इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
आओ चल पड़े हम अज़नबी राहों पर
न तुम ' तुम ' रहो न मैं ' मैं ' रहूँ
ख़ामोश सागर की लहरों के संग खो जाएँ
न तुम कोई शिकवा करना न मैं कोई शिकायत करूँगी
हमारी ख़ामोशी में ही डूबने दो इन लहरों की पुकार
न तुम माझी बनना न मैं साहिल बनूँगी
बीच सागर की लहरों में
डुबा देंगे हम अपनी चाहत
अपनी-अपनी ख़ामोशी के साथ.
इन खिड़कियों को मत खोलो; बंद ही रहने दो
उजालों की इनको आदत नहीं
यहाँ बिखरी ख़ामोशी को मत तोड़ो
हँसी की इनको चाहत नहीं
सदियाँ गुज़र गईं किया नहीं एक किरण ने रुख इधर भी
जानती है वो जलती है ज़िंदगियाँ यहाँ ज़िन्दा लाश की
बरसों गुजर गए इस चार दीवारी में
पर कराती है सुखद एहसास यहाँ की निर्मल शुद्ध हवा
क्योंकि इसके बाहर तो है रक्त रंजित ईर्ष्या और पशुता की फ़िज़ा
अपने ग़मों की दुनिया में डूबे बहुत खुश हैं हम
क्योंकि इस ख़ुदगर्ज़ दुनिया से तो महफूज़ हैं हम
तभी तो कहते हैं
इन खिड़कियों को मत खोलो
यहाँ का मौसम भी बदल जायेगा.
© 2009 Suman Gaur; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: सुमन गौण
शिक्षा: एम. एस. सी. (जीव विज्ञान) एम. एड. पी-एहड़ी. अध्ययनरत.
अनुभव: शिक्षण [ एक जीव विज्ञान लेक्चरर के रूप में 13 साल] रेडियो जॉकी के रूप में कार्य शो विज्ञान वार्ता सामान्य ज्ञान के आधार पर प्रस्तुत किया.
संपर्क: 229, मोती नगर, क्वीन्स सड़क, जयपुर, राजस्थान
आत्मकथ्य: हाई टेक के अग्रणी कॉरपोरेट के साथ एक कैरियर बनाने का इरादा; प्रतिबद्ध और समर्पित लोग हैं, जो पर्यावरण के साथ मुझे पूरी तरह से खुद को तलाशने के लिए और अपनी क्षमता का एहसास दिलाने में मदद करते हैं.