इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
वरयाम सिंह से एक मुलाकत विशाल भारती और अनिल पुष्कर कवीन्द्र के साथ
विशाल: सभी भाषा से हिन्दी भाषा में जो भी साहित्य अनूदित हुआ उनमें से कौन सी कृतियाँ ऐसी हैं जिन्होंने हिन्दी साहित्य में प्रगतिशीलता को नए आयाम दिए?
वरयाम: बात वहीं है- प्रगतिशीलता की बात करें तो भारत में स्वतन्त्रता के प्रति सचेत होना, महिलाओं के अधिकारों के लिए सचेत होना, श्रमिक वर्ग के हितों, अधिकारों के लिए सचेत होना. इसे प्रगतिशीलता कह सकते हैं इस दृष्टि से चलते हैं ऐसा है कि हमारे सामने 19वीं सदी का साहित्य बीसवीं सदी का समूचा साहित्य है. ये क्रमबद्ध रूप में अनुवाद नहीं हुआ. जैसे रूस में क्रमबद्ध रूप में रचा गया मुश्किल यह हैं कि जहां रूसी भाषा में पहले गोगोल , दोस्तोवस्की, तुर्गनेव, टाल्सटॉय गोर्की हैं तो हिन्दी में अनुवाद का क्रम अलग रहा है. अनुवाद में आप देखिए सबसे पहले अनुवाद होने वालों में टाल्सटॉय हैं आप सोच नहीं सकते हैं कि टॉल्सटॉय का प्रभाव पूरे भारत की चेतना में कितना है? गान्धी से उनका पत्र-व्यवहार. जब गान्धी अफ्रीका में थे. यानी गान्धी टाल्सटॉय को पढ़ रहे थे. मैं ये कहना चाहता हूँ. 20वीं सदी के आरम्भ में ही क्रान्ति अभी नहीं हुई. देश स्वतन्त्र नहीं हुआ. गान्धी भारत में नहीं आए. टॉल्सटाय पहुँच गए थे भारत. और गान्धी तो जाहिर है जिसे हम अहिंसा का सिद्धान्त कहते हैं. ये भी बड़ा मुश्किल सवाल है इस पर हम लोग गहराई में नहीं जाते. गहराई में इसलिए नहीं जाते कि राजनीति में अहिंसात्मक तरीकों का प्रयोग पहली बार हुआ. टॉल्सटॉय ने रूस में रखा.
1905 की क्रान्ति जब से असफल हुई तो उस पर कहना था. कि क्रान्ति के लिए भड़काया तो टाल्सटॉय ने. लेकिन जब क्रान्ति हो गई तब टॉल्सटाय पीछे मुड़ गए. किसानों को किसने तैयार किया खुद टाल्सटॉय ने. वो बोलते थे -मैं 12करोड़ रूसी किसान जनता का प्रतिनिधि हूँ. जिसने रूसी क्रान्ति के लिए उन्हें तैयार किया. इसके लिए मान लो पुनरुत्थान पर भीष्म साहनी का एक उपन्यास है जिसे अनुवाद के रूप में अगर ध्यान से पढ़े. तो पता चल जाएगा रूस में टाल्सटॉय किसानों के हित में क्या सोच रहे थे? बाद में तो वो पोलिटिकल राइटिंग में आ गए. लगातार जार की आलोचना. कि टैक्स मत दो, सरकारी सेवा में मत जाओ, ये जो अहिंसा का विचार है. याकि असयोग का कहो, तो बेहतर है. इसे गान्धी ने भारत में बड़े पैमाने पर चलाया. रूस में भले नहीं चला था. 1917की क्रान्ति तो हिंसात्मक क्रान्ति थी और उसके परिणाम आपके सामने है. टॉल्सटाय के इन विचारों को या अहिंसात्मक विचारों को भारत ने अपनाया. ये गान्धी की भूमिका है.
अब रही सबसे बड़ी रचनायें टॉल्सटाय की. तो सबसे पहले में पुनरूत्थान को कहता हूँ. उसके बाद छोटी-छोटी कहानियाँ. जिसने गांधी जी को बेहद प्रभावित किया था. गान्धी जी को जो बेहद पसंद थी . उसमें है पोसली बाला. जो बाद में भीष्म जी के अनुवाद में आई है. लेकिन अंग्रेजी अनुवाद में पहले आ गई थी.
जाहिर है भारत में रूसी साहित्य अंग्रेजी में आया. अंग्रेजी में, हिन्दी में अनुवाद के माध्यम से आया. हिन्दी में तो ये सोच भी नहीं सकते थे भारत में रूसी भाषा जानने वाले पहली बार जे. एन. यू. से निकले वहीं लोग हैं जिन्होंने रूसी से पीछे हिन्दी में अनुवाद किया. और हमारे इस संस्थान की स्थापना 1965 में हुई थी. लेकिन तब तक बड़े पैमाने पर अनुवाद हो चुका था. अब देखिए सबसे बड़े रूसी लेखक क्रुप्रिन. ये जो हिन्दी में वूमन थीम आई. कोठे वाली लड़कियाँ करके. 'यामा द पिट 'की वैश्याओं पर है ये उपन्यास. वो इतना लोकप्रिय हो गया कि ये थीम हिन्दी साहित्य में चल पड़ी. तो सबसे बड़ा लेखक मेरी नजर में मैं समझता हूँ 'कुप्रिन '. उसके बाद गोर्की. टाल्सटॉय अपने महान दार्शनिक विचारों, राजनीतिक विचारों का व्यक्ति. लेखक तो खैर बाद की बात है. वो तो हैं ही महान लेखक.
आश्चर्य की बात है कि 'कुप्रिन 'कोई इतने बड़े लेखक नहीं थे. लेकिन वूमन थीम ने कुप्रिन को बहुत लोकप्रिय बनाया. ज़ाहिर है अंग्रेजी के माध्यम से आया. कुप्रिन को उन दिनो बहुत लोग जानते थे. खैर गोर्की तो आए अपने श्रमिक आन्दोलन के साथ. गदर जो उनका पहला उपन्यास था वो पहले-पहल अंग्रेजी में आया. रूसी में नहीं छपा पहले. आप लोगों को मालूम होना चाहिए सबसे पहले अंग्रेजी अनुवाद में छपा था. रूसी में उनके बाद छपा. तो गदर उपन्यास अनुवाद के जरिए ही हिन्दी में आया. यहाँ पहली बार जब मजदूर आन्दोलन की जो थीम आई हिन्दी साहित्य में, वो गोर्की की बदौलत आई. यानि पहली बार साहित्य में श्रमिक का चित्रण तो रूसी भी कर रहे थे. लेकिन श्रमिक स्वयं मुख्य नायक बनता है. वो तो गोर्की लाए. 'माँ 'उपन्यास में. या दलितों के बारे में जैसा लोग कहते हैं कि दलितों के बारे में बहुत लोग लिख चुके हैं. पर कहना ये है और इससे सहमत भी होना चाहिए. कि असली में दलित लेखक, दलित लेखन या दलित रचना को दलित लेखक ही केन्द्र में ला रहा है. यानि जो वास्तव में दलित हैं. एक है सहानुभूति का लेखन. टाल्सटॉय किसानों के लिए श्रमिकों के हक के लिए कितना चाहते हैं, लेकिन खुद टॉल्सटाय जमींदार थे. ठीक है तो पहली बार साहित्य में श्रमिक एक मुख्य नायक के रूप में आता है. तो वो गोर्की है. गोर्की से पहले किसानों, श्रमिकों के प्रति एक सहानुभूति का रवैया रहा. यहाँ गोर्की ने कहा करूणा नहीं चाहिए, सहानुभूति नहीं चाहिए. यहाँ वो कहते हैं कि नहीं, अब हम आ गए हैं अब अपने नियम का खुद रचेंगे तो इस तरह से मैं कह रहा हूँ कि प्रगतिशील आन्दोलन की जहाँ बात आती है. वहाँ पर गोर्की प्रमुख है. और ये आश्चर्य की बात नहीं है कि जब गोर्की की मृत्यु हुई. तो उस मृत्यु सभा में जो मींटिग हुई थी. स्वयं प्रेमचन्द उनमें शामिल हुए थे. जबकि प्रेमचन्द स्वयं बीमार थे. यानि इतना लगाव रूसी साहित्य में.
