं?
शीला कार्की: संस्कृति वर्णन की विशेषता तो दोनों साहित्य में है. और सामाजिक - सामाजिक ये होता है कि कोई साहित्य एक समाज का ही प्रतिबिंब होता है. तो जिस युग में जैसी सामाजिक स्थिति रही उसका समाज का सांस्कृतिक साहित्य भी उसी वर्णन को साथ लेकर रचा गया. जैसे आप प्रेमचंद का साहित्य देखें तो वो अंग्रेजों के समय का हिंदुस्तानी समाज था. फ्रांस में भी इसी तरह का साहित्य रचा गया. फ्रांस में अभी भी बड़ी - बड़ी कोयले की खानें हैं. जहाँ पर मजदूर वर्ग काम करते थे उसी तरह हमारे यहाँ भी गरीबी थी और जिसकी वो खान होती थी वो अमीर होता था. तो गोरा तो मुझे बेहद संजीदा, तार्किक उपन्यास इस मामले में नजर आया. ये हर युग में अपने बदले सामाजिक परिवेश के साथ - साथ चला गया.
आज का जो साहित्य है उसमें आधुनिक युग की समस्याएँ हैं जैसे पारिवारिक बंधन, के लगातार टूटते जा रहे हैं और आज का युवा यह समझता है कि आज ये नहीं तो कल कोई और.. ... लेकिन इसमें एक तो आपकी आत्मा मर जाती है. दूसरा अपने आप को भी कहीं न कहीं तकलीफ होती है. और दूसरे को भी तकलीफ होती है. मात्र और सीमोन द बोउआर इतने बड़े थे हमेशा साथ रहे. लेकिन उनकी भी बहुत सी सच्चाईयाँ ऐसी हैं जिन्होंने लोगों को दुख दिया. तो हम इस तरह विघटन के दौर में जी रहे हैं. आप घर में कुत्ता भी पालें तो उससे भी प्रेम हो ही जाता है. तो दो इंसानों में संबंध हो और प्रेम न हो ये संभव नहीं है. और फिर जब आप इतना घनिष्ठ संबंध बनाते हो फिर तोड़ते हो तो दोनों ही तरफ कहीं न कहीं चोट तो पहुँचती ही है. किंतु फिर भी आप ये कहते हो कि अब नहीं चल रहा तो क्या करे. निभाने का तो हिसाब ही नहीं है. ये सारी विघटन, पीड़ा, की समस्याएँ आधुनिक साहित्य में सबसे अधिक है. और हिंदुस्तान में भी वही हो रहा है. हिंदुस्तान में जो नई कृतियाँ हैं और खासकर जो महिला साहित्य है जो जिन विषयों को उठाती हैं वो अलगाव वादी हैं और एक तरह से महिलाओं की साइकोलॉजी को दिखाती है या वो अपनी पीड़ा का सबसे ज्यादा वर्णन करती है. तो किसी भी संस्कृति में चाहे कनाडा हो योरोप हो हिंदुस्तान हो हर जगह यही सिखाया अलग - अलग भाषा और तरीके से कि पुरुष परमेश्वर है उसकी अराधना करो. मगर आधुनिक नारी चाहे फ्रांस में हो या यहाँ खुल्लमखुल्ला संबंधों को अपने तर्क ढंग से उसका वर्णन करती है. ये आपको फ्रांसीसी साहित्य में खूब मिलेगा और हिंदुस्तानी साहित्य में भी. शृंगार कभी - कभी इस तरह के वर्णन से अश्लीलता का रूप भी ले लेता है. हिंदुस्तान में लिखने वाली तमाम महिला लेखिकाएँ इन्हीं द्वंद्वों में जकड़ी हुई हैं. और संबंधों की खुले नुमाइश पर खुलकर लिख रही हैं.
