अर्गला

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कथा साहित्य

वीरेन्द्र कुमार मैसी

माँ

अब मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूँ. मेरी आँखों की ज्योति लगभग समाप्त होती जा रही है. पर वह राज़ जो मैंने अपने सीने में 60 वर्षों से छुपाये रखा, जिसे पुलिस तथा कोटि के जज, पुलिस की यातनायें, सामाजिक कार्यकर्ता तथा बाल सुधार गृह संस्थायें भी न उगल पायीं, मैं मृत्यु पूर्व अपने मस्तिष्क से निकाल कर अपने दिल का बोझ कुछ हल्का कर इस संसार से जाना चाहता हूँ ताकि मेरी आत्मा इस बोझ रहित ईश्वर के पास न जाये.

फैसला आपके हाथ में है, जो ठीक था या ग़लत? लोग मुझे कातिल कहते हैं. समाज मुझे घृणा की दृष्टि से देखता है. मेरी संतान को समाज कातिल की औलाद कहता है. किसी ने मेरे धागे को नहीं देखा. उनमें से निकलती पीप को दबाकर बाहर नहीं निकाला. उन जख्मों पर मरहम नहीं रखा. वह तो 'अराधना' थी मेरी पत्नी जिसने मुझे सहारा दिया. एक अनाथालाय में पली, बड़ी, ग़रीबी मुफलिसी की मारी. वह न होती तो शायद मैं आत्महत्या कर लेता. सब जीवन का चक्र है. चलता है. जाता है. जब रुकता है तो मनुष्य घास-फूस के फूलों की केवल राख बन कर रह जाता है.

मेरा बचपन! याद करता हूँ. क्या था बचपन! जब होश संभाला तो अपने आप को बाल कारागार में पाया. जो कुछ पढ़ा-लिखा सामाजिक संस्थाओं ने ही पढ़ाया. कुछ ट्रेनिंग भी दी. गई कि जब कारागार से छूटूँ तो अपने पैरों पर खड़ा हो सकूँ. मेरे पिता एक कालिज के वरिष्ठ अध्यापक थे. मेरी माँ एक विद्यालय की प्रधानाचार्य. उस समय मैं कक्षा 6 का छात्र था. मैं अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी. अचानक एक रात मेरे पिता को हृदयघात हुआ और वह हम माँ-बेटे को बिलखता छोड़ संसार से चले गये. मेरी माँ बहुत सुंदर, सुशील, पढ़ी-लिखी महिला थीं. पिता की मृत्यु के पश्चात, जवान, अधेड़, सब ही प्रकार के व्यक्तियों ने मेरी माँ को अपने जाल में फँसा कर विवाह करना चाहा. पर मेरी माँ पिता की यादों को संजोये मुझे पाल-पोस कर बड़ा आदमी बनाना चाहती थी. उस शहर में रहकर पिता को याद कर माँ हर समय रोती रहती. रिश्तेदारों परेशान होकर, भाग-दौड़ कर, एक बड़े शहर में माँ का तबादला करवा दिया. यहाँ आकर माँ कुछ आश्वस्त हो गई थी. अपने दु:खों पर काफी हद तक काबू पा लिया था उसने.

एक दिन मेरी माँ एक सरकारी मीटिंग अटेंड करने एक विद्यालय गई. वहाँ पर उनकी मुलाकात एक मौलाना से दिखने वाले व्यक्ति से हुई. सुंदर काली दाढ़ी, काली शेरवानी, चूड़ीदार अलीगढ़ कट पायजामा पहने वह व्यक्ति मेरी माँ को पहचान गया. वह उनके साथ टीचर्स ट्रेनिंग कालिज में पढ़ता था. पर अब वह एक सरकारी विद्यालय में अध्यापक था. तथा अपनी जमींदारी भी देखा करता था. मेरी माँ ने उसका परिचय मामा जी के रूप में करवाया था. प्रत्येक रविवार मैं अपनी माँ के साथ उनके घर जाया करता था. पूरा दिन उनके बच्चों के साथ खेलता. बगीचों में फलों को तोड़ता. शाम को पतंग उड़ाया करता. माँ उनकी पत्नी तथा बहनों से काफी हिल मिल गई थी. तथा खुश रहने लगी थी.