हिन्दी साहित्य को जितना प्रभावित रूसी साहित्य ने किया है. उतना कोई दूसरा साहित्य नहीं कर सका. नाम तो मैं बहुत सारे ले सकता हूँ फिर चेखव् आए. जिसको हम आलोचनात्मक यथार्थवाद की परम्परा कहते हैं. या दोस्तो वस्की, कुप्रिन, ये सभी बड़े लेखक हैं. 'इंस्पेक्टर जनरल 'कहानी तो छोटे-छोटे इलाकों की स्थानीय बोलियों में अनुदित हुई हैं. फिर गोगोल आए.आखिर इससे बड़ा क्या प्रभाव चाहिए.
इसके बाद 20वीं सदी आती है गोर्की के बाद पास्तरनाक, जब नोबल पुरस्कार मिला उनको 'डॉ. झिकागो पर '. और उसकी बड़ी आलोचना हुई. पास्तरनाक को प्रतिक्रियावादी से लेकर क्या कुछ नहीं कह डाला. उस कठिन समय में याद रखना चाहिए. पास्तरनाक उस कठिनतम समय में नेहरू की तरफ देखते हैं. नेहरू ने बात की कि इस पुरस्कार को लेने से मना मत करो. वो दीक्षा में उस वक्त रह रहे थे और कहते थे कि एक नेहरू हैं जिस पर मैं विश्वास कर सकता हूँ यह एक बड़ी बात है. पास्तरनाक भारत आ गए. क्योंकि सी. आई. ए. का सिक्का चल रहा था भारत में. उस वक्त एक परिमल संस्था भी हुआ करती थी. नेहरू को लगता था कि ये अमरीकी पैसे से संस्था चल रही है. ठीक है. तो दखल था, बेहद ज्यादा दखल था अमरीकी पैसों का यहाँ भारत में. प्रगतिशील वालों के खिलाफ माना जाता है तो डॉ. जिवागों का वो स्मॉनार्ड अनुवाद था. लेकिन कोलड़ वार का जो पीरियड है. उन दिनों पश्चिम की रूचि सोवियत विरोध में थी. कुछ ने कहा कि सोवयित विरोध को, प्रोत्साहन दो. और जो पुरस्कार था. उसे भी ऐसे ही देखा गया.
ये बात अलग है कि वो पुरस्कार सोलोखोव को भी मिला. सोलोखोव को जिस उपन्यास के लिए पुरस्कार मिला. वो तो रूस में ही छपा था. और बेहद लोकप्रिय थी तीखी. .दोमरे. इस तरह जिन कविताओं के लिए ये पुरस्कार मिला सभी बड़े नाम हैं. लेकिन हैं. एक नाम हम भूल गए कविता पर तो मायाकोवस्की का जबरदस्त प्रभाव पड़ा. मायाकोवस्की का अनुवाद तुरंत हुए और वामपंथ के लिए तो मायाकोवस्की से बड़ा कोई लेखक नहीं. हालाँकि सोवियत संघ के टूटने के बाद इतिहास का पुनर्मूल्यांकन होने लगा. मायाकोवस्की पर कीचड़ भी उछलने लगा. ये तो चलता रहा है, चलता रहेगा. जैसे पूरे लेनिन पर कीचड़ उछाला जाता रहेगा. लेकिन जैसा कि लेनिन अपने में केवल राजनीतिज्ञ नहीं थे. बहुत बड़े दार्शनिक थे. इसी तरह अपने-अपने आदर्श स्वयं चुनते रहेंगे लोग.
विशाल: आपने रूसी भाषा की किन रचनाओं को अनुवाद हेतु चुना. और क्यूँ?
वरयाम: ऐसा है - मेरा पहला अनुवाद जो है या कहें कि अनुवाद का मेरा पहला प्रयास उन दिनों हुआ जब सोवियत के कुछ अलग-अलग प्रान्तों और हमारे देश के अलग- अलग प्रान्तों के बीच कुछ मैत्री सम्बन्ध थे. जैसे भारत, मास्को, दिल्ली, उजबेकिस्तान, पंजाब, जुडे हुए थे प्रान्त. तो उस तरह हिमाचल एशिया एक छोटा सा प्रान्त है जहाँ लड़ाई हुई थी दो साल पहले. आपको याद होगा. वो एक पहाड़ी प्रान्त है. तो दो प्रान्तों को जोड़ा गया. यहाँ से डेलिगेशन उस प्रान्त पहाड़ी प्रान्त में जाते थे. और वहाँ से डेलिगेशन यहाँ हमारे प्र्रान्त में आते थे. वहाँ से एक डेलिगेशन आना था हमारे यहाँ, तो हिमाचल से एक पत्रिका निकलती थी हिमाचल जनता. उस मौके पर उन्होंने कहा कि हम एक विशेषांक निकाल रहे हैं. वहाँ के कवि हैं उनके अनुवाद कर दो मैंने अनुवाद किया , कोस्ताखोव गोराचेव के बाद में पूरी पुस्तक आई वो. पहला प्रयोग मेरा यहाँ से शुरू हुआ. कोई अनुवादक बनने की हम सोच नहीं रहे थे तब. लेकिन मुझे अच्छा लगा. वो कवितायें वहाँ पढ़ी गईं. उन्होंने आगे कुछ अनुवाद दिए और फिर तो चलता गया क्रम. अगला अनुवाद मेरा अलेक्सान्द्र ब्लाक का है. उस को मैंने यहीं अनुवाद किया उस वक्त सम्पत महापात्रा जो आजकल एन. डी. टीवी उड़ीसा के चीफ हैं. उन्होंने तस्वीर बनाई. उदय प्रकाश ने पहले उसका रिव्यू लिखा. ये खुद मैंने टाईप की थी और उसे साइक्लोस्टेप करके बाँटा था.