इसी तरह केरल की एक राइटर थीं जो महिला लेखिका थी और ऐसा लिटरेचर लिखती थीं जो पोर्नोग्राफिकल था पहले स्त्री कथा इस तरह से नहीं लिख पाती थी. फ्रांस में कितनी भी बड़ी - बड़ी पत्रकार हुई हैं. उन्होंने फेमिनिज़्म को लेकर बहुत कुछ लिखा फेमिनिज़्म की तीन स्टेज हैं पहली में नारी - पुरुष समानता मानती हैं. दूसरी में वो हर तरह से विद्रोह करती हैं जिस चीज को कभी दबाया गया कभी बोलने की इजाजत नहीं मिली उसका वो खुल्लमखुल्ला वर्णन करती हैं. और जब वो ये सब करके थक जाती हैं और अगर आप कुछेक में जाओ कीबेक में मेरी मित्र फेमिनिज्म ही रहीं ये मेरा बड़ा सौभाग्य रहा है कि मैं वहँ हर तरह के लोगों से मिली हूँ. और शायद इसलिए मैं चीजों को बहुत गहराई से समझने लगी हूँ. और वहाँ की जो भी फेमिनिज्म राइटर हैं वो हमेशा डाउन महसूस करती हैं. जबकि मैंने ऐसा महसूस नहीं किया मैं कहती हूं भगवान ने नारी और पुरुष बनाए हैं. वो संबंधों को सोचकर बनाए हैं तो हम इसे डाउन विद मैं भी इसे कह सकते हैं. तब भी नारी - नारी रहेगी? पुरुष पुरुष ही रहेगा. मैं अत्याचार नहीं सहूँगी मैं अत्याचार के खिलाफ हूं और वे पुरुषों के खिलाफ हैं और जूलिया, क्रिस्तीवा आदि का कहना ये है कि जैसे आप यहाँ मेरे पास बैठे हो आप मेरे लिए एक कलाकार हो, एक लेखक हो अगर आप औरत होते तो भी मेरे लिए कोई तर्क नहीं होता अगर आप आदान हैं तो भी मेरे लिए फर्क नहीं है. क्योंकि मैं आपको एक कलाकार के रूप में देख रही हूं. जबकि यहाँ पर इस तरह की कोई भावना मेरे भीतर नहीं आती कि तुम पुरुष हो और मैं नारी. जब फेमिनिस्ट राइटर ये नहीं सोचतीं. जितनी भी फ्रांसीसी फेमिनिस्ट औरतें हैं. वो बहुत ज्यादा इंटरेक्ट हैं सीमोन द बोउआ से लेकर आज तक. इसलिए कि वहाँ पर कोई भी सामाजिक इश्यू ऐसे नहीं हुए जैसे हमारे यहाँ. यहाँ पर जब वेमन कंफ्रेसेज होती हैं या जहाँ नारियाँ जिन जगहों पर एकजुट होकर कुछ वक़्तव्य देती हैं मैं वहाँ जाना प्रिफ़र नहीं करती. क्योंकि हमेशा वो सामाजिक समस्याओं को वो उठाती हैं. जैसे दहेज प्रथा नारी उत्पीड़न. इन चीजों को दुख होता है सुनकर. और शायद मैं अपनी ही दुनिया में रहना चाहती हूं इसलिए ऐसे अंतर की वजह से फ्रांसीसी फेमिनिज्म के प्रति मेरी बहुत रिस्पेक्ट है. वो ये देखती हैं कि अब जैसे अमृता प्रीतम, वो कहती हैं कि मेरे को तो मातृत्व चाहिए एक कंपैनियन चाहिए जो मेल हो और जैसे फूल उगता है वैसे ही मैं बच्चों को बढ़ता देखूँ. लेकिन कीबेक की वोमेन आर्टिस्ट कहती हैं कि मुझे ये सब कुछ नहीं चाहिए मुझे अपना अलग रूम चाहिए. मुझे एकांत चाहिए कुछ लिखने, रचने के लिए. तो एक फर्क है इन दोनों में भी. यहाँ पर मैंने इन दोनों का कंपैरिजन किया है. पर आखिरी