यह रविवार और दिनों की तरह ही था. हम सुबह उन मामाजी के घर आ गये थे. दिन भर हम बच्चे आमों के बगीचे में खेलते रहे. उनके घर में दो हवेलियाँ थीं. एक मर्दाना तथा दूसरी जनाना. उस मर्दाना हवेली में कोई स्त्री नहीं जाया करती थी. मैं जनाना हवेली की छत पर चढ़ कर बच्चों के साथ पतंग उड़ा रहा था. अचानक एक पतंग कट कर मर्दाना हवेली के आंगन में गिरी. मैं भाग कर सीढ़ियों से उतर कर मर्दाना हवेली में पहुंचा. दौड़कर पतंग उठा ली. जैसे ही पलट कर मैंने पीछे देखा, अपनी माँ को मामाजी के साथ आपत्तिजनक स्थिति में पा मेरा खून खौल गया. मेरी समझ में कुछ नहीं आया. मैंने क्रोध से वशीभूत हो पास में पड़ा कँटीली झाड़ियाँ काटने वाला गँड़ासा (चापड़) उठा लिया. जो माली प्रयोग करते हैं. पहले मैंने सोचा कि अपनी माँ को भी खत्म कर दूँ. पर माँ से कहा, 'आप हट जाओ यहाँ से और भाग कर जनानी हवेली में चली जाओ. इससे पूर्व कि मामा रूपी राक्षस अपने आप को संभाल पाता मैंने गंडासे के एक वार से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया. तब तक उनके बच्चे भी मुझे ढूँढ़ते हुए वहाँ आ गये थे. मेरे हाथ में खून से सना गंडासा तथा अपने पिता की तड़पती लाश को देखकर वह चीखते हुए अपनी माँ के पास भागे. मैं चुपचाप वहीं खड़ा रहा. उनकी माँ तथा रिश्तेदार वहाँ आ गये थे. पुलिस आ गयी थी. पूछताछ के लिए मुझे थाने ले जाया गया. मैंने अपना जुर्म कबूल कर लिया था. पर सब प्रकार के प्रयासों के बाद भी मैंने किसी को यह नहीं बताया कि मामा की हत्या मैंने क्यों की थी. यह राज केवल मैं जानता था या मेरी मां.

मुझ पर मुकदमा चला. मेरा जुर्म साबित हो चुका था. मुझे इस हत्या के जुर्म में 10 वर्ष की कैद की सजा सुनाई गई. मैं बाल सुधार गृह में बंदी के रूप में आ गया था. मेरी माँ मुझ से मिलने हर माह आया करती थी. मेरे लिये खाने-पीने की वस्तुयें लातीं पर अपना मुंह दूसरी ओर फेर कर रोती रहती. वह मुझे प्यार करने, मुझसे आँखें मिलाने, अपनी ममता लुटाने में अपने आप को असमर्थ पाती. वह अपने और मेरे जीवन को बर्बाद करने में अपराध बोध में जी रही थी. मैं उसे 'मा..' कहकर अपनी जुबान को गंदा नहीं करना चाहता था. इस ही ग्लानी में जीते-जीते उसने पाँच वर्ष निकाल दिये. मैं तरसता रहता कि कब मेरी माँ अपने पाप को स्वीकार कर कुछ तो बोलेगी. मैं अपने कमरे में पड़ा-पड़ा सोचा करता कि शायद इस बार के मिलन पर मेरी माँ मुझे बेटा कहकर संबोधन करेगी. मैं दौड़कर उसके सीने से लग जाऊँगा. पाँच वर्ष के रुके उस प्यार के सैलाब को चूम-चूम कर अपनी माँ के आँचल को आंसुओं से भर दूँगा. मैं क्षमा कर दूँगा अपनी माँ को. क्योंकि कैद में रहकर मैं जान गया था. समाज की इस बुराई को कि किसी भी प्रकार एक अबला नारी अपनी रक्षा अकेली रहकर नहीं कर सकती. उसके अपने ही उसे लूटना चाहते हैं.

पर ऐसा नहीं हुआ. एक दिन जेल के गार्डन ने मुझसे आकर कहा, 'तुम तैयार हो जाओ. हमें कहीं जाना है. 'मैं कुछ समझ न सका. थोड़ी देर बाद पुलिस की जीप आ गयी. चार सिपाही मुझे बीच में बैठा कर चल पड़े. आधे घंटे बाद मेरे ही घर के सामने जीप रुकी. घर के सामने भीड़ लगी थी. मेरी माँ की लाश ज़मीन पर पड़ी थी. उसका चेहरा सफेद चादर से ढका था. दौड़कर मैंने उसके मुंह से चादर को हटाया. कंकाल हो गयी थी वह. उसके लंबे काले सुंदर बाल खिचड़ी हो गये थे. गाल तथा आँखें भीतर धँस गयी थीं. मैं ने अपनी माँ की लाश को सीने से लगा लिया था. 'माँ मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया था. तुम ही ने मुझे सीने से लगाकर प्यार नहीं किया. चलो मैं ही कर लूँ.' मेरी माँ ने पंखे से लटकर आत्महत्या कर ली थी.

'आराधना' मेरी पत्नी भी बालिका सुधार गृह की ही सदस्या थी. मुझे कोर्ट ने मेरी माँ की मृत्यु तथा मेरे अच्छे व्यवहार तथ चरित्र / आचरण के कारण चार वर्ष मेरी सज़ा कम कर दी थी. और मैंने आराधना से विवाह कर अपना नया जीवन आरंभ किया था.

आज मैं स्वयं, मृत्यु शय्या पर हूँ. अपनी माँ से मिलने जा रहा हूँ. मुझे दूर आकाश में अपनी माँ की आकृति दिखाई दे रही है. वह मुझे बुला रही है. उसकी बाहें फैली हैं. आ रहा हूँ माँ तेरी गोद में सोने के लिए.

© 2009 Virendra Kumar Massey; Licensee Argalaa Magazine.

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