1975की बात होगी. लेकिन पूरा संकलन 80में आया. और वो खूब चला. और फिर जैसा अनुवाद में होता है कि वो आपको कभी पूरा सन्तुष्ट नहीं कर सकता. उसमें कमजोरियाँ तो नज़र आती रही हैं. ये उन्हें ही समझ आती हैं जो अनुवादक हैं, पाठक जो हैं वो इस चीज को नहीं महसूस कर पाता. ये अनुवादक ही जान पाता है कि इस शब्द की जगह मुझे कोई और शब्द रखना चाहिए था. कठिनाई बहुत है. हिन्दी में अनुवाद करना आसान नही है. इसलिए कि हमारे पास बहुत सारे समनार्थक शब्द हैं. 'पानी 'के लिए कितने शब्द हैं हमारे पास. जैसे गंगा का पानी नहीं बोलते हैं, गंगा-जल बोलते हैं. ठीक है न, आतिशबाजी शब्द हैं. उसमें आतिश तो आ गया. हिन्दी में लेकिन मूल रूप में वो अरबी या फारसी का है. आग है, अग्नि है, लेकिन आग अपनी जगह पर रहेगी, अग्नि अपनी जगह पर रहेगी. अलाव अपनी जगह पर रहेगा. ये सभी अलग-अलग हैं एक स्तर पर. 'मनुष्य 'ये जो शब्द है उसे यहाँ बड़ी समस्या हो जाती है. रूसी में एक ही शब्द छिला. .इंसान, मनुष्य, मानव, तमाम शब्द हैं हिन्दी में. रूसी में ऐसा है कि किस काल की किस पृष्ठभूमि की रचना का अनुवाद आप रहे रहे हैं. गाँव की भाषा, गाँववालों का माहौल का अनुवाद उसी तरह से होगा. शहर, शिक्षित, अनुशासित.
अलेक्सान्द्र ब्लॉक 19वीं. 20वीं सदी के सन्धि काल के कवि हैं, ठीक है. रूसी में एक परम्परा रही है कि उन्नत कवि उच्च शैली बोला जाता है इसको. उसमें जो प्रयोग हुए शब्दों के, उसे श्लाग्भाषा के या श्लागभाषी बोला जाता है. जैसे हमारे यहाँ संस्कृतनिष्ठ शब्द हैं. छायावादी कविता में कहाँ के शब्द हैं ज्यादातर? आप ही बताईए. इधर तत्सम है. ठीक है न. उधर आएँगे तो तदभव है. उधर आएँगे आप तो आम बोलचाल के समीप कविता आ गई है. उसे क्मौवदमजप्रंजपवद बोलते हैं कविता का. ब्लॉक उस काल शब्द के कवि हैं जो आना तो चाहते हैं हमकर जनभाषा के. लेकिन कविता की परम्परा में वो 19वीं सदी की कविता परम्परा से जुड़े हुए हैं. मान लो एक शब्द आता है. 'छीलो '.एक है लोफ. छीलो शब्द होता था माथे के लिए, शीर्ष के कपाट के लिए. लेकिन 'छीलो 'उच्च, श्लाग भाषा का है. उसका अनुवाद काल, ललाट, करेंगे, उसे 'माथा 'अनुवाद नहीं करेंगे. लोफ आएगा तो समझिए इधर का हो गया माथा. इस तरह जब कई लोगों के मैंने अनुवाद किए तो लोगों ने कहा कि यार ये क्या तुम पड़ गए तत्सम के चक्कर में. मैंने कहा नहीं उसका अनुवाद ऐसे ही होना था. एक शब्द भद्दा था वो एक लम्बी कविता क्रान्ति को समर्पित है उनकी 'वे बारह '. उसमें एक शब्द आता है वो है रूस. रूस स्त्रीलिंग में चलता है देखना. भारत हमारा पुल्लिंग में चलता है. रूस व्याकरण के लिहाज से स्त्रीलिंग में. लेकिन भारत को माँ के रूप में लिया उन्होंने. इस देश को एक स्त्री के रूप में. कैसी स्त्री. गरीब, अस्वस्थ ,..जो भी.
एक शब्द 'तोल्स्ताजाद 'आया जिसके कूल्हे बड़े-बड़े हों. ये तो शब्द नहीं बना, कविता के लिए. तो हमने अनुवाद ही नहीं किया इसका. कि ये क्या मातृभूमि रूस. और आप उसे कहें कि बड़े-बड़े कूल्हों वाली स्त्री.उस समय शिवानी जी मास्को गई थीं. हिन्दी की लेखिका हैं. वहाँ से लौटीं तो उन्होंने अपना यात्रा संस्करण लिखा. दूसरी स्त्रियों के बारे में भी लिखा तो शब्द उन्होंने प्रयोग किया 'गुरूनितम्बनी. तो देखिए कि बात बन गई. भाषा स्रोत कितने सारे हैं. ये
चूँकि भाषा की कठिनाईयों के मामलें में बात चल रही हैं. भाषा के मामलों में बहुत ही संवेदनशील आपको होना होता है. आप बताइए कई लोग ये कहते हैं कविता का अनुवाद ऐसे होना चाहिए कि लगे ही नहीं यह कि अनुवाद है. क्यूँ नहीं होना चाहिए? ये डाईबेक्टिक्स है आपको एक तादात्मय स्थापित करना है, और हाँ आपको यह ध्यान रखना भी है कि आप हिन्दी कवि को नहीं, बल्कि रूसी कवि को पढ़ रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद बहुत लोग अनुवाद के मामले में ऐसा नहीं करते. यही भाषा के प्रति पाठक के रूप में एक सचेत पाठक होता है. तमाम पाठक तो यूँ ही टिप्पणी देना शुरू कर देते हैं, जैसे हिन्दी में मान लीजिए आपका एम. ए. या पी.एच. डी हैं तो ये समझने लगें कि आप साहित्य के विद्वान हैं. ठीक है आप अपने शोध विषय में पारंगत हो सकते हैं, लेकिन साहित्य की तमाम जो विधायें हैं उनमें तो सम्भव नहीं है. किन्तु आपको लग सकता है कि साहित्य का होने के नाते अपनी राय देना जरूरी है संवेदना के स्तर पर.
इस तरह ‘ब्लॉक’ से हमने बात शुरू की. 1980 में उनकी 100 वीं वर्षगाँठ मनाई जा रही थी. और अब जबकि १२५ वी वर्षगाँठ पड़ी थी तो हमने मनाया. 125वीं वर्षगाँठ सन 2005में. हमने उनका एक बड़ा संकलन निकाला. पहले सन 1980 वाले खण्ड में जो कमियां रह गई थीं. वो मैंने यहाँ हटाईं. पर नई कविता के अनुरूप जो कुछ कमियाँ थीं. वो शब्द कुछ फिर रह गए आगे के लिए. इस लिहाज से ब्लॉक मेरा प्रिय कवि रहा और आज भी है. उसके बाद तो बहुत सारे अनुवाद किए. शुरूआत यकीनन ब्लॉक से हुई. उसके बाद मैं मायाकोवस्की की क्रान्ति से पहले की कविताएँ जोकि जबरदस्त कवितायें हैं. क्रान्ति के बाद दूसरा स्वभाव, दूसरा स्वर कविता में आ गया था. उन सभी को अनुवाद करने का प्रयास किया.
विशाल: ऐसा माना जाता है कि अनुवाद करने के पूर्व आपकी कुछ पूर्व अवधारणायें भी होती हैं रचना या साहित्य को लेकर. आपने किस चीज को देखा अनुवाद करते हुए?
वरयाम: ऐसा है कि यदि बात अलेक्सान्द्र ब्लॉक की करें तो मैं इन पर पी-एच.डी करना चाहत था. एक शोध का कारण तो निहित था ही, दूसरी बात जो हमारे अध्यापक थे वो ब्लॉक भक्त थे. जाहिर है जिस कवि को वो पढ़ाते थे. उनमें ब्लॉक उनके प्रिय होने के कारण बड़ी तल्लीनता से उनहोंने पढ़ाया और हम लोगों में रूचि पैदा की. फिर उनके जीवन की कहानी भी बहुत रोचक थी, बहुत ही रोचक. उसके बाद ब्लाक का त्रासद जीवन जिसमें 1917 की रूसी क्रान्ति. लेखक लोग रूस से भाग खड़े हुए. थोड़े से लोग बचे थे. उनमें से ब्लॉक भी थे. लेकिन ब्लॉक अभिजात्य वर्ग से थे और वहाँ तो देख रहे थे कि पीटसबर्ग में, राजधानी में क्या हो रहा है? मकान जल रहे थे, भोजन की कमी, आदि-आदि. ये सब कुछ तो देखा ही नहीं था उन्होंने, कि ऐसा भी कठिन समय आएगा. वो अस्वस्थ पड़ गए और बीमारी की हालात में मर भी गए. गोर्की ने बड़ी मदद करने की कोशिश की थी.
