इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की पत्रिका
'वो कविता, कविता नहीं जिसमें मानवता की पीड़ा नहीं', ये मेरा मानना है लेकिन इस मान्यता पर मैं ख़ुद भी क़ायम नहीं हूँ मेरी कविताएँ भी व्यक्तिगत पीड़ा रोमांस और भी कई चीज़ें पर आधारित होती हैं. एक वामपंथी होने की वज़ह से सभ्यता और समाज के ख़िलाफ़ जो होता है, उसी को देखकर अपनी प्रतिक्रिया को अपने जज़्बातों को शब्दों के द्वारा कविता के रूप में लोगों के सामने रखना चाहता हूँ जज़्बातों के उद्गार की, उद्गम की प्रेरणा मुझे ख़ुद के साथ या सामने समाज में होने वाली घटनाओं दुर्घटनाओं से ही मिलती है.
अब इसी समाज में ये भी देख रहा हूँ कि भ्रष्टाचार, अनैतिकता, अश्लीलता इत्यादि के साथ-साथ हिंदी कविताओं के बड़े-बड़े उद्योग खुल चुके हैं लेकिन मैंने कोई उद्योग नहीं खोला, दुकान भी नहीं. अनुवाद का व्यावसाय है मेरा, खासकर कविताओं के अनुवाद का रूसी भाषा का जानकार भी हूँ. ये मेरा मानना है कि कोई भी कला अनुवाद का ही एक रूप है चाहे वो मूर्तिकार मूर्ति बनाता हो याकि एक चित्रकार चित्र या कथाकार कहानी, यानी अपने सृजनात्मक भाव को अभिव्यक्त करता है. सोच को अनूदित करता है. ये कलाकारों की सोच, विचार, लगन और एकाग्रता पर निर्भर करता है कि देखने वाले और पढ़ने वाले किस तरह से 'कंसीव' कर रहे हैं. यही निर्णय करता है कि कौन कलाकार किस तरह का है. उसकी कला में वज़न कितना है. एक कवि अपने जज़्बातों को अपनी भावनाओं को अपने दर्द को किस तरह से शब्दों के द्वारा अनूदित करता है, रूपांतरित करता है, अभिव्यक्त करता है. वही शैली विशिष्ट अनूदित अभिव्यक्ति उसकी कृति की खूबसूरती की परिचायक होती है.
आजकल के कवियों को कम से कम आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इस बात से अनभिज्ञ नहीं रहना चाहिए कि जिस प्रकार आत्मा हृदय की मुक्तावस्था को ज्ञानदशा कहते है. उस तरह से हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती हैं. उस तरह से हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्दविधान करती आई है. उसे कविता कहते हैं. अगर अनुवाद की बात करें; ख़ासकर कविता के क्षेत्र में तो वरयाम सिंह सी शख़्सियत है. जो दो भाषाओं के दरम्यान उपस्थित रेखा को मिटा देते हैं. धूमिल कर देते हैं. उनकी अनूदित कविताएँ कहीं से अनूदित नहीं लगती (अगर रूसी भाषा के वैसे शब्दों को दर किनार कर दिया जाए जिनका रूपांतरण सुबोध नहीं है. लगता है कि कविता की रचना हिंदी में ही की गई है. वरयाम सिंह अनुवादकों में अपना विशेष स्थान रखते हैं.
प्रिये,
तुम्हारी इच्छा थी न
कि मैं एक कविता लिखूँ
एक ख़ूबसूरत कविता
मैंने कोशिश की
तुम्हारी इच्छानुसार एक कविता लिखने की
एक ऐसी कविता
जो कविता के नियमों को तोड़ दे
किसी बन्धन में न रहे
एक पूर्ण कविता हो
एक ऐसी कविता हो
जो शायद
इस संरचना को
कुछ सोचने को विवश कर पाये
मैंने लिखनी चाही
एक ऐसी कविता
जो गावों में
पढ़ी सुनी जाये
और जिसकी आलोचना का अधिकार
सिर्फ़ मज़दूरों व किसानों को हो
किसी पुरस्कार की
मोहताज़ न हो
लेकिन उसमें अवश्य ही
बातें हों
'पाश' की कविताओं की सी
महकते हुये धनिये का
आदमी के सपनों का
लोहे की मज़बूती का
तूफ़ान के मात न खाने का
और बीच का रास्ता नहीं होने का
जिसे तुम
सारी उम्र
पढ़ती रह सको
मैंने लिखनी चाही थी