में मुझे तो कहना ही पड़ेगा कि आज भी मैं अकेली रहती हूं अपने सिर्फ काम पर ध्यान देती हूं. लेकिन कभी भी जब मेरे बच्चे आ जाते हैं तो भावना उनसे जुड़ने की होती ही है. उनके लिए प्यार तो उमड़ता ही है, जबकि अन्य देशों की फेमिनिस्ट हैं उन्हें इस तरह का लगाव बहुत नहीं है. लेकिन उनके मेरे बीच एक चीज सिमिलैरिटी है जो प्रतिभा हमें मिली है हम उसमें ही ज्यादातर मन लगायें. और उस प्रतिभा को आप जितना उभार सकें उस पर उतनी ही लगन से काम करो. ये सब डिमोशनल अटैचमेंट हैं उसे सेकंडरी में रखो. मैं ये नहीं कहती कि अकेले रहकर मुझे दु:ख नहीं हुआ है. दु: ख हुए बगैर तो कोई लिखना जान ही नहीं सकता. लेकिन मैंने उसको ओवरकम किया है और आज मेरे पास जो ऑब्जेक्टिव हैं उससे मैं सेविंग ऑफ लाइफ को देखती हूं. मैंने गरीबी भी देखी है जब मेरे पास इतना भी पैसा नहीं होता था कि रिसर्च के लिए कागज खरीद सकूँ तो जो खत पेपरनुमा आते थे उसके पीछे हिस्से में मैं लिखती थी और जब पेन की रिफिल खत्म हो जाती थी तो रोना आता था. जे. एन. यू. में जब मैंने काम किया तब भी लोग मुझे पागल कहते थे इन्हीं स्थितियों में मैंने काम लगातार किया. लेकिन हमारे मन में था कि करके दिखायेंगी और मैंने करके दिखाया. आगे भी हम करेंगे. लेकिन यही है कि एक दृढ़ निश्चय होना चाहिए. ये जो भी स्थितियाँ हैं उनमें संघर्ष तो जीवन ही है. तो अभी भी हमने छोड़ा नहीं है, अंतिम दिन तक काम करेंगे. जैसे आज हम हैं आप जैसे लोग मुझसे बात करने आए हैं हो सकता है बाद में और लोग भी आएँ.
अनिल पु. कवीन्द्र: आप बरसों तक फ्रांस में रहीं तो फ्रांसीसी मिथक और यथार्थ भारतीय मिथक एवं यथार्थ धरातलक या कृतियों में क्या कोई साम्य है यदि नहीं तो उसे आप अनुवाद में किस तरह से देखने को प्रयास करेंगी?
शीला कार्की: मैंने जैसा कि पहले भी इन्हीं चीजों पर कुछ बात बीच - बीच में की है लेकिन यथार्थ और साहित्य थोड़ा दोनों जगहों पर अलग है. हरेक जो साहित्यकार होता है. वो अपने ही अनुभवों पर आधारित होकर लिखता है. पर ये कतई जरूरी नहीं कि वो उसकी आत्मकथा हो. उसे कहीं भी पीड़ा हुई है उसे कहीं भी यह अनुभव किया है या उसने कोई चीज देखी है. जो उसको प्रभावित करती है. वो अपनी कृतियों में उसको ढालता जरूर है. लेकिन यथार्थ के नहीं. उसको हम फिक्शन ही कहेंगे अभी थोड़े दिन पहले ही औरंगजेब रोड पर साहित्य कर्मियोएं का पाठ हुआ था. आज भी अनुवाद पर परिचर्चा है लेकिन मेरी थकान ने मुझे यही रोक रखा है. उसमें यही है कि ट्रांसलेशन में क्या प्रॉब्लम्स आते हैं जो आप आज मुझसे यहाँ पूछ रहे हैं. वहाँ पर एक विषय था डज द राइटर हैव ए कंट्री? वहाँ पर एक वियतनामी राइटर आए हुए थे. जो लेडी राइटर भी फ्रांस में