1905 के पहले जो क्रान्ति हुई. गोर्की पर बड़े हमले होते थे. प्रतिक्रियावादी प्रेस था. तब गोर्की के पक्ष में ब्लॉक खड़े हुए थे. जबकि वो दूसरी पृष्ठभूमि के थे. प्रतीकवादी आन्दोलन से जुडे हुए थे. प्रतीकवादी आन्दोलन रूसी साहित्य में यथार्थवादी विरोधी आन्दोलन था. यानि प्रगतिशीलता के विरोध में. यानि पुराने जारशाही को बनाए रखने के पक्ष में. लोकतान्त्रिक आन्दोलन के साथ एक यथार्थवादी आन्दोलन जुड़ा था. जिसमें गोर्की वाला ग्रुप बहुत बड़े पैमाने पर संचालक भी था. लेखकों को संगठित किया. पब्लिकेशन हाउस स्थापित किए. और लेखकों को उचित पारिश्रमिक भी दिया. छोटी-छोटी चीजें हैं ये. वो लेखकों को अपने घर में बिठाए रखते थे. लेखकगण महीनों-महीनों उस घर में बने रहते थे. यादों के वर्णन में एक पुस्तक है उसे दोबारा आजकल में पढ़ रहा हूँ. तीसरी बार पढ़ रहा हूँ. उनके घर में 8'10 से कम तो कभी मेहमान ही नहीं होते थे. कैसे चल रहा था सब कुछ? और उनके पास दूसरा कोई व्यवसाय भी नहीं था. वो सभी लेखक अपने पारिश्रमिक पर ही जीते थे. बात यह है कि रूस में पढ़ा जाता है बहुत, किताबें बिकती हैं बहुत, लेखकों को पारिश्रमिक मिलता है बहुत. मान लीजिए आप हिन्दी के श्रेष्ठ कवि हैं लेकिन आप व्यवसाय लिखेंगे पत्रकार या कुछ और. क्योंकि लेखन तो व्यवसाय है ही नहीं आपका. पेशा तो तब होता लेखन जब दूसरी चीज पर निर्भर हैं ही नहीं अपनी रोजी रोटी के लिए. लेकिन रूस में लेखक दूसरी चीजों पर निर्भर नहीं रहते. मेरा एक दो प्रकाशन से सम्बन्ध था जैसे प्रगति प्रकाशन, रादुगा प्रकाशन. वहाँ ऐसे ही लोग काम करते थे. उसके एक संकलन में मेरा एक अनुवाद पर लेख छपा. अनुवाद कितना पेज रहा होगा ज्यादा से ज्यादा पन्द्रह पृष्ठों का था. तो उन्होंने साहित्य अकादेमी के माध्यम से पाँच हजार रूपये पारिश्रमिक भेजा. ये सन ८५ की बात है. एक लेख पर ये रकम काफी ज्यादा थी. आज भले ही रूस में कड़की के दिन हैं लेकिन लेखक फिर भी लेखक हैं. वो पूरे देश की यात्रायें करते हैं. जैसे ब्लॉक मेरे पसन्दीदा कवि रहे हैं. इनके पाठ करने के विशेषज्ञ हैं हम, जैसे उन्होंने कहा कि आज अलेक्सान्द्र पुश्किन की कविताओं का पाठ फलाँ करेंगे. तो उसके लिए बाकायदा टिकट हैं. हॉल भरे होते हैं. यकीनन ऐसे में फिर उनका बेहतरीन रचना पाठ होगा. उनके जीवन के कुछ रोमांचक किससे सुनाए जाएँगे. उनकी रचनायें सुनाई जाएँगी. लेकिन बहुत बड़े कवि हुए हैं मायाकोवस्की. अगर अपनी रचनाओं में शहर को भविष्य बताते थे कि शहर ऐसा होगा. टेक्नोलोजी भविष्य होगी. इसलिए उनको बोलते हैं भविष्यवादी कवि.
उनसे ठीक विपरीत दूसरी धारा के कवि सिगेयेसेनियन गाँव के कवि. उजड़ता हुआ गाँव, उनकी विषय-वस्तु है. ज़ाहिर है आप गाँव के बारे में लिखेंगे तो किस-किस चीज के बारे में लिखेंगे. गाय है, गाँव की छोटी सी मस्जिद है. बैल, है, घोडा है, छोटी सी नदी है बगल में. या छोटा सा पहाड़ है, कब्रिस्तान है. ये उसकी विषयवस्तु होगी. लेकिन बात तो अपनी कहेंगे. कहेंगे न? तो एक समय में एक धारा के मायाकोवस्की जितने बड़े कवि. ये दूसरी धारा के उतने ही बड़े कवि. उजड़ते हुए गाँव के कवि. विदा लेता हुआ गाँव और उसका कवि. इतने लोकप्रिय और लोकप्रिय कवि. मान लो उस कवि का मैं हिन्दी अनुवाद करूँ तो मुझे शब्द तो गाँव वाला ही लाना पड़ेगा. ठीक है न? वो उसी का जिक्र कर रहा है. जब मायाकोवस्की का अनुवाद करेंगे तो आपको दूसरी शब्दावली लानी पड़ेगी. शहरी, शुशिक्षित टेक्नोलॉजी वाली. इधर गाँव है क्योंकि ज्यादातर तो वो गँवार लोगों के बारे में लिख रहा है. प्रेम नहीं प्रीत कहेगा. गाँव के लोग कवि नहीं बोलते. ठीक है न. .अपनी लोक भाषा का प्रयोग करेंगे तो इस तरह से जैसे आज के बहुत बड़े कवि हैं 'रसपूतिन '. जब भारत आए थे. यहाँ जे. एन. यू. भी आए थे. बहुत बड़े लेखक हैं. पाण्डे जी ने उनके अनुवाद किए हैं. साहित्य अकादेमी से उनका बड़ा संकलन निकला है. उसमें हैं 'अन्तिम कड़ियाँ '. माल्योरा से बिदाई. 'आग 'करके पींजरा तक उपन्यास है. वो सब कुछ तो गाँव के जीवन के बारे में है गाँव के बारे में अगर आप बात करेंगे तो शब्दावली भी वहीं से आनी चाहिए.
इसी तरह से गोर्की की एक रचना मैं चाहता हूँ कि आप लोग पढ़े. 'तलछट ' नाम से एक अनुवाद नाटक के रूप में हैं. आज भी चल रहा है. 1904 का लिखा हुआ है. दुनिया भर के रंगमंच उसे कर चुके हैं. एन. एस. डी. भी यहाँ उसे कर चुका है. उसमें तरह-तरह के लोग हैं. कई लोग हैं जिन्हें तलछट कहते हैं, जैसे पानी के नीचे गन्ध की परत होती है. समाज के तलछट याने नीचे तबके के लोग. उसमें कोई चोर है, कोई उच्चका है, कोई डाकू है, कोई जुआ खेलने वाला, कोई कुली है. उनके बीच एक आदमी है जो कि कहता है मैं तो पोस्टमास्टर हुआ करता था. यानि सुशिक्षित. वो कहता है अपने इन साथियों से कि तुमको पता नहीं है मैं बिस्तर में कॉफी पिया करता था. तुमको क्या पता? उसमें एक एक्टर भी है. अरे तुमको क्या पता, जब तालियों की गड़गड़ाहट होती है. तब आदमी क्या करता है? इस तरह से कई तरह के चरित्र हैं. रूसी में मूल लेखक ने तो हर एक की भाषा अलग रखी है न. तो ऐसे में अनुवाद वाला क्या करे? एक ही शब्दावली का प्रयोग कैसे कर सकता है कोई अनुवादक. उसे भी हर एक की भाषा का विशेष तौर तरीका खोजना पड़ेगा. ये काम कठिन है. अगर कोई रूसी गलत बोल रहा है. उसे अनुवाद करते हुए हिन्दी भी गलत बोलते हुए दिखाना पड़ेगा. मानक रूसी थोड़ा ही हर कोई बोलता है. उसी तरह से मानक हिन्दी हर कोई थोड़े ही बोलता है. लेकिन कई अनुवाद में हम देखते हैं कि इस तरह के प्रयोग भी मानक हिन्दी में अनूदित कर देते हैं.
मेरा कहना है कि उन शब्दों का ध्यान रखो भाई. इस तरह से अनुवाद की कई बड़ी समस्यायें हैं. लेकिन जो बात चली थी कि ब्लॉक के बाद पुश्किन का अनुवाद प्रयोजित रूप में चलता रहा. साहित्य अकादमी ने कहा पुश्किन की 200वीं वर्षगाँठ पड़ रही है. आप अनुवाद करो कुछ. मैने कहा कर देते हैं, तो मरे पास एक संकलन है यहाँ. उसी तरह से 'सेतिमा 'एक छोटा प्रान्त है जैसा मैंने आपको बताया, मैं जब वहाँ गया. वहाँ कवि लोग मिले, बहुत अच्छा लगा. कहने को तो भारत 100 करोड़ आबादी वाला देश है लेकिन रचनायें यहाँ 100 से ज्यादा नहीं छपतीं. वो समझते हैं कि हमारा कवि हिन्दी में अनुदित हो गया तो बस हो गया. जैसे मान लो रसुगुमजतोव अवार भाषा का दागिस्तान का कवि है. कितने लोग बोलते होगें उस भाषा को? चार लाख. लेकिन उसके अनुवाद पहले रूसी में होते हैं. फिर सोवियत संघ की सब भाषाओं में होते हैं. उसके बाद हिन्दी में होते हैं. मेरा दागिस्तान दो खण्ड हैं उसमें सबसे लोकप्रिय कोई रचनाकार है तो वो रसूलगमजातोव है. किस भाषा का लेखक, अवार भाषा का. बोलने वाले उस भाषा को चार लाख भाषी. लेकिन दुनिया भर में गमजातोव लोकप्रिय हैं. आए थे वो यहाँ. उन्हें लगता था कि अगर मेरी कवितायें यहाँ छप गईं तो मेरा मोल करोड़ों में हो गया. मैंनं कहा, अरे भाई 1100 प्रतिमाँ छापीं हैं राजकमल ने. इस तरह सेतिया की कविताओं का अनुवाद किया.
'किरगिस्तान 'एक स्वतन्त्र देश है. उनके महाकाव्य की हजारवीं वर्षगाँठ मनाई गई. तो प्रस्ताव आया - आई. सी. सी. आर. से, क्योंकि कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका था. भारत इसमें पीछे रह गया. इसका एक डिप्लोमेटिक आस्पेक्ट भी होता है. मुझसे पूछा इसका अनुवाद करोगे. मैंने हाँ कहा. पहले मुझे किरगिस्तान ले गए. फिर जैसे मानस उनका भगवान एक केन्द्रीय चरित्र है. उन जगहों पर ले गए. और जो लोक गायक हैं वो अभी जिंदा है. वो लोक कथा गाकर सुनाते हैं. उनसे मिला. फिर एक महाकाव्य दिया गया चूँकि वो तो बहुत बड़ा है. वो रामायण और महाभारत से भी कहीं बड़ा जिसका एक एक अंश भी बहुत बड़ा है. मैंने उसमें से कुछ अंश चुने जिसमें मनुष बहुत प्रसन्न है एक अंश छपा और फिर उनको भी बहुत अच्छा लगा. पहली बार मैं यूँ ही चीजें समझने गया था. एक वर्ष बाद फिर गया जब उसका लोकार्पण हुआ. चूँकि वो एक बहुत छोटा देश है उनको बहुत खुशी होती है कि हमारा महाकाव्य देखिए अब भारत भी पहुँच गया. खुद राष्ट्रपति ने पदक दिया इस अनुवाद के लिए. खूबसूरत तो है ही जितना खूबसूरत किरगिस्तान है. मैं तो स्विटजरलैंड भी देख रहा हूँ. बगल का प्रान्त है. जैसे दिल्ली से काश्मीर है. वैसे ही 2 घंटे में आप वहाँ भी पहुँच सकते है. इस तरह से अनुवाद की प्रक्रिया चलती रही.
सबसे बड़ा मेरा अनुवाद जो है, जोकि मुझे परेशान कर रहा है क्योंकि मैंने अनुवाद तो किया है. मुझे चाहिए था कि हर कविता पर लम्बी टिप्पणियाँ देता. क्यूँकि उस अनुवाद पर कोई भी एकआध समीक्षा आई. आप पूछिए कि ज्यादा समीक्षायें क्यूँ नहीं आई, क्योंकि कविता किसी के पल्ले ही नहीं पड़ी. वैसे तो वे पिछली शताब्दी के पूर्वाध के कवि हैं लेकिन मैं उसको सही अर्थों में 21वीं शताब्दी का कवि मानता हूँ.
ये जो आज पर्यावरण चेतना की बात चल रही है. कठिनाई ये है कि हमारे वामपन्थियों के बीच इसे गम्भीरता से नहीं लिया गया. समस्या तो ये है यहाँ- या तो इसलिए नोटिस उन्हें नहीं लेते, क्यूँकि आठ साल वो कैद रहे. स्टालिन के वक्त. इसका मतलब आप तो कम्यूनिज्म विरोधी रहे. जबकि यह कठिन है क्म्यूनिज्म के विरोधी. हाँ वो एक अर्थ में यूटोपियन थे. किस अर्थ में यूटोपियन थे. उनहोंने कहा 1917 में देखिए कि क्रान्ति हुई. ये मनुष्य जाति के लिए एक महान विकास की घटना थी. ये केवल मनुष्य जाति का विश्वास ही नहीं, बल्कि पूरे प्राणी जाति का विकास का क्रम था. पहली बार मनुष्य. मनुष्य के शोषण से मुक्त हो रहा है. लेकिन वो कहते हैं यहीं नहीं रूकना चाहिए हमें.
स पृथ्वी पर जितने भी प्राणी हैं- सबको जीने का अधिकार है. तो घोडा हमारा बोझ क्यूँ ढोए भाई? गधा हमारा बोझ क्यूँ ढोए? समझ गए न. और ये काम मनुष्य ही करेगा और अपने विकास क्रम में एक दिन वो इनको भी मुक्ति दे देगा. नहीं, तुम हमारा बोझ नहीं ढो. तेरा भी इस पृथ्वी पर रहने का उतना ही अधिकार है. ले देकर आज यही बात हो रही है न. कि मनुष्य ने आज अतिक्रमण कर दिया. बहुत समय तक मानव केन्द्रित चिंतन रहा. एक दृष्टि ये रही कि मनुष्य ही श्रेष्ठ है.
