Argalaa

a magazine of jansamvedna and Hindi literature of 21st century

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Kavya Pallav


Pankaj Singh

खुशफ़हमी है कि बची है थोड़ी शर्म
आड़े वक़्तों कहीं से निकलकर आएगी
जिसे सत्ताओं कर्णधारों ने लगातार अनुपयोगी पाया है
ढूँढ़ेंगी वही कोई न्याय
जो हमारी रक्षा करेगा
कोई क्रोध जो जलाएगा जीर्ण शीर्ण ......
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Ramashankar Yadav Vidrohi

मैं साईमन न्याय के कटघरे में खड़ा हूँ
प्रकृति और मनुष्य मेरी गवाही दें
मैं वहाँ से बोल रहा हूँ जहाँ
मोहनजोदड़ो के तालाब की आख़िरी सीढ़ी है
जिस पर एक औरत की जली हुई लाश पड़ी है
और तालाब में इंसानों की हड्डियाँ बिखरी पड़ी हैं ......
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Vishal Bharti

'वो कविता, कविता नहीं जिसमें मानवता की पीड़ा नहीं', ये मेरा मानना है लेकिन इस मान्यता पर मैं ख़ुद भी क़ायम नहीं हूँ मेरी कविताएँ भी व्यक्तिगत पीड़ा रोमांस और भी कई चीज़ें पर आधारित होती हैं. एक वामपंथी होने की वज़ह से सभ्यता और समाज के ख़िलाफ़ जो होता है, उसी को देखकर अपनी प्रतिक्रिया को अपने जज़्बातों को शब्दों के द्वारा कविता के रूप में लोगों के सामने रखना चाहता हूँ जज़्बातों के उद्गार की, उद्गम की प्रेरणा ......
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Neera Tyagi

बिना बताये चला आता है
बीच का यह अंतराल,
अँगुलियों से चुक गए शब्द
आंखों से गुम चाँद की कसक,
सपनों की नींद से
वही पुरानी खटर-पटर ......
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Dileep Shakya

रात के गहरे अंधकार को चीरकर
समुद्र की लहरों से निकल रहा है एक घोड़ा

घोड़े के इंतज़ार में
समुद्र के किनारे खड़ा है एक सिरफ़िरा सवार
हाथों में थामे लगाम और रक़ाब ......
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Deepmala Mahla

सौंप दी है तुम्हें
अपने सपनों की धरती
अपने सपनों का आकाश

अब बो ओ तुम बीज
भरो तुम रंग ......
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Malkhan Singh

वही
मंज़र
बंज़र
कँटीला जंगल
और
वही तपन झुलसन ......
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Nitika Jain

समंदर की जैसे चादर सी बिछी हो इस ज़मीं पे
हज़ारों राज़ छिपाये अपनी गहरायी में,
मानो कह रहा हो कुछ आसमाँ से,
कि ऐ नीले आसमाँ, मुझे भी अपनी तरह ख़ुदा का आशियाँ बना,
दिल जलता है उस अब्र को देखकर,
जिससे तेरा ता-उम्र का दोस्ताना है! ......
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Suman Gaur

आओ चल पड़े हम अज़नबी राहों पर
न तुम ' तुम ' रहो न मैं ' मैं ' रहूँ
ख़ामोश सागर की लहरों के संग खो जाएँ
न तुम कोई शिकवा करना न मैं कोई शिकायत करूँगी
हमारी ख़ामोशी में ही डूबने दो इन लहरों की पुकार
न तुम माझी बनना न मैं साहिल बनूँगी ......
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Vijay Sappatti

अक्सर तेरा साया
एक अनजानी धुंध से चुपचाप चला आता है
और मेरी मन की चादर में सलवटें बना जाता है

मेरे हाथ, मेरे दिल की तरह
काँपते हैं, जब मैं ......
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