एक ऐसी कविता
जिसे भाषा न समझने वाला
आदमी भी समझ सके
भले ही वह
क्यूँ न कहनी पड़े
मौन की भाषा में
लेकिन
उसमें ज़िक्र हो
तेलंगाना की
नक्सलबाड़ी की
भूख से बिलखते बच्चों की
औरतों के
लुट जाने की
हक़ माँगते वक़्त
मार गिराये जाने वाले
किसानों की पीड़ा का
और साथ ही साथ
जो ये भी कह सके
कि वो कविता
कविता नहीं
जिसमें मानवता की पीड़ा नहीं
और उसमें
एक और कहानी हो
आक्रोश के स्वर हों
बदले की भावना हो
चाहता हूँ
कि उस कविता की कहानी में
मैं न भी रहूँ
क्रांति के वाहकों के साथ
प्रिये,
कवि से पहले
मैं कॉमरेड हूँ
एक सिपाही हूँ
जंगे आज़ादी का
जो अठारह सौ सत्तावन से शुरू है
और हर तरह से आज तक है
एक सौ पचास वर्ष हो गये
मैंने सहा है
बहुत कुछ
मैंने भँवरी देवी का दु:ख सहा
जिसके साथ
बार-बार
ज़्यादती करने वाले
बार-बार
बाइज़्ज़त बरी होते गये
मैंने सही है
वे गोलियाँ
जो अपने ही गाँव में
किसानों मज़दूरों पर
बार-बार चलती रहीं
और बार-बार
ये कहती हैं
मत करो स्वीकार
अहिंसावादी गाँधीवाद
प्रिये,
मैंने देखा है
अपने दोस्त 'भगत सिंह' की हत्या
जंग-ए-आज़ादी में ही
कुछ अँग्रेज़ों द्वारा इकत्तीस मार्च सत्तानवे को
सीवान में
मैंने देखा
वो बिहार निवास
दिल्ली में
जहाँ शासकों ने
हम विद्रोहियों पर
गोलियाँ बरसायीं
मैंने वो लाठियाँ भी खायीं
जो इस देश के प्रधान के
संरक्षकों ने
हम पर बरसायी
इन्ही गोलियों और लाठियों के बाद
मैंने अनुमान लगाया
कैसे हुआ होगा
जलियावाला बाग में विद्रोह का दमन
दोस्त,
मुझे यकीन है
व्यवस्था संचालकों पर
अवश्य
ये नाजायज़ संतति है
नाजायज़ देन है
अँग्रेज़ों की
तभी
अँग्रेज़ी हुकूमत जा न सकी
और शायद
यही वज़ह है
लेकिन शायद नहीं
यकीनन
वज़ह यही है
प्रिये,
कि मेरी कविता
पूर्णत: नहीं पा रही
क्यूँकि जानता हूँ
यह तभी पूर्ण होगी
जब मैं भी
शहीद हो जाऊँ
वहीं
बिल्कुल उसी चौराहे पर
जहाँ शहीद हुआ था वो
और शामिल हो जाऊँ
उसी कारवाँ में
जिसका नायक था वो
कॉमरेड ' चंद्रशेखर '
हमारे समय का नायक.
बादलों की छाया
है मेरे ऊपर
लेकिन वही
कम न कर पाए
धूप की तपन को
ज़िंदगी के सहारे भी
हैं मेरे साथ
लेकिन अंतत:
उनका सहारा
मुझे बनना पड़ता है
धूप की तपन के साथ
हो जाता है मुश्किल
समझ पाना
कौन किसका सहारा है
मझधार साहिल का
या साहिल मझधार का.
घर से निकल पड़ा मैं
मंज़िल की तलाश में
लेकिन मेरा रास्ता
घबराया हुआ था
पेड़ और पौधे भी
लोग और बाग भी
ज़मीं और आसमाँ
धूप और छाया भी
गर्मी और जाड़ा भी
सुबह और शाम भी
सभी के सभी
घबराए हुए मिले
इसी वजह से
घबरा गया मैं भी
फ़िर सोच में पड़ गया
कि इधर से जाऊँ
या उधर
जाऊँ या
न जाऊँ.
देखा
आसमाँ में छेद हो गया
बादल
बरसाने लगे आग
छोटा होने लगा
हिमालय
सुलगने लगे समुद्र
सूरज ने की कोशिश
बर्फ़ बरसा के
सभी को सभ्य करने की
लेकिन
ठहर गया
मेरी तरह ही
असमंजस में पड़कर ही
उसने भी देखा
मेरी तरह
कि लोग बनते हैं
या तो हिंदू
या फ़िर मुसलमान
कोई भी
कोशिश नहीं करता
बनने की
एक इंसान.
© 2009 Vishal Bharti; Licensee Argalaa Magazine.
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नाम: विशाल भारती
उम्र: 52 वर्ष
जन्म स्थान: पटना (बिहार)
शिक्षा: रूसी भाषा का अध्ययन (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय)
संप्रति: स्वतंत्र लेखन एवं अनुवाद कार्य में संलग्न.
कवितायें: कई पत्रिकाओं में प्रकाशित