हिलेरी जब एवरेष्ट पर पहुँचे तो उन्होंने कहा कि मनुष्य ने एवरेस्ट पर विजय प्राप्त की. नहीं, मैं नही मानता इस विचार को. कोई किसी पर विजय नहीं प्राप्त कर रहा. ठीक है न मनुष्य केवल वहाँ पहुंचा है. ठीक है, इसमें विजय कैसी? तुम एवरेस्ट पर कब्जा करने के लिए गए थे क्या? ये समझ रखने वाले उस समय और लोग भी थे. कि असली काम तो अब शुरू हुआ जब सारा प्राणी जगत अपनी बराबरी समझ लेगा तब है असली जीवन. तब ये था कि मनुष्य की ये जो चेतना है भौतिक जगत में सबको मिले. आखिर प्राणी जगत तुमको भोजन दे रहा है. तेरा काम है उसके बारे में सोचना. माँस खाते हो न, वहाँ से नहीं आया मांस क्या? जूते पहनते हो. उन्होंने दिया तुमको भाई. ताकि तुम उनकी तरफ से लड़ सको. उनके हित में कुछ सोच सको. जैसे श्रमिको ने आपका मकान बनाया. तो कुछ उनके मकान के बारे में सोचो. वो बाहर रहेंगे क्या? घर से बाहर रहेंगे क्या? तो इस क्रम में ये सोच, एक कड़ी सोच सुनकर आई. इस सोच का कवि है वो, इसी तरह की कवितायें लिखता है वो, ऐसा कवि हिन्दी में तो हुआ नहीं कभी, थोड़ा-थोड़ा केदार जी की कवितायें पढ़ते हुए हम अनुमान लगा लेते हैं कि प्रभाव महसूस हो रहा है. बात आ रही है. अब देखिए - जंगल में शेर. शेर की उपस्थिति ही जंगल को सन्तुलन में रखती है. हिरण हैं, शेर न हो तो बैठे रहेंगे. दौड़ेगे नहीं, बीमार हो जाएँगे. ठीक है. बीमार होकर मर जाएँगे. आगे वो घास नहीं चर पाएँगे. फूल के ग्रोथ में जो वैली ऑफ द फ्लावर्स है. उसमें विकृतियाँ आ रही हैं. क्यूँ आ रही हैं? अब जो लोग कहते हैं कि इधर पशु नहीं चरेंगे. पशु जब चरते थे वो अवांछित सम्पदा. प्रकृति को खा जाते थे. चलते थे और फिर गोबर भी फेंक जाते थे. तो एक सन्तुलन बना हुआ है. गोबर है तो खर- पतवार भी होता था पशुओं के लिए. शेर का होना जरूरी है ताकि उस जंगल के सभी प्राणी स्वस्थ रह सकें. है तो वो सुरक्षा के लिए. लेकिन डर कर जानवर उससे जागते रहे हैं.
आप देखिए कि उसने इस लहजे उन्हें स्वस्थ तो रखा. तो ये सारा क्रम इस तरह से चलता था. इस सन्तुलन को मानव ने बिगाड़ दिया. चलो अब हम सोच रहे हैं - कोपेनहेगेन हो रहा है. कोपेनहेगेन का असर सब जगह पड़ता है. कोई तो बोले कि एक कवि हुआ है रूस में ऐसा जो हम बारे में सोचता है. उसने पहले ही चेताया है हमको. खैर ये सब है.
विशाल: विश्व की वह कौन सी भाषा का साहित्य है जिसमें हिन्दी साहित्य का अनुवाद कर साहित्य की श्रेष्ठता सूची में उसे सर्वोपरि स्थान मिल सकता है?
वरयाम: मैं इस प्रश्न को ऐसे समझाऊँ कि ऐसी कौन सी भाषा है जिसमें भारतीय साहित्य का अनुवाद हो. ताकि वो विश्व साहित्य के समकक्ष आ जाए. ऐसा है कि ये मानना पड़ेगा अंग्रेजी ही वह भाषा है.. कठिनाई ये है कि अंग्रेजी में बहुत कम अनुवाद हो रहा है क्यूँकि अपने यहाँ अंग्रेजी में लिखने वाले लेखक ही बहुत हैं. और अंग्रेजी का जो बाजार है उसमें विक्रम सेठ जैसे लोग छाए हुए हैं. अरविन्द अदीगा हैं, झुंपा लहरी, सलमान रूश्दी हो गए. लेकिन हिन्दी के जो बड़े लेखक हैं उनमें भी जैसे तमाम का अनुवाद हो गया है, नव पुनरुत्थान पर रचा उपन्यास का अनुवाद हो गया. इन्हें पेंविन वाले छाप रहे हैं. धीरे-धीरे ही यह क्रम आगे आएगा. उसका फायदा भी मिलेगा. जैसे छोटी सी भाषा स्तोनियन उसमें तक अनुवाद हो गया. अंग्रेजी ने ही तो खोला वो रास्ता? अब अगर अंग्रेजी में अनुवाद हो तो वो अनुवाद फिर हर देश में जाएँगे. तो इस तरीके से काम हो रहा है. हाँ, पहले रूस में इस तरह का काम खूब होता था. रूस में फिर हिन्दी से सीधे अनुवाद होने लगा. और वो फिर रूसी से अन्य भाषाओं में चला जाता था. जैसे हिंदी के लेखक भीष्म साहनी. इनके बहुत अनुवाद हुए रूसी में. क्यूँकि ये प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े हुए थे. जोकि बहुत अच्छे लेखक थे और फिर रूस में भी जीवन के अन्त समय में रहे. रूसी भाषा भी वो ठीक ठाक जानते थे. तो उनके अनुवाद तुरन्त हो जाते थे. ये तो रही अभी की बात. लेकिन प्राचीन साहित्य तो अपार है. उसे दुनिया भर में फैलाओ, वेदों के अनुवाद किस भाषा में नहीं है. कालिदास के शाकुन्तलम के अनुवाद किस भाषा में नहीं है. रूस में तो उनके अनुवाद के डीलक्स कलेक्शन होते हैं. लाइनें लगती हैं खरीदारों की, पाठकों की. आमदनी प्राप्त है, तो वो अनुवाद हो चुके है. पर बात है आज के अनुवाद की क्या करें ? अब मैं मान लो कि जैसे मुझे फ्रांसीसी नहीं आती, जर्मन नहीं आती, चीनी नहीं आती, दुनिया भर की भाषायें नहीं आती. लेकिन रूसी भाषी होने के नाते हमको सबकुछ मिल जाता है. रूसी में बहुत लोग अनुवाद करते हैं. एक समय में अफ्रीकी साहित्य का बड़ा भारी अनुवाद हुआ. एक अफ्रीकी साहित्यकार अभी जयपुर आए हुए हैं. उनके अनुवाद तो हम रूसी में पहले ही पढ़ चुके हैं. अंग्रेजी में जब उन्हें नोबेल प्राइज मिला, तो वो हिन्दी में भी आ गए. काफी चर्चित हुए. लैटिन अमरीकन कवि हमने रूसी भाषा में ही पढ़े. ये और बात है पाब्लो नेरूदा के बारे में, बड़े कवि हैं. पहले अंग्रेजी में अनुवाद हुए. फिर उनसे हिन्दी में आ गए. दूसरा है स्पेनिश, स्पेनिश भाषा में अनुवाद होने चाहिए. स्पेनी भाषा में अनुवाद होता है. तो आप कई देशों में पहुँच जाते हैं. तीसरा है फ्रेंच. फ्रांस में तो जितने फ्रेंकोफोनी उनके उधर रहे हैं. फ्रांसीसी तो उनको आती है. सबसे बड़ी बात चीनियों से सीखी. गुलशन नन्दा खूब अनूदित हुए. आज नहीं तब. जबकि प्रेमचन्द वगैरह को तो अनुवाद करना ही होता है. चूँकि उन्हें स्थापित करना है. एक तरफ तो अनुवाद खूब हुए हैं. दूसरी तरफ आज अनुवाद में कमी आई है ऐसा भी खूब हो रहा है. आज जैसे रूस में अनुवाद की स्थिति बहुत ठीक नहीं है.