वो पैदा हुई थी. उसने कभी वियतनाम नहीं देखा था जैसे कि हमारे लिए वी एस नाइपॉल जिन्होंने कभी भारत नहीं देखा. ये वेस्टैंडीज में पैदा हुए थे. लेकिन मूल तो उनका भारतीय था. इसलिए वे कहते हैं एक किताब में एरिया ऑफ ड्रंक हिंदुस्तान उसके लिए एरिया ऑफ ड्रंक है. उनके लिए हिंदुस्तान क्या था कि उसका कोई पूर्वज उनके लिए एक चारपाई हिंदुस्तान से ले आया था. और एक लोटा ले आया था. उनके लिए वहीं हिंदुस्तान का सिंबल बन गया. अब उन्होंने जैसा आप कहते हैं कि अनुवाद में क्या प्रॉबल्म्स आते हैं? उन्होंने चारपाइ को स्ट्रेन पॉट बताया, जब आपको पता है कि चारपाई स्ट्रेन पॉट नहीं है जिसे हम बांध बोलते हैं या जैसा वो कहते हैं कि ब्रेसज ऑफ ब्रास ए पैशन थे ब्रासलेशन नहीं लोटा होता है. लेकिन अनुवाद करते वक़्त ये जो सांस्कृतिक बदलाव है यही मुश्किल पैदा करती है अब में वियतनामी लेडी थीं उसने वियतनाम के बारे में इमैजीन करके लिखा कभी वियतनाम की जमीन पर वो खड़ी नहीं हुई. वियतनाम में भी फ्रांसीसी लोगों ने राज किया था बाद में उन्हें फ्रीडम मिली इंडिपेंडेंस मिला. जैसा कि हम अंग्रेजों को डिसाटैचमेंट से देखते हैं लेकिन उन्होंने अपने वियतनाम को आजाद कराने में बहुत संघर्ष किया. मगर वियतनाम में उनको कोई नहीं पढ़ता. वो ये कहती हैं कि जो ये मेरे इमैजिनेशन में वियतनाम था मैंने वैसा उसे रचा है. और मैंने लिखा है. उस भी लोग उनको ब्लेम करते हैं. वो मैंने कहा कि राइटर की कोई कंट्री नहीं होती. उसकी कंट्री जो उसका दिमाग होता है उसके भीतर होती है. अगर उन्होंने लिखा है तो उनके लिए वियतनाम बिल्कुल वही था. अत: मेरे विचार से राइटर की कोई कंट्री नहीं होती. जो भी वो लिखता है. जरूर उसके अनुभव से जुड़ती है लेकिन कई बातें ऐसी होती हैं जिसकी वो सिर्फ कल्पना ही कर सकता है उसकी वही कल्पना ही उसका यथार्थ या खत्म होती है. तो हर कृति अपने आप में एक सचली है और कहीं न कहीं एक यथार्थ का पुट अनुभव से होकर गुजरता ही है. दोनों ही देशों के साहित्य में आप इसी तरह से समानता और अंतर पायेंगे और फिर साहित्य तो आखिर साहित्य है. इसीलिए हम साहित्य को आर्ट ऑफ लिविंग कहते हैं उसको इसके कारण कहते हैं चाहे वो फ्रांसीसी साहित्य हो या फिर हिंदुस्तानी. क्योंकि वहाँ पर एक समानता है. वो जो भी लिखते हैं ह्यूमन इमोशन्स के बारे में ही लिखते हैं चाहे, प्रेम, क्रोध, द्वंद्व भी हो या पीड़ा, या उनके देश में कोई महामारी या युद्ध हुआ हो. दो चीज साहित्य में होती हैं फॉर्म और कंटेंट. फॉर्म बदल जाता है कंटेंट नहीं बदलता. यहाँ पर जो बदलता है उससे एक राइटर की क्रिएटिविटी पता चलती है. उसे किस रूप में उस विषय को उठाना है लेकिन विचार तो वही रहेंगे.
