इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
अक्सर तेरा साया
एक अनजानी धुंध से चुपचाप चला आता है
और मेरी मन की चादर में सलवटें बना जाता है
मेरे हाथ, मेरे दिल की तरह
काँपते हैं, जब मैं
उन सिलवटों को अपने भीतर समेटती हूँ
तेरा साया मुस्कुराता है और मुझे उस जगह छू जाता है
जहाँ तुमने कई बरस पहले मुझे छुआ था,
मैं सिहर सिहर जाती हूँ, कोई अज़नबी बनकर तुम आते हो
और मेरी ख़ामोशी को आग लगा जाते हो.
तेरे जिस्म का एहसास मेरी चादरों में धीमे - धीमे उतरता है
मैं चादर तो धो लेती हूँ पर मन को कसे धो लूँ
कई जनम जी लेती हूँ तुझे भुलाने में, पर तेरी मुस्कुराहट,
जाने कैसे बहती चली आती है,
न जाने, मुझ पर कैसी बेहोशी सी बिछा जाती है
कोई पीर पैगंबर मुझे तेरा पता बता दे
कोई माझी, तेरे किनारे मुझे ले जाए कोई देवता
तुझे फिर मेरी मोहब्बत बना दे या तो तू यहाँ आजा,
या मुझे वहाँ बुला ले
मैंने अपने घर के दरवाज़े खुले रख छोड़े हैं.
कल रात दिल के दरवाज़े पर दस्तक हुई
नींद की आँखों से देखा तो,
तुम थी
मुझसे मेरी नज़्में माँग रही थी
उन नज़्मों को जिन्हें संभाल रखा था, मैंने तुम्हारे लिए,
एक उम्र भर के लिए
आज कहीं खो गई थी, वक़्त के धूल भरे रास्तों में
शायद उन्हीं रास्तों में
जिन पर चल कर तुम यहाँ आई हो
क्या किसी ने तुम्हें बताया नहीं कि
परायों के घर भीगी आँखों से नहीं जाते
उस दिन जब मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ा,
तो तुमने कहा नहीं
और चंद आँसू जो तुम्हारी आँख से गिरे
उन्होंने भी कुछ नहीं कहा न तो नहीं
अगर आँसुओं की ज़बान होती तो
सच झूठ का पता चल जाता
ज़िंदगी बड़ी है या प्यार
इसका फैसला हो जाता.
जो दर्द तुमने मुझे दिए,
वो अब तक सँभाले हुए है!!
कुछ तेरी खुशियाँ बन गई हैं
कुछ मेरे गम बन गए हैं
कुछ तेरी ज़िंदगी बन गई हैं
कुछ मेरी मौत बन गई हैं
जो दर्द तुमने मुझे दिए
वो अब तक सँभाले हुए हैं!!
मैंने चाहा कि
तेरी तस्वीर बना लूँ इस दुनिया के लिए
क्योंकि मुझमें तो है तू, हमेशा के लिए
पर तस्वीर बनाने का साजो सामाँ नहीं था मेरे पास
फिर मैं ढूँढने निकला; वह सारा समान, ज़िंदगी के बाज़ार में.
बहुत ढूँढ़ा, पर कहीं नहीं मिला फिर किसी मोड़ पर किसी दरवेश ने कहा,
आगे हैं कुछ मोड़, तुम्हारी उम्र के,
उन्हें पार कर लो
वहाँ एक अंधे फ़कीर की मोहब्बत की दूकान है;
वहाँ, मुझे प्यार का हर सामान मिल जायेगा
मैंने वो मोड़ पार किए, सिर्फ़ तेरी यादों के सहारे!!
वहाँ वो अंधा फ़कीर खड़ा था,
मोहब्बत का सामान बेंच रहा था
मुझ जैसे,
तुझ जैसे,
कई लोग थे वहाँ अपने अपने यादों के सलीबों और सायों के साथ
लोग हर तरह के मौसम को सहते वहाँ खड़े थे.
उस फ़कीर की मर्ज़ी का इंतज़ार कर रहे थे फ़कीर बड़ा अलमस्त था
खुदा का नेक बंदा था
अंधा था
मैंने पूछा तो पता चला कि
मोहब्बत ने उसे अंधा कर दिया है!!
या अल्लाह! क्या मोहब्बत इतनी बुरी होती है मैं भी किस दुनिया में भटक रहा था
ख़ैर; जब मेरी बारी आई
तो, उस अंधे फ़कीर ने,
तेरा नाम लिया, और मुझे चौंका दिया,
मुझसे कुछ नहीं लिया और
तस्वीर बनाने का साजो सामान दिया
सच. कैसे कैसे जादू होते हैं ज़िंदगी के बाज़ार में!!!
मैं अपने सपनों के घर आया.
तेरी तस्वीर बनाने की कोशिश की,
पर ख़ुदा जाने क्यूँ. तेरी तस्वीर न बन पाई.
कागज़ पर कागज़ ख़त्म होते गए
उम्र के साल दर साल गुजरते गये.
पूरी उम्र गुजर गई
पर
तेरी तस्वीर न बनी,
उसे न बनना था, इस दुनिया के लिए
न बनी
जब मौत आई तो, मैंने कहा, दो घड़ी क रुक जा;
वक़्त का एक आख़िरी कागज़ बचा है. उस पर मैं "उसकी" तस्वीर बना लूँ
मौत ने हँसते हुए उस कागज़ पर,
तेरा और मेरा नाम लिख दिया;
और मुझे अपने आगोश में ले लिया.
उसने उस कागज़ को मेरे जनाज़े पर रख दिया, और मुझे दुनियावालों ने फूँक दिया
और फिर
इस दुनिया से एक और मोहब्बत की रूह फ़ना हो गई.
© 2009 Vijay Sappatti; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: विजय सप्पत्ति
जन्म स्थान: नागपुर
शिक्षा: एम. बी. ए.
संप्रति: हैदराबाद में मुख्य प्रबंधक (मार्केटिंग) के रूप में कार्यरत
संपर्क: फ्लैट न. 402, पांचवाँ तल, प्रमिला रेसीडेंसी; मकान न. 36 - 110/402, डिफ़ेंस कॉलोनी, सैनिकपुरी पोस्ट, सिकंदराबाद - 500094 ( आंध्रप्रदेश )