पुष्कर: क्या ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ अनुवादक जाकर बड़े रचनाकार के साथ एक दूसरे से बातचीत कर सकें. कि किन रचनाओं को अनूदित होना चाहिए?
वरयाम: हमारे यहाँ तो ऐसा है ही नहीं. रूस में चूँकि पहले सारा कुछ सरकारी था. तो उनकी प्राथमिकता थीं. दो तरफ से ये प्राथमिकतायें थीं. पहला हमारा कौन सा साहित्य विदेश जाना चाहिए. 19वीं शताब्दी को लेकर कोई समस्या नहीं थी. टॉल्सटॉय खूब अनूदित हुए. 20वीं सदी में जब मामला आ गया क्रान्ति के बाद तो उसमें जो लेखक सोवियत रूसी विरोधी होते थे. वो अनुवाद नहीं होते थे. लेकिन 19वीं सदी का पूरा साहित्य अनुवाद हुआ. इसीलिए भारतीय लोगों को रूसी साहित्य की जितनी जानकारी है. दूसरे साहित्यों की नहीं है. क्योंकि वो हिस्सा बन चुका है. गोर्की को कौन नहीं जानता. चेखव को कौन नहीं जानता. मैं जब 10वीं में पढ़ता था उसमें टाल्स्टॉय की कहानी होती थी. एक आदमी को कितनी जमीन चाहिए? ये तो स्कूल के पाठ्यक्रम में था. धीरे-धीरे टॉल्सटॉय पढ़े गए खूब. बाद में चेखव आए पाठ्यक्रम में. वो तो पाठक को बिल्कुल गिरफ्त में ले लेते हैं. और छोड़ते नहीं है जिन्दगी भर आपको. चेखव तक खूब अनुवाद हो चुके हैं. अब कठिनाई ये है कि बीसवीं सदी में खूब अनुवाद हुए हैं. ऐसा नहीं हैं मैं इसे देख रहा हूँ. अभी मैंने डॉ. झिवागो लिया. एक संस्था है वाग्देवी प्रकाशन है. बड़ा सुन्दर और सस्ते में मुझे मिला. 'रस्पूतिन 'साहित्य अकादेमी प्रकाशन मास्को के साथ 20-20 खण्ड भारतीय और रूसी रचनाकारों के अनुवाद की प्रकाशन होने की बातचीत भी हुई. पाँच भारतीय साहित्य के अंक तो मास्कों से ही छपे. चार खण्ड यहाँ से निकले. उसमें एक खण्ड मेरा भी था. 20वीं सदी की रूसी कविता. पाण्डे जी का इसी मण्डली में एक और खण्ड आया '20वीं सदी की रूसी कहानी '. इस तरह यह काम चल रहा है.
विशाल: 20वीं सदी में अनुवाद किस सीमा तक हिन्दी को एक उदात्त मुकाम तक ले जा सकता है?
वरयाम: मैं आपका प्रश्न ठीक से समझा नहीं. अगर आप ये मानते हैं कि अनुवाद से हमारी भाषा भी विकसित होती है. तो सम्पृक्त रूप से यह हो सकती है. जैसे आज की हिन्दी लगभग अनुवाद की भाषा बन चुकी है. ऐसे छोटे- छोटे मैं जुमले सुनाता हुँ. हो सकता है कि मैं गलत होऊँ. मैं सोचता हूँ कि ये जगह बहुत सुन्दर है. यह व्याकरणिक रूप से गलत वाक्य है. मेरा ख्याल है कि 'यह जगह सुन्दर है 'या 'मेरे विचार में यह जगह सुन्दर है. 'इसमें आप देखें कि 'मैं सोचता हूँ 'यह क्या है? मैं आशा करता हूँ 'यह अंग्रेजी का अनुवाद है. यह भी तो कह सकते हैं कि 'मुझे उम्मीद है '. ऐसे में आप क्या कर सकते हैं. इस तरह से आप विन्यास कहो, वाक्य विन्यास कहो, व्याकरण में हो ऐसा कहिए. आशा करता हूँ 'यह अनुवाद हो गया न. यह हमारी भाषा के अनुरूप ठीक नहीं है पर यह अनुरूप क्या होता है? आप धीरे-धीरे उनके आदी हो जाते हैं. धीरे-धीरे अंग्रेजी का यह रूप अनूदित किन्तु इस्तेमाल में आ जाएगा. और मानक विभाग दो बन जाएंगे. इसको अच्छा कहो या बुरा? ये बात अलग है. जैसे अंग्रेजी अन्य कई भाषाओं की तुलना में चाहे वो सामाजिक,साहित्यिक हो, या विज्ञान या ललित कला से. .या कानूनी दस्तावेजों की भाषा हो. यह अंग्रेजी के ही संकेतों से है. अंग्रेजी भला क्यूँ आगे हैं? सारे स्ट्रक्चर्स उसने अपने में समा लिए हैं. इसलिए सारी बात आप अंग्रेजी में कह सकते हैं. बन गया लचीलापन वाक्य विन्यास, जिसको कहते हैं.
पहले मान लो हिन्दी किस चीज की भाषा होती थी. ये बताओं अवधी में जो साहित्य रचा गया वो क्या था? उसे आप देवनागरी की भाषा कह सकते हैं देव-पाठ कहो, या आध्यात्मिक किस्म कहो. जो लिखित रूप है. धीरे-धीरे उसमें व्यापारिक दस्तावेजों के अनुवाद होने लगे. फिर अन्य से जुड़े साहित्य का अनुवाद होने लगा. फिर धीरे-धीरे रसायन शास्त्र की पुस्तक आ गई. तो भाषा की रचना अपने आप इस अनुवाद के क्रम में बदलती गई और ये काम खड़ी बोली में ज्यादा हुआ. इसलिए खड़ी बोली ज्यादा आगे चली गई. और कोई विरोध नहीं छोटी-छोटी बोलियों से. अब अगर वो आगे चली गई तो आप क्या कर सकते हैं ? जब यहाँ आपातकाल हुआ 73-74में. बलराज साहनी आए थे. उनका भाषण होना था उन दिनों हिन्दी की क्लिष्ठता पर बहुत बात चलती थी. तो उन्होंने एक किस्सा सुनाया. हमारे एक दोस्त हैं 'जॉनी वॉकर ',वो खबरों के बारे में कहते हैं अब आप हिन्दी में समाचार सुनिए. जबकि जॉनी वॉकर कहते हैं कि अब आप समाचारों में हिन्दी सुनिए. एक व्यंग्य हैं ये. अब कोई नहीं बोलता इसको. एक स्वीकार्यता बन गई. हिन्दी की स्वीकार्यता बन गई. और इसलिए बनी कि आप अलग-अलग साहित्यों की भाषा तो बन रहे हैं. अलग क्षेत्रों की भाषा बन ही रहे हैं. अलग-अलग संविधान की भाषा बन रहे हैं. अलग-अलग प्रान्तों की भाषा बन रहे हैं.