ठीक है, आज हम साइंटिफिक युग में रह रहे हैं पहले आर्टिस्टिक युग में रहते थे. इन्होंने जो लिखा वो नारी हुकुमत पर. अभी यूनेस्को ने राइनासिरस लिखा. राइनासिरस एक जानवर है. मतलब उसने देखा कि ये सब राइनासिरस हो जाते हैं नाजी के डर से. तो यह एक काल्पनिक भी और एक सच्चाई भी. हर साहित्य में हर तरह कुछ काल्पनिक और सच्चाई तो होती ही है, जो अनुभव पर आधारित है और अनुभव ही नहीं होगा तो वो लिखेगा क्या? और मैं तो कई अनुभवों से लिखती हूं जहाँ मैंने कई देश देखे. कई देशों में रही, भ्रमण किया. लोगों को समझा है लोगों के साथ रहना सीखा है. बर्दाश्त करना सीखा है, बहुत ज्यादा सीखा है. क्योंकि आज की पीढ़ी और युग में बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं है. तब भी उस जमाने में लोग फ्रांस में मुझे पूछते थे आप को कभी गुस्सा नहीं आता. मैं कहती थी नहीं. गुस्सा करना हमको सिखाया ही नहीं जाता था. हमारे यहाँ लड़कियों को कहते हैं शांत रहो. विक्टोरिया युग के साथ जब वोमेन शुड नेवर बी हर्ड यह कहते थे. और हमेशा जोर से बोलने के लिए मना किया जाता था. आज भी हम ऊँची आवाज में नहीं बोल पाते क्लास में बोलने के लिए ऊँची आवाज में, माइक लगाना पड़ता था. क्योंकि हमें कभी ऊंचा बोलने ही नहीं दिया गया. और बड़ों के सामने ऊंचा बोलना सीखा ही नहीं, हमेशा दबाया जाता था. आज भी हम बहुत सारी चीजें देख कर चुप रहना पड़ता है क्योंकि हमें सबके साथ मिलकर रहना है. इस दुनिया में आप अलग हो थलग हों, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि आप खराब हों. बस ये बर्दाश्त करने की शक्ति है आज नहीं रही इसीलिए इतनी लड़ाईयां हो रही हैं. कभी धर्म के नाम पर आतंकवाद तो कभी युद्ध. जबकि मेरी ही क्लास में एक मुसलमान लड़की है जिसने आजकल रोजे चल रहे हैं बच्चे उसे कहते हैं हाय आज तू पानी नहीं पीएगी? तो वो लगता है जैसे मैं कहती हूं जब आप रहते हो साथ में, वो इंसानियत का देवता बन ही जाता है यही इंसानियत आज हममें धीरे - धीरे खत्म होती जा रही है.
साहित्य तो इंसानियत का प्रतिबिंब है. अब चाहे उसमें धरती फटी हो, ज्वालामुखी हो, महामारी हुई हो, आपात विपदा हो तो ये एक तरह के इवेंट हैं जिन्हें साहित्य की अपने तरीके से दिखता ही है. लेकिन और जो कुछ साहित्य में है वीरता, कायरता, निराशा, सम्मान वो भी हम अनुभव और यथार्थ से ही तो सीखते हैं. इंसानियत और बदतमीजी दोनों तरह की सच्चाईयाँ आपको साहित्य में भी दिखाई देती हैं.
अनिल पु. कवीन्द्र: आप एक चित्रकार भी हैं तो क्या आपने फ्रेंच के कुछ चित्रकारों से या भारतीय चित्रकारों से कुछ प्रेरणा ली.
शीला कार्की: आज भी जब मैं कोई चित्र गहराई से जाकर सोचती हूँ तो हिंदी में ही लिखती हूँ और आपको बताउं ये जो चित्रकारी का मुझे इंसपीरेशन मिला या जो प्रेरणा मिली वो मुझे मेरे पिता से मिली. वो बहुत ही हिंदुस्तानी चित्रकार थे. वो उस समय के चित्रकार थे जिन्होंने मुझे अजंता से प्रेम करना सिखाया. अजंता की मिनियेचर पेण्टिंग के बारे में बताया साथ ही मुझे यूरोपियन पेण्टिंग्स भी दिखाईं लेकिन मेरी जो चित्रकारी है. या तो उनमें मेरे प्रदेश की छोटी - छोटी चीजों का प्रकृति का, वर्णन होता है या फिर स्त्रियाँ उनके रिचुअल्स के चित्र. जंगल के मेरे चित्र हैं और यहाँ पर जो चीज अलग यूरोपियन चित्रकारिता में अलग हैं वो है जीवन शैली. जबकि मैंने यूरोपियन की हिस्ट्री पढ़ी. शायद आज मैं अपने देश की कलाकृतियों को और अच्छी तरह समझ सकती हूं क्योंकि मैं उनका बेहतर तरीके से कंपैरिजन कर सकती हूं. यूरोपियन और मेरी चित्रकारी में बहुत फर्क है. हालाँकि उसे पेण्टिंग मदर मार्गेट ने सिखाई जो कि इटालियन लेडी थी. उसका असर भी मुझ पर नहीं हुआ मैं जो भी आयल पेण्टिंग्स बनाती हूं उसमें जो कुछ भी प्रतिबिंबित होता है वो आम हिंदुस्तानी स्त्री ही है. मैंने मीरा के चित्र बनाए और मीरा से मैं बहुत प्रभावित हूं. जब मुझे वक़्त मिलेगा मैं फ्रांसीसी में भी मीरा पर लिखूँगी मेरे लिए मीरा एक फेमिनिस्ट है. जबकि उस वक़्त में मेरे लिए सीता फेमिनिस्ट थी. कि उन्होंने अत्याचार भी एक हद तक ही सहा. उस समय में जब औरत अपनी आवाज नहीं उठा सकती थी वो अपने उस निश्चय पर चलती रही जिस तरह मीरा जीना चाहती थी जीवन जिया. मैंने मीरा को किसी लीजेंटरी या किसी चमत्कारी की तरह नहीं दिखाना चाहती. मैं उनको एक हाड़ - मांस की स्त्री, जिसने अत्याचार सहा और अपनी संस्कृति के अंदर रहते हुए उन्होंने विरोध किया. उनके लिए सबसे बड़ी बात थी कि वो आदमियों के बीच बैठती थी, परदे के पीछे नहीं बल्कि खुलकर संतों के साथ बैठती थी. जबकि वो राजपूत प्रिंसेस भी राजपूत औरतें थीं. और वो बैठती थी निम्न जातियों के साथ. उन्होंने उस समय में उनकी सोच इतनी डेवलप की थी कि अनटचैबिलिटी नहीं होनी चाहिए. जिसे हम आग कह रहे हैं. कबीर जैसे उसी समय में हुए थे जो कि ब्राह्मण नहीं थे और मीरा ने उसे स्वीकार किया. हो सकता है मीरा के लोगों को ये बात पसंद नहीं रही जिससे वो उनके लिए कुलनासी रही. लेकिन जब कभी कोई चीज इस तरह आक्रांत रूप में सहज भाव से सामने आती है वो जल्दी समाज में स्वीकार नहीं हो पाती. और मैं मीरा को इस रूप में देखती हूं कि वो बहुत ही साहसी स्त्री थीं. जिन्होंने इस तरह से हँसते - हँसते जहर भी पी लिया. इतने महलों की रानी होकर महल छोड़ दिया. दरबार वो फिरीं अपने लक्ष्य के लिए. इस तरह का प्रेम उन्होंने दर्शाया जो कि उन्हें इसी संसार में नहीं मिला. वो प्रेम जिसे वे ढूंढ़ती थीं उन्हें किसी पुरुष में नहीं मिला. उनको भगवान में ही मिला. इसी प्रेम को, विरह का वर्णन इतने सुंदर शब्दों में उन्होंने किया वो खुद उसे गाती भी थीं. और सब कुछ छोड़कर वृन्दावन में जा बसीं. आज भी मेरे मन में हसरत द्वारिका जाने की है. और मेरी एक पोएम है ' मीरा ' जिसमें मैंने इसका विषद वर्णन किया है. कहा है - कि तुम एक महलों की रानी थी, विधवा औरत थी, तुम एक कवियत्री थी और तुममें ये साहस कि समस्याओं की चर्चा पुरुषों के साथ बैठकर खुले आम की. तुम्हें जहर पीने का आदेश दिया गया और उसे पीने के बावजूद तुम जिंदा रहीं लोग कहते हैं कि तुम वृन्दावन में कृष्ण की मूर्ति में समा गई. कौन जाने उस समय की पुरुष शक्ति ने तुम्हें जिंदा गाड़ दिया. ये कोई नहीं जानता. अत: मीरा को मैं एक बड़े कैनवास में जरूर देखती हूं.
© 2009 Sheela Karki; Licensee Argalaa Magazine.
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