साहित्य अकादेमी में 6-7 तारीख को एक सेमिनार हुआ. मुझे एक अपनी पहाड़ी बोली के प्रतिनिधि के रूप में बुलाया गया. और इतना अच्छा लगा मुझे कि असम की लेखिका हिन्दी में बोल रही हैं. अपना लेख हिन्दी में पेश कर रही है. गुजरात का लेखक हिन्दी में लेख पढ़ रहा है. और दलित लेखक मराठी लक्ष्मण गायकवाण हिन्दी में बोल रहे हैं. ये बात अलग है कि अनामिका जी अंग्रेजी में बोल रही थी. कोई आपत्ति नहीं ठीक है. बोलो न भाई. मैं तो यह कहता हूँ कि आप हिन्दी को अपने विमर्श की भाषा बनाओं और अड़े रहो. नामवर सिंह को तो अंग्रेजी वाले भी सुनने आते हैं क्यूँकि उनके पास कहने को बहुत कुछ अभी है. अगर आपके पास कहने को सिर्फ भाषा है जैसा जॉनी वॉकर के पास थी तो किसी को क्यूँ आना चाहिए? सारी बात इसमें है. अच्छा लिखेंगे, अच्छी कविता होगी तो अपने आप अनुवाद होगा. ये बात अलग है कि यहाँ पोलिटिक्स भी चलती है. नहीं अनुवाद होने देना कुछ चीजें. जैसे जयपुर में लेखक सम्मेलन हो रहा है. हिन्दी के कितने कवि हैं वहाँ? ठीक है हम गुलजार पर ठप्पा नहीं लगाते हैं. जावेद अख्तर भी हैं ये फिल्मों के लिए लिखते हैं. ठीक है कुछ अच्छी कवितायें भी हों, पर प्रतिनिधि रचनाकार ये कतई नहीं है हिन्दी के. कैफी आजमी तो थे. बेहद संजीदा और प्रतिनिधित्व करने वाले रचनाकारों में उन्हें शुमार भी किया जाता है. मगर ये बाकी गीतकार. ..आज बड़े ध्यान से मैंने अखवार पढ़ा उसमें अंग्रेजी के लेखक तो शामिल रहे. लेकिन हिन्दी के लेखक वहाँ थे ही नहीं. वो संकुचाते हैं. अपना मेला चलाओ आप लोग प्रगतिशील, जनचेतना के लोगों का, अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन कराओ, और उसमें मंचीय कवियों, लेखकों को आप अलग रखो. बड़े लेखकों का जमावड़ा हो. वो ऐसे ही स्वतन्त्र चिंतन मनन करें. आपके हिन्दी के ही लोग विभागीय परिसर में अंग्रेजी में बोलते हैं. अब आपको कला पर किस भाषा में बात करनी है ये तो खुद ही चयन करना होगा. उसमें कोई बाधा तो है नहीं. आखिर इसमें संकोच क्यों ह?
चाहे अन्तराष्ट्रीय सम्मेलन हो या कोई गोष्ठी, मैं हिन्दी में ही हर जगह बोलने को पसन्द करता आया हूँ और बोलता भी हूँ. यहाँ नारंग साहब मेरा हिन्दी के भाषण का अंग्रेजी में अनुवाद करते थे. मेरा अनुवाद फ्रेंच वाले भी हिन्दी से करते हैं. मैंने साफ तौर पर किसी भी अन्तराष्ट्रीय सम्मेलन के लिए यही कहा कि जिसको मेरा अनुवाद करना है वहाँ मैं जाऊँगा. जबकि अंग्रेजी मुझे भी आती है लेकिन क्यूँ बोलना? व्यवस्था को अपने तरीके से चलाओ. यही मेरा ख्याल है इसी से काफी कुछ ठीक हो सकता है. यह सारी बात इसलिए है कि आपके पास कहने को कुछ हो, कोई मुददा हो, जिसमें दम हो. लेकिन जिन्हें विरोध करना है, वो तो हमेशा ही करते रहे हैं और आगे भी करेंगे. मैं इसीलिए कह रहा हूँ कि हिन्दी समृद्ध हो रही है. हिन्दी बहुत आगे निकल चुकी है. विज्ञान के मामले जरूर ये लगता है कि हिन्दी ऐसे ही अंग्रेजी से आगे नहीं जा सकती. जैसे जापान में पूरा काम जापानी में होता है. और जापान विज्ञान और तकनीकी में बहुत आगे हैं. ये थोड़ी कि अंग्रेजी ही गारंटी है आपकी प्रगति की. ये भ्रम कब का टूट चुका है. रूस भला कहाँ अंग्रेजी पर निर्भर है? सारा काम उनका विज्ञान का अपना चल रहा है. लेकिन हिन्दुस्तान में इस मामले में मैं समझता हूँ कि विज्ञान और तकनीकी अंग्रेजी में ही चलेगी. ये बात अलग है जो लोकप्रिय विमर्श है उसकी भाषा हिन्दी हो गई. राजनीति की भाषा हिन्दी हो गई. तमिलनाडु वाले भी यह जान गए हैं कि यदि प्रधानमन्त्री बनना है तो हिन्दी सीखनी ही पड़ेगी. तो अब खत्म हो गया है विरोध. तमिलनाडु में किसी समय में यह विरोध जोरों पर हुआ करता था. अब नहीं रह गया है. तमिलनाडु में रिक्सेवाला, बस वाला, सभी तो हिन्दी खूब समझते हैं. महाराष्ट्र वगैरह छोड़ो- ये तो राजनीति के वनमानुष हैं, मराठा मानुष. मैं कह रहा था कि मनुष्य शब्द रूढ़ कैसे बनते हैं देखो 'वन मानुष '. ये शब्द अब रूढ़ हो चुका है ये सब मराठी मानुष बोल रहे हैं. बन मानुष और मराठी मानुष पास ही पास हैं. आप जो भी चाहें समझें. मैं यहाँ भाषा की बात कर रहा हूँ, न कि मराठी मानुष का विरोध कर रहा हूँ.
© 2011 Varyam Singh; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: वरयाम सिंह
जन्म स्थान: बाहु (बंजार), कुल्लू
शिक्षा: 1969 में रूसी भाषा का अध्ययन, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली; पी.-एच. डी. (मास्को विश्वविद्यालय, मास्को)
अनुभव: 1972 से अध्यापन, मास्को विश्वविद्यालय, मास्को.
संप्रति: रूसी भाषा केन्द्र में अध्यापन एवं भारतीय भाषा केन्द्र में डीन ऑफ स्कूल के पद पर नियुक्त, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली.
प्रकाशित रचनायें: रूसी भाषा से हिन्दी में अनुवाद की तमाम पुस्तकें प्रकाशित - जिनमें कहानी संग्रह, काव्य- संग्रह, उपन्यास आदि
सांस्कृतिक एवं कलात्मक गतिविधियाँ: तमाम साहित्यिक, सांस्कृतिक, संस्थाओं से सम्बद्ध.
संपर्क: भारतीय भाषा